परिचय
दीपावली हिंदू धर्म का सबसे बड़ा और सबसे प्रिय पर्व है। यह केवल दीप जलाने का त्योहार नहीं, बल्कि माँ लक्ष्मी को आमंत्रित करने, श्री गणेश से बुद्धि और शुभता मांगने, माँ सरस्वती से विद्या और कुबेर जी से धन की रक्षा का आशीर्वाद पाने का दिन है।
नीचे दी गई पूजा विधि घर पर स्वयं पूजा करने वालों के लिए आसान भाषा में, क्रम से लिखी गई है। पूजा से एक दिन पहले सामग्री की सूची देखकर सारा सामान इकट्ठा कर लें, ताकि मुहूर्त के समय कोई भाग-दौड़ न हो।
दिवाली का महत्व
दिवाली 2026 कब है?
वर्ष 2026 में दीपावली का मुख्य पर्व रविवार, 8 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा। लक्ष्मी पूजा हमेशा उस शाम की जाती है जब प्रदोष काल के समय अमावस्या तिथि विद्यमान हो, और 2026 में यह संयोग केवल 8 नवंबर की शाम को ही बन रहा है।
- अमावस्या तिथि प्रारंभ: 8 नवंबर 2026, सुबह लगभग 11:27 बजे
- अमावस्या तिथि समाप्त: 9 नवंबर 2026, दोपहर लगभग 12:31 बजे
- प्रदोष काल: शाम लगभग 05:31 से 08:09 तक (नई दिल्ली)
- लक्ष्मी पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त (वृषभ लग्न): शाम 05:54 से 07:50 तक (नई दिल्ली)
- निशीथ काल पूजा: व्यापारी और साधक मध्यरात्रि के आसपास बही-खाता और महालक्ष्मी साधना करते हैं
नोट: मुहूर्त सूर्यास्त पर आधारित होता है, इसलिए हर शहर में समय कुछ मिनट आगे-पीछे होता है। मुंबई, पुणे जैसे पश्चिमी शहरों में मुहूर्त लगभग 25–35 मिनट देर से और कोलकाता जैसे पूर्वी शहरों में पहले शुरू होता है। सटीक समय के लिए अपने शहर का पंचांग अवश्य देखें।
वृषभ लग्न में ही लक्ष्मी पूजा क्यों?
वृषभ एक स्थिर लग्न है। शास्त्रों में मान्यता है कि स्थिर लग्न में की गई लक्ष्मी पूजा से लक्ष्मी घर में "स्थिर" रहती हैं — यानी धन आता है और टिकता भी है। प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का लगभग ढाई घंटे का समय) और वृषभ लग्न जब एक साथ हों, वह समय दिवाली पूजा के लिए सबसे उत्तम माना जाता है।
पाँच दिवसीय दीपोत्सव 2026
- दिन 1 — धनतेरस (शुक्रवार, 6 नवंबर): भगवान धन्वंतरि, कुबेर और यमराज की पूजा। सोना-चांदी, बर्तन, झाड़ू खरीदना शुभ। शाम को घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर यम-दीपक जलाएं।
- दिन 2 — नरक चतुर्दशी / रूप चौदस / छोटी दिवाली (शनिवार, 7 नवंबर): सूर्योदय से पहले उबटन लगाकर अभ्यंग स्नान। शाम को 14 दीपक जलाने की परंपरा। गुजरात-राजस्थान में काली चौदस की पूजा इसी रात।
- दिन 3 — दीपावली / लक्ष्मी पूजा (रविवार, 8 नवंबर): प्रदोष काल में लक्ष्मी-गणेश, सरस्वती और कुबेर पूजन, दीपदान, बही-खाता पूजन।
- दिन 4 — गोवर्धन पूजा / अन्नकूट (मंगलवार, 10 नवंबर): गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर पूजा, 56 भोग / अन्नकूट। (9 नवंबर को अमावस्या दोपहर तक रहने के कारण इस वर्ष बीच में एक दिन का अंतर है)
- दिन 5 — भाई दूज (बुधवार, 11 नवंबर): बहनें भाई को तिलक कर उसकी लंबी आयु की कामना करती हैं, भाई बहन को उपहार देता है।
दीपावली का आध्यात्मिक महत्व
"दीपावली" शब्द "दीप" और "आवली" से बना है — यानी दीपों की पंक्ति। यह पर्व अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और निराशा पर आशा की विजय का प्रतीक है। कार्तिक अमावस्या वर्ष की सबसे अंधेरी रातों में से एक होती है, और इसी रात हर घर, हर आंगन को दीपों से जगमगाकर हम यह संकल्प लेते हैं कि जीवन में कितना भी अंधेरा हो, एक छोटा-सा दीया भी उसे दूर कर सकता है।
धार्मिक मान्यता है कि दीपावली की रात माँ महालक्ष्मी स्वयं पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और देखती हैं कि किसका घर स्वच्छ, प्रकाशित और प्रेम से भरा है। इसीलिए दिवाली से पहले घर की सफाई, रंगोली, तोरण और रात भर दीपक जलाने की परंपरा है।
दिवाली से जुड़ी पौराणिक कथाएं
1. भगवान श्रीराम का अयोध्या आगमन
चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण कर और लंकापति रावण का वध करके जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ अयोध्या लौटे, तो अयोध्यावासियों ने पूरे नगर को घी के दीपों से सजा दिया। उस अमावस्या की रात अयोध्या पूर्णिमा से भी अधिक प्रकाशित हो उठी। तभी से यह दिन दीपावली के रूप में मनाया जाता है।
2. समुद्र मंथन से माँ लक्ष्मी का प्राकट्य
देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से चौदह रत्न निकले। उन्हीं में से कार्तिक अमावस्या के दिन माँ लक्ष्मी कमल पर विराजमान होकर प्रकट हुईं और उन्होंने भगवान विष्णु का वरण किया। इसलिए यह दिन लक्ष्मी जी का प्राकट्य दिवस भी माना जाता है।
3. भगवान वामन और राजा बलि
भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी और उसे पाताल लोक भेजा। मान्यता है कि बलि के कारागार से माँ लक्ष्मी समेत सभी देवताओं को मुक्ति इसी दिन मिली थी।
4. श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर वध
नरक चतुर्दशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध कर उसकी कैद से 16,100 कन्याओं को मुक्त कराया। अगले दिन इस विजय की खुशी में दीप जलाए गए।
5. जैन और सिख परंपरा
जैन धर्म में इसी दिन भगवान महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था। सिख परंपरा में यह "बंदी छोड़ दिवस" है, जब गुरु हरगोबिंद साहिब जी ग्वालियर के किले से 52 राजाओं के साथ मुक्त होकर अमृतसर पहुंचे थे।
दीपावली की कहानी — साहूकार की बेटी और माँ लक्ष्मी
एक गाँव में एक साहूकार रहता था। उसकी बेटी रोज़ पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाने जाती थी। उस पीपल पर माँ लक्ष्मी का वास था। एक दिन लक्ष्मी जी ने प्रकट होकर उस कन्या से कहा — "मैं तुम्हारी सखी बनना चाहती हूँ।" कन्या ने कहा, "माँ, मैं अपने पिता से पूछकर बताऊँगी।" पिता ने खुशी-खुशी हाँ कर दी।
दूसरे दिन लक्ष्मी जी साहूकार की बेटी को अपने घर ले गईं। उन्होंने उसे शाल-दुशाला ओढ़ाया, सोने की चौकी पर बिठाया और सोने की थाली में छप्पन प्रकार के भोजन कराए। विदा करते समय लक्ष्मी जी बोलीं — "अब तुम मुझे अपने घर कब बुलाओगी?" कन्या उदास हो गई, क्योंकि उसका घर बहुत साधारण था।
घर आकर उसने पिता को सारी बात बताई। साहूकार ने कहा — "बेटी, चिंता मत कर। तू घर को खूब साफ़ कर, गोबर से लीप, चौका लगा और चार बत्ती का दीपक जलाकर लक्ष्मी जी का नाम ले।" कन्या ने वैसा ही किया। तभी एक चील किसी रानी का नौलखा हार उड़ाकर ले जा रही थी, जो साहूकार के आंगन में आ गिरा। उस हार को बेचकर उसने लक्ष्मी जी के स्वागत की सारी व्यवस्था की — सोने की चौकी, रेशमी वस्त्र और छप्पन भोग।
जब लक्ष्मी जी गणेश जी के साथ पधारीं, तो साफ़-सुथरा, दीपों से जगमगाता घर देखकर बहुत प्रसन्न हुईं। कन्या ने उन्हें चौकी पर बैठने को कहा तो लक्ष्मी जी बोलीं — "मैं तो कहीं ठहरती नहीं, पर तुम्हारी श्रद्धा देखकर रुक जाती हूँ।" कन्या ने उन्हें प्रेम से भोजन कराया और जब तक वह स्वयं न उठे, लक्ष्मी जी वहीं विराजमान रहीं। उस दिन के बाद साहूकार का घर धन-धान्य से भर गया।
हे लक्ष्मी माता! जैसे आपने साहूकार की बेटी पर कृपा की, वैसे ही सब पर कृपा करना। कहानी कहने वाले, सुनने वाले और हुंकारा भरने वाले — सबका भंडार भरना।
भारत के अलग-अलग राज्यों में दिवाली
- उत्तर भारत: लक्ष्मी-गणेश पूजा, दीपदान और श्रीराम के आगमन का उत्सव।
- राजस्थान-मध्य प्रदेश: दीवार पर गेरू-खड़िया से लक्ष्मी जी का चित्र (मांडना), चावल-गेहूँ की ढेरियों से चौकी पूजन और रात को हटड़ी व दीपक।
- गुजरात: दिवाली के अगले दिन से नया वर्ष (बेसतू वरस), चोपड़ा पूजन।
- महाराष्ट्र: वसुबारस, लक्ष्मी पूजन, बलिप्रतिपदा (पाडवा) और भाऊबीज।
- बंगाल-ओडिशा-असम: इस रात माँ काली की पूजा (श्यामा पूजा) होती है।
- दक्षिण भारत: नरक चतुर्दशी को ही मुख्य दीपावली, सुबह तेल स्नान और पटाखे।
पूजा सामग्री
चौकी और स्थापना के लिए
- लकड़ी की एक बड़ी चौकी (पटा) और ढेरियों/कलश के लिए एक छोटी चौकी (वैकल्पिक)
- लाल रंग का नया कपड़ा (चौकी पर बिछाने के लिए, लगभग सवा मीटर)
- माँ लक्ष्मी और श्री गणेश की नई मूर्ति (मिट्टी/धातु) या लक्ष्मी-गणेश का फोटो — पुराने वर्ष की मूर्ति भी रख सकते हैं
- माँ सरस्वती और कुबेर जी का चित्र (वैकल्पिक)
- श्री यंत्र, कुबेर यंत्र (वैकल्पिक)
ढेरियों (कुड्डियों) के लिए अनाज
- साबुत चावल (अक्षत) — लगभग 250 ग्राम (16 ढेरियाँ + अक्षत के लिए)
- साबुत गेहूँ — लगभग 250 ग्राम (9 ढेरियाँ + कलश के नीचे)
- साबुत हरी मूंग — लगभग 100 ग्राम (5 ढेरियाँ)
- हल्दी (चावल पीले करने के लिए) और थोड़ा सा कुमकुम
कलश के लिए
- तांबे या पीतल का कलश (मिट्टी का भी चलेगा)
- गंगाजल और शुद्ध जल
- आम के 5 या 7 पत्ते (पल्लव)
- पानी वाला नारियल (जटा सहित) और उस पर लपेटने के लिए लाल चुनरी / मौली
- कलश में डालने के लिए: एक सिक्का, सुपारी, हल्दी की गांठ, दूर्वा, अक्षत, एक फूल
पूजन सामग्री
- रोली (कुमकुम), हल्दी, चंदन, सिंदूर, अबीर-गुलाल
- मौली (कलावा), जनेऊ (गणेश जी के लिए)
- सुपारी (कम से कम 11), पान के पत्ते (11), लौंग, इलायची
- दूर्वा (गणेश जी के लिए 21 दूर्वा)
- फूल — कमल का फूल (लक्ष्मी जी को सबसे प्रिय), गुलाब, गेंदा, फूलमाला 2–3
- कपूर, धूप, अगरबत्ती
- इत्र, शहद, दही, दूध, घी, शक्कर (पंचामृत के लिए)
- लक्ष्मी जी के लिए श्रृंगार: लाल चुनरी, चूड़ी, बिंदी, मेहंदी, काजल, सिंदूर, कंघी, शीशा
- नए वस्त्र / मौली का वस्त्र (लक्ष्मी-गणेश के लिए)
- कमलगट्टे (11 या 108), गोमती चक्र (11), पीली कौड़ियाँ (11), धनिया के बीज
- चांदी का सिक्का या लक्ष्मी-गणेश अंकित सिक्का, नए नोट, घर के गहने
दीपक
- एक बड़ा घी का दीपक (अखंड दीप — पूरी रात जलेगा)
- एक चौमुखा (चार बत्ती वाला) दीपक
- मिट्टी के दीये — कम से कम 11, 21 या 51 (घर, आंगन, तुलसी, कुआं/नल, रसोई के लिए)
- सरसों का तेल, घी, रुई की बत्तियाँ, माचिस
भोग और प्रसाद
- खील (लाई), बताशे, शक्कर के खिलौने — दिवाली का पारंपरिक प्रसाद
- मिठाई — बेसन/मोतीचूर के लड्डू (गणेश जी), खीर या सफेद मिठाई (लक्ष्मी जी)
- ऋतुफल — सिंघाड़ा, सीताफल, अनार, केला, गन्ना
- पान का बीड़ा, मेवे
बही-खाता / व्यापार पूजा के लिए
- नई बही-खाता / रजिस्टर, लाल कपड़ा, नई कलम-दवात
- तिजोरी / कैश बॉक्स, तराजू, कंप्यूटर/लैपटॉप (आधुनिक व्यापार में)
अन्य
- आसन (बैठने के लिए ऊनी या कुश का)
- पूजा की थाली 2, लोटा, कटोरी, चम्मच, घंटी, शंख
- रंगोली के रंग, तोरण (बंदनवार), शुभ-लाभ और स्वस्तिक के स्टिकर
- आरती की पुस्तक / मोबाइल पर आरती
पूजा विधि
चरण 1: पूजा से पहले की तैयारी (दिन में)
- सुबह जल्दी उठकर पूरे घर की सफाई करें, विशेषकर पूजा स्थान, मुख्य द्वार और रसोई की। मान्यता है कि लक्ष्मी जी गंदे और अंधेरे स्थान पर नहीं ठहरतीं।
- स्नान करके साफ़ या नए वस्त्र पहनें। महिलाएं सोलह श्रृंगार करें।
- मुख्य द्वार पर आम या अशोक के पत्तों का तोरण बांधें। द्वार के दोनों ओर रोली से स्वस्तिक और शुभ-लाभ लिखें।
- मुख्य द्वार पर रंगोली बनाएं और घर के अंदर आते हुए लक्ष्मी जी के पदचिह्न (चरण) बनाएं।
- पूजा का स्थान घर का ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या उत्तर दिशा सबसे शुभ है। पूजा करने वाला पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठे।
- दिन भर सात्विक रहें। जो लोग व्रत रखते हैं, वे पूजा के बाद ही अन्न ग्रहण करें।
चरण 2: चौकी लगाना और लाल कपड़े का आसन
- पूजा स्थान को गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें। ज़मीन पर रोली या आटे से एक छोटी रंगोली / अष्टदल कमल बना सकते हैं।
- उस स्थान पर लकड़ी की चौकी रखें। चौकी हिलनी नहीं चाहिए।
- चौकी पर लाल रंग का नया कपड़ा बिछाएं — यही माँ लक्ष्मी और गणेश जी का आसन है। लाल रंग शक्ति, सौभाग्य और लक्ष्मी जी का प्रिय रंग है। कपड़ा चारों ओर से थोड़ा लटकता हुआ रखें।
- कपड़े के बीच में रोली या हल्दी से एक स्वस्तिक बनाएं और उस पर थोड़े अक्षत रखें।
चरण 3: लक्ष्मी-गणेश जी को विराजमान करना (फोटो या मूर्ति)
- चौकी पर स्वस्तिक के ऊपर पहले मुट्ठी भर अक्षत (चावल) का आसन बनाएं, फिर उस पर मूर्तियाँ या फोटो रखें। मूर्ति कभी सीधे कपड़े पर न रखें।
- श्री गणेश जी को हमेशा पहले स्थापित करें, क्योंकि वे प्रथम पूज्य हैं।
- स्थान का नियम: शास्त्रीय मान्यता के अनुसार माँ लक्ष्मी, गणेश जी के दाहिने हाथ की ओर विराजती हैं। यानी जब आप सामने बैठेंगे तो गणेश जी आपके दाईं ओर और लक्ष्मी जी आपके बाईं ओर दिखेंगी। (कई परिवारों में अपनी कुल-परंपरा अलग होती है — उसी का पालन करें।)
- दोनों मूर्तियों का मुख पूर्व या पश्चिम दिशा की ओर रखें, ताकि पूजा करने वाला पूर्व या उत्तर की ओर देखे। मूर्तियों का मुख कभी दक्षिण की ओर न हो।
- लक्ष्मी जी के बगल में माँ सरस्वती (विद्या के लिए) और गणेश जी के बगल में कुबेर जी (धन रक्षा के लिए) का चित्र रख सकते हैं।
- मूर्तियाँ ऐसी हों जिनमें गणेश जी की सूंड बाईं ओर मुड़ी हो (घर के लिए शुभ) और लक्ष्मी जी कमल पर बैठी हों — खड़ी लक्ष्मी की मूर्ति घर में पूजा के लिए नहीं ली जाती।
- फोटो लगा रहे हैं तो उसे चौकी के पीछे दीवार के सहारे सीधा खड़ा करें या स्टैंड पर रखें।
चरण 4: अनाज की ढेरियाँ (कुड्डियाँ) बनाना
मूर्तियों के सामने चौकी पर (या उसके आगे रखी छोटी चौकी पर, लाल कपड़ा बिछाकर) अनाज की छोटी-छोटी ढेरियाँ बनाई जाती हैं। हर ढेरी एक देवता का आसन होती है। ढेरियाँ एक-एक मुट्ठी की, गोल और एक समान बनाएं।
- चावल की 16 ढेरियाँ — षोडश मातृका: सबसे आगे की पंक्ति में चावल की 16 ढेरियाँ बनाएं (4-4 की चार पंक्तियाँ या एक लंबी पंक्ति)। ये सोलह मातृकाओं — गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, मातर, लोकमातर, धृति, पुष्टि, तुष्टि और आत्मदेवता — का प्रतीक हैं। चावल को थोड़ी हल्दी मिलाकर पीला कर सकते हैं।
- गेहूँ की 9 ढेरियाँ — नवग्रह: उसके पीछे गेहूँ की 9 ढेरियाँ बनाएं (3-3 की तीन पंक्तियाँ)। ये नौ ग्रहों — सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु — का आसन हैं, ताकि आने वाला वर्ष सभी ग्रहों की कृपा से शुभ रहे।
- मूंग की 5 ढेरियाँ — पंचदेव: फिर हरी मूंग की 5 ढेरियाँ बनाएं। ये पंचदेव — श्री गणेश, भगवान शिव, भगवान विष्णु, सूर्य देव और माँ दुर्गा — का प्रतीक हैं।
- हर ढेरी पर एक-एक सुपारी रखें (सुपारी को देवता का स्वरूप माना जाता है)। उस पर मौली लपेट सकते हैं और रोली का टीका लगाएं।
- हर ढेरी के ऊपर एक-एक छोटा फूल और थोड़ा अक्षत चढ़ाएं।
नोट: ढेरियों की संख्या और अनाज हर क्षेत्र की परंपरा में थोड़ा अलग होता है (कहीं नवग्रह चावल से बनते हैं)। जो परंपरा आपके घर में चली आ रही है, उसे ही प्राथमिकता दें।
चरण 5: कलश स्थापना
- चौकी पर लक्ष्मी जी की ओर (या चौकी के दाईं ओर, ईशान कोण में) थोड़े गेहूँ या चावल का आसन बनाएं।
- कलश के गले पर मौली बांधें और रोली से स्वस्तिक बनाएं।
- कलश में जल और थोड़ा गंगाजल भरें। उसमें एक सिक्का, सुपारी, हल्दी की गांठ, दूर्वा, अक्षत और एक फूल डालें।
- कलश के मुख पर आम के 5 पत्ते इस तरह लगाएं कि उनकी डंडी पानी में रहे।
- पत्तों के ऊपर एक कटोरी में चावल भरकर रखें और उस पर लाल चुनरी में लिपटा नारियल (जटा ऊपर की ओर) रखें। नारियल पर मौली बांधें।
- कलश को अनाज के आसन पर स्थापित करें। यह कलश वरुण देव और सभी तीर्थों का प्रतीक है।
चरण 6: दीपक और अन्य सामग्री सजाना
- चौकी के दाईं ओर (आपकी दाहिनी तरफ़) घी का बड़ा अखंड दीपक रखें — यह पूरी रात जलेगा। बाईं ओर तेल का दीपक रख सकते हैं।
- एक थाली में 11 या 21 दीये (चौमुखा दीपक बीच में) रखें — ये पूजा के बाद पूरे घर में रखे जाएंगे।
- लक्ष्मी जी के सामने एक थाली में चांदी के सिक्के, गहने, नए नोट, कमलगट्टे, गोमती चक्र और कौड़ियाँ रखें।
- बही-खाता, कलम-दवात और तिजोरी की चाबी भी चौकी के पास रखें।
- खील-बताशे, मिठाई और फल की थाली सामने रखें।
चरण 7: पवित्रीकरण, आचमन और संकल्प
- आसन पर बैठकर बाएं हाथ में जल लें और दाएं हाथ से अपने ऊपर व पूजा सामग्री पर छिड़कते हुए यह मंत्र बोलें:
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ - तीन बार आचमन करें (हथेली में जल लेकर पीएं): ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः और फिर ॐ हृषीकेशाय नमः बोलकर हाथ धो लें।
- अपने और परिवार के सदस्यों के दाहिने हाथ में मौली बांधें और माथे पर तिलक लगाएं।
- संकल्प: दाहिने हाथ में जल, अक्षत, फूल और एक सिक्का लेकर बोलें — "मैं (अपना नाम), गोत्र (अपना गोत्र), आज कार्तिक मास की अमावस्या तिथि, रविवार के दिन, अपने परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य और धन-धान्य की वृद्धि के लिए श्री महालक्ष्मी, श्री गणेश, माँ सरस्वती और कुबेर जी की पूजा कर रहा/रही हूँ। हे माँ, मेरी पूजा स्वीकार करें।" फिर जल ज़मीन पर छोड़ दें।
चरण 8: श्री गणेश पूजन (सबसे पहले)
- हाथ जोड़कर गणेश जी का ध्यान करें:
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ - गणेश जी को जल से स्नान कराएं (फोटो है तो जल के छींटे दें), फिर पंचामृत और दोबारा शुद्ध जल से स्नान।
- वस्त्र / मौली, जनेऊ, रोली-चंदन का तिलक, अक्षत, सिंदूर अर्पित करें।
- 21 दूर्वा (या 3 गांठ) चढ़ाएं — गणेश जी को दूर्वा अत्यंत प्रिय है। लाल फूल और माला अर्पित करें।
- धूप-दीप दिखाएं और मोदक या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं।
- मंत्र जाप करें: ॐ गं गणपतये नमः (11 या 21 बार)।
चरण 9: कलश, नवग्रह, षोडश मातृका और पंचदेव पूजन
- कलश पूजन: कलश पर रोली, अक्षत, फूल चढ़ाकर बोलें — ॐ वरुणाय नमः। मान्यता है कि कलश में सभी देवता और तीर्थ विराजते हैं।
- षोडश मातृका पूजन: चावल की 16 ढेरियों पर रोली, अक्षत, फूल चढ़ाते हुए बोलें — ॐ गौर्यादि षोडश मातृकाभ्यो नमः।
- नवग्रह पूजन: गेहूँ की 9 ढेरियों पर रोली, अक्षत, फूल चढ़ाते हुए बोलें — ॐ सूर्यादि नवग्रहेभ्यो नमः।
- पंचदेव पूजन: मूंग की 5 ढेरियों पर पूजा करते हुए बोलें — ॐ गणेश-शिव-विष्णु-सूर्य-दुर्गा पंचदेवेभ्यो नमः।
- सभी ढेरियों पर एक-एक पान का पत्ता, सुपारी और मिठाई का छोटा टुकड़ा रख सकते हैं।
चरण 10: माँ महालक्ष्मी की षोडशोपचार पूजा
अब लक्ष्मी जी की 16 उपचारों (चरणों) से पूजा करें। हर उपचार के साथ ॐ महालक्ष्म्यै नमः बोलते रहें।
- ध्यान: हाथ जोड़कर माँ का ध्यान करें — ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥
- आवाहन: हाथ में फूल लेकर माँ को घर में पधारने का निमंत्रण दें — "हे माँ लक्ष्मी, मेरे घर पधारें और सदा निवास करें।" फूल चौकी पर छोड़ दें।
- आसन: माँ को आसन के रूप में फूल और अक्षत अर्पित करें।
- पाद्य: माँ के चरण धोने के लिए जल अर्पित करें।
- अर्घ्य: जल में चंदन, अक्षत, फूल मिलाकर अर्घ्य दें।
- आचमन: माँ को आचमन के लिए जल अर्पित करें।
- स्नान: पहले जल, फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर), फिर गंगाजल से स्नान कराएं। फोटो हो तो फूल से जल के छींटे दें।
- वस्त्र: लाल चुनरी या मौली का वस्त्र अर्पित करें।
- श्रृंगार / आभूषण: चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, काजल और सुहाग का सामान अर्पित करें। घर के गहने माँ के सामने रखें।
- गंध: रोली, चंदन, हल्दी, इत्र अर्पित करें।
- पुष्प: कमल का फूल (सबसे प्रिय), गुलाब और फूलमाला अर्पित करें। कमलगट्टे चढ़ाएं।
- धूप: धूप-अगरबत्ती जलाकर दिखाएं।
- दीप: घी का दीपक दिखाएं।
- नैवेद्य: खील, बताशे, मिठाई, खीर, फल और पान का भोग लगाएं। भोग के बाद जल अर्पित करें।
- दक्षिणा / ताम्बूल: पान, सुपारी, लौंग, इलायची और सिक्का अर्पित करें।
- प्रदक्षिणा और नमस्कार: अपने स्थान पर खड़े होकर तीन बार घूमकर परिक्रमा करें और साष्टांग प्रणाम करें।
इसके बाद श्रद्धानुसार लक्ष्मी मंत्र का 108 बार जाप करें:
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः
या सरल मंत्र: ॐ महालक्ष्म्यै नमः
श्री सूक्त या कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना भी बहुत फलदायी माना जाता है।
चरण 11: माँ सरस्वती और कुबेर पूजन
- सरस्वती पूजन: पुस्तकें, कलम और बच्चों की कॉपियाँ माँ सरस्वती के सामने रखें। सफेद फूल, अक्षत चढ़ाकर बोलें — ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।
- कुबेर पूजन: तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रोली से स्वस्तिक बनाएं, फूल-अक्षत चढ़ाएं और बोलें — ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥ तिजोरी में हल्दी की गांठ, कमलगट्टा, गोमती चक्र और चांदी का सिक्का रखें।
चरण 12: बही-खाता (चोपड़ा) और व्यापार पूजन
- नई बही के पहले पन्ने पर रोली से स्वस्तिक बनाएं और "श्री गणेशाय नमः", "शुभ-लाभ" और "ॐ श्री लक्ष्मी जी सदा सहाय" लिखें।
- बही पर रोली, अक्षत, फूल और मौली चढ़ाएं।
- नई कलम-दवात की पूजा करें — यह माँ सरस्वती का स्वरूप है।
- तराजू, कंप्यूटर, कैश बॉक्स पर स्वस्तिक बनाकर पूजा करें।
चरण 13: दीपदान — पूरे घर में दीप जलाना
- पूजा की थाली में रखे सभी दीयों को घी/तेल से भरकर जलाएं और पहले माँ लक्ष्मी को दिखाएं।
- पहला दीपक पूजा स्थान पर, दूसरा मुख्य द्वार के दोनों ओर, फिर तुलसी के पौधे के पास, रसोई में, पानी के स्थान (नल/कुआं) पर, तिजोरी के पास, छत पर और घर के हर कमरे में रखें।
- घर का कोई कोना अंधेरा न रहे। पास के मंदिर और पीपल के पेड़ के नीचे भी एक दीपक जलाएं।
- चौमुखा दीपक मुख्य द्वार पर या आंगन में रखें।
चरण 14: आरती
- पूरा परिवार एक साथ खड़ा होकर पहले गणेश जी की आरती ("जय गणेश जय गणेश देवा") करे।
- फिर माँ लक्ष्मी की आरती ("ॐ जय लक्ष्मी माता") करें। आरती कपूर और घी के दीपक से करें।
- आरती को पहले माँ के चरणों में 4 बार, नाभि पर 2 बार, मुख पर 1 बार और फिर पूरे शरीर पर 7 बार घुमाएं।
- आरती के बाद शंख बजाएं और सभी लोग आरती ग्रहण करें।
चरण 15: पुष्पांजलि और क्षमा प्रार्थना
- हाथों में फूल लेकर माँ को पुष्पांजलि अर्पित करें।
- हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थना करें:
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि। यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥ - माँ से प्रार्थना करें कि वे घर में सदा निवास करें। दिवाली की रात लक्ष्मी जी का विसर्जन नहीं किया जाता — उन्हें घर में ही विराजमान रहने दें।
चरण 16: पूजा के बाद
- प्रसाद (खील-बताशे, मिठाई) पहले परिवार में बांटें, फिर पड़ोसियों और रिश्तेदारों को दें।
- घर के बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लें।
- अखंड दीपक पूरी रात जलना चाहिए — बीच-बीच में घी डालते रहें।
- रात को घर के मुख्य द्वार और खिड़कियाँ कुछ देर खुली रखें, ताकि लक्ष्मी जी का आगमन हो सके।
- अगली सुबह: स्नान करके चौकी की पूजा करें। ढेरियों का अनाज किसी गरीब या गाय को दान करें, या पक्षियों को डाल दें। चौकी के सिक्के, कमलगट्टे और गोमती चक्र लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में रख दें। नारियल का प्रसाद बांटें और कलश का जल पूरे घर में छिड़कें, बचा हुआ जल तुलसी में डाल दें।
व्रत के नियम
✅ दिवाली पर क्या करें
- पूजा प्रदोष काल और वृषभ लग्न के शुभ मुहूर्त में ही करें।
- पूजा से पहले घर, विशेषकर ईशान कोण और मुख्य द्वार को साफ़ रखें।
- घर के मुख्य द्वार पर तोरण, रंगोली और लक्ष्मी जी के पदचिह्न बनाएं।
- लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा अवश्य करें — अकेले लक्ष्मी पूजन नहीं किया जाता।
- लक्ष्मी जी को कमल का फूल, खीर, बताशे और सफेद मिठाई अर्पित करें।
- पूरी रात अखंड दीपक जलाकर रखें।
- दान करें — अन्न, वस्त्र, दीपक या मिठाई ज़रूरतमंदों को दें।
- घर के सभी सदस्य एक साथ पूजा करें; यह परिवार में एकता और प्रेम का प्रतीक है।
- व्रत रखने वाले दिन भर फलाहार करें और पूजा के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करें।
❌ दिवाली पर क्या न करें
- पूजा के समय काले या गहरे नीले रंग के वस्त्र न पहनें।
- लक्ष्मी जी को तुलसी दल अर्पित न करें (तुलसी विष्णु जी को चढ़ती है) और गणेश जी को तुलसी न चढ़ाएं।
- खड़ी मुद्रा वाली लक्ष्मी की मूर्ति घर में पूजा के लिए न रखें — बैठी हुई (कमलासन) लक्ष्मी ही स्थिर लक्ष्मी मानी जाती हैं।
- खंडित (टूटी हुई) मूर्ति या फटा हुआ फोटो पूजा में न रखें।
- इस दिन किसी को उधार न दें और न ही कर्ज़ लें।
- घर में झगड़ा, कलह, अपशब्द और किसी का अपमान न करें — जहाँ कलह होती है, वहाँ लक्ष्मी नहीं ठहरतीं।
- मांस, मदिरा, जुआ और नशे से पूरी तरह दूर रहें।
- पूजा के बाद रात भर घर को अंधेरा न छोड़ें और झाड़ू न लगाएं।
- दिन में न सोएं (बीमार, वृद्ध और बच्चों को छूट है)।
- पटाखे सावधानी से चलाएं; बच्चों के साथ बड़ों का होना ज़रूरी है। पशु-पक्षियों का ध्यान रखें।
दिवाली — व्रत कथा
दिवाली — आरती
दिवाली — चालीसा
दिवाली — मंत्र
लक्ष्मी गायत्री (Lakshmi Gayatri)
पढ़ें → 🕉️श्री लक्ष्मी अष्टक (Namastestu Mahā Māye) | Lakshmi Ashtakam — मंत्र, अर्थ व उपयोग
पढ़ें → 🕉️श्री लक्ष्मीनारायण स्तोत्र / नमो नारायण (short stotras) | Lakshmi‑Narayana — मंत्र व पाठ
पढ़ें → 🕉️श्री महालक्ष्मी अष्टक ( Shri Mahalakshmi Ashtakam )
पढ़ें → 🕉️महालक्ष्मी बीज (Mahalakshmi Bīja)
पढ़ें →दिवाली — तीर्थ स्थल
Hinglish
Diwali 2026 kab hai? Ravivar, 8 November 2026. Lakshmi Puja ka shubh muhurat shaam 05:54 se 07:50 tak (New Delhi) hai.
Chowki kaise lagayein: Pooja sthan ko Gangajal se shuddh karein. Lakdi ki chowki rakhein aur us par naya laal kapda bichhayein. Beech mein roli se swastik banayein aur thode akshat rakhein.
Lakshmi-Ganesh ko virajman karna: Pehle chawal ka chhota aasan banayein, phir Ganesh ji ki murti ya photo rakhein, uske baad Lakshmi ji ki. Maa Lakshmi, Ganesh ji ke daahine haath ki taraf virajti hain — yaani saamne baithne par Ganesh ji aapke daayein aur Lakshmi ji aapke baayein dikhengi. Murti ka mukh purv ya paschim ki taraf ho.
Dheriyan (kuddiyan) banana: Murti ke saamne chawal ki 16 dheriyan (Shodash Matrika), gehu ki 9 dheriyan (Navgrah) aur moong ki 5 dheriyan (Panchdev) banayein. Har dheri par ek supari rakhein aur roli-akshat chadhayein.
Kalash sthapana: Kalash mein jal, sikka, supari, haldi, durva daalein. Upar aam ke 5 patte aur laal chunri mein lipta nariyal rakhein.
Pooja ka kram: Pavitrikaran aur sankalp → Ganesh pooja → Kalash, Shodash Matrika, Navgrah aur Panchdev pooja → Maa Lakshmi ki shodashopchar pooja → Saraswati aur Kuber pooja → Bahi-khata pooja → Deepdaan → Ganesh ji aur Lakshmi ji ki aarti → Kshama prarthana.
Lakshmi Mantra: Om Shreem Hreem Shreem Kamale Kamalalaye Praseed Praseed Shreem Hreem Shreem Om Mahalakshmyai Namah.
Dhyan rakhein: Akhand deepak poori raat jalta rahe, Lakshmi ji ka visarjan us raat na karein, aur kisi ko udhaar na dein.
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दिवाली 2026 कब है?
दिवाली 2026 में रविवार, 8 नवंबर को मनाई जाएगी। इसी शाम प्रदोष काल में अमावस्या तिथि रहेगी।
दिवाली 2026 में लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?
नई दिल्ली के अनुसार लक्ष्मी पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त शाम 05:54 से 07:50 तक (प्रदोष काल + वृषभ लग्न) है। अन्य शहरों में समय कुछ मिनट आगे-पीछे होगा।
अमावस्या तिथि कब से कब तक है?
अमावस्या 8 नवंबर 2026 को सुबह लगभग 11:27 बजे से 9 नवंबर को दोपहर लगभग 12:31 बजे तक रहेगी।
धनतेरस 2026 कब है?
धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को है।
गोवर्धन पूजा और भाई दूज 2026 कब है?
गोवर्धन पूजा मंगलवार, 10 नवंबर और भाई दूज बुधवार, 11 नवंबर 2026 को है।
लक्ष्मी जी को गणेश जी के किस ओर बिठाना चाहिए?
मान्यता है कि लक्ष्मी जी, गणेश जी के दाहिने हाथ की ओर विराजती हैं — यानी सामने बैठने पर गणेश जी आपके दाईं ओर और लक्ष्मी जी बाईं ओर दिखेंगी। अपनी कुल-परंपरा को प्राथमिकता दें।
चौकी पर कौन से रंग का कपड़ा बिछाएं?
लक्ष्मी पूजा की चौकी पर लाल रंग का नया कपड़ा बिछाना शुभ माना जाता है, क्योंकि लाल रंग माँ लक्ष्मी को प्रिय है।
चावल, गेहूँ और मूंग की ढेरियाँ क्यों बनाई जाती हैं?
चावल की 16 ढेरियाँ षोडश मातृका, गेहूँ की 9 ढेरियाँ नवग्रह और मूंग की 5 ढेरियाँ पंचदेव का आसन मानी जाती हैं। इनकी पूजा से सभी देवताओं और ग्रहों का आशीर्वाद मिलता है।
दिवाली पूजा किस दिशा में करनी चाहिए?
पूजा घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या उत्तर दिशा में करें और पूजा करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर की ओर हो।
क्या दिवाली की रात लक्ष्मी जी का विसर्जन करते हैं?
नहीं, दिवाली की रात लक्ष्मी जी का विसर्जन नहीं किया जाता। उन्हें घर में विराजमान रहने दिया जाता है और अगली सुबह पूजा करके ढेरियों का अनाज दान किया जाता है।
दिवाली पर लक्ष्मी जी को क्या भोग लगाएं?
खील, बताशे, खीर, सफेद मिठाई, सिंघाड़ा, अनार और पान का बीड़ा माँ लक्ष्मी को अर्पित करना शुभ माना जाता है। गणेश जी को मोदक या बेसन के लड्डू चढ़ाएं।
दिवाली पर कितने दीपक जलाने चाहिए?
कम से कम 11, 21 या 51 दीपक जलाने की परंपरा है। एक घी का अखंड दीपक पूजा स्थान पर पूरी रात जलना चाहिए।