परिचय
सकट चौथ पर माताएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक व्रत रखती हैं। शाम को भगवान गणेश और सकट माता की पूजा की जाती है, तिलकुट, शकरकंद और गुड़ का भोग लगाया जाता है, सकट चौथ की कथा सुनी जाती है और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है।
नीचे पूजा की सामग्री और व्रत की पूरी विधि क्रम से दी गई है। हर परिवार की परंपरा में थोड़ा अंतर होता है — अपनी कुल-परंपरा को प्राथमिकता दें।
सकट चौथ (तिलकुटा चौथ) का महत्व
सकट चौथ 2027 कब है?
वर्ष 2027 में सकट चौथ का व्रत सोमवार, 25 जनवरी 2027 को रखा जाएगा। यह माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी है (अमांत पंचांग वाले क्षेत्रों में इसे पौष कृष्ण चतुर्थी कहते हैं — तिथि वही है)। इसे लंबोदर संकष्टी चतुर्थी भी कहते हैं।
- चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 25 जनवरी 2027, सुबह लगभग 08:10 बजे
- चतुर्थी तिथि समाप्त: 26 जनवरी 2027, सुबह लगभग 06:00 बजे
- चंद्रोदय (नई दिल्ली): 25 जनवरी, रात लगभग 09:12 से 09:16 के बीच
- चंद्रोदय (पुणे): रात लगभग 09:32 बजे
चंद्रोदय का समय हर शहर में अलग होता है और बादल या कोहरे के कारण चाँद कुछ देर से दिख सकता है। जनवरी में कोहरा अधिक होता है — चाँद न दिखे तो पंचांग के चंद्रोदय समय के बाद पूर्व दिशा में अर्घ्य दे सकते हैं।
सकट चौथ का महत्व
सकट चौथ पर भगवान श्री गणेश और सकट माता की पूजा की जाती है। "सकट" शब्द "संकट" से बना है — मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से भगवान गणेश संतान के सभी संकट दूर करते हैं और उसे लंबी आयु, अच्छा स्वास्थ्य और सफलता देते हैं।
- संतान के लिए व्रत: यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपने बेटे-बेटियों की रक्षा और दीर्घायु के लिए रखती हैं। नि:संतान दंपति संतान प्राप्ति की कामना से भी यह व्रत करते हैं।
- तिल का महत्व: माघ के महीने में कड़ाके की ठंड होती है, इसलिए इस व्रत में तिल और गुड़ का विशेष प्रयोग होता है। तिल-गुड़ से बना तिलकुट इस दिन का मुख्य प्रसाद है, इसीलिए इसे "तिलकुटा चौथ" कहते हैं।
- वर्ष की सबसे बड़ी संकष्टी: साल में बारह संकष्टी चतुर्थी आती हैं, लेकिन माघ की सकट चौथ सबसे प्रमुख मानी जाती है।
- चंद्र दर्शन से पूर्णता: संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही पूरा होता है।
सकट चौथ की व्रत कथा — कुम्हार का आवां और बुढ़िया का बेटा
एक नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार उसने बर्तन पकाने के लिए आवां (भट्ठी) लगाया, लेकिन बर्तन पक ही नहीं रहे थे। कई दिन बीत गए, पर आवां नहीं पका। परेशान होकर कुम्हार राजा के पास गया। राजा ने राजपुरोहित से उपाय पूछा। राजपुरोहित ने कहा — "हर बार आवां लगाते समय एक बच्चे की बलि देनी होगी, तभी आवां पकेगा।"
राजा का आदेश हो गया कि नगर के हर परिवार से बारी-बारी से एक बच्चा बलि के लिए दिया जाएगा। कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। फिर एक बूढ़ी माँ की बारी आई, जिसका एक ही बेटा था — उसके बुढ़ापे का सहारा। उस दिन सकट चौथ थी।
बुढ़िया बहुत दुखी हुई, पर उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपने बेटे को सकट माता की सुपारी और दूब का बीड़ा देकर कहा — "बेटा, भगवान का नाम लेकर आवां में बैठ जाना। सकट माता तेरी रक्षा करेंगी।" बेटे को आवां में बैठा दिया गया और बुढ़िया पूरे दिन सकट माता के सामने बैठकर व्रत रखकर प्रार्थना करती रही।
आमतौर पर आवां पकने में कई दिन लगते थे, लेकिन उस बार आवां एक ही रात में पक गया। सुबह जब कुम्हार ने आवां खोला, तो सब हैरान रह गए — बुढ़िया का बेटा पूरी तरह सुरक्षित, हंसता-खेलता बैठा था। और इतना ही नहीं, पहले जिन बच्चों की बलि दी गई थी, वे सभी भी जीवित हो गए थे।
यह चमत्कार देखकर पूरे नगर ने सकट माता और भगवान गणेश की महिमा को स्वीकार किया। राजा ने बलि प्रथा बंद करवा दी। तभी से माताएं अपनी संतान की रक्षा के लिए सकट चौथ का व्रत रखती हैं।
हे सकट माता! जैसे बुढ़िया के बेटे की रक्षा की, वैसे ही सबकी संतान की रक्षा करना। कहानी कहने वाले, सुनने वाले और हुंकारा भरने वाले — सबकी मनोकामना पूर्ण करना।
भगवान गणेश और कार्तिकेय की परिक्रमा कथा
एक बार देवताओं पर संकट आया तो वे भगवान शिव के पास सहायता मांगने पहुंचे। भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों — कार्तिकेय और गणेश — से पूछा कि कौन देवताओं का संकट दूर करेगा। दोनों ने हामी भरी। तब शिव जी ने कहा — "जो सबसे पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा, वही यह कार्य करेगा।"
कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। गणेश जी का वाहन चूहा था, जिससे पृथ्वी की परिक्रमा में बहुत समय लगता। गणेश जी ने बुद्धि से काम लिया — उन्होंने अपने माता-पिता, भगवान शिव और माता पार्वती की सात बार परिक्रमा की और बैठ गए।
जब शिव जी ने इसका कारण पूछा, तो गणेश जी बोले — "माता-पिता के चरणों में ही सारा संसार है।" उनकी बुद्धि और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें देवताओं का संकट दूर करने का कार्य सौंपा और आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारी पूजा करेगा और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देगा, उसके सभी संकट दूर होंगे। तभी से गणेश जी को "संकटहर्ता" और "विघ्नहर्ता" कहा जाता है।
तिलकुट का बकरा — एक पारंपरिक रस्म
उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कई परिवारों में सकट चौथ पर तिल और गुड़ से बकरा (या पहाड़) बनाया जाता है। पूजा के बाद घर का कोई बच्चा या बेटा इसे काटता है, जिसे "बकरा काटना" कहते हैं। यह प्रतीकात्मक रस्म है — बिना किसी जीव हिंसा के तिलकुट से ही यह परंपरा निभाई जाती है, और फिर यही तिलकुट प्रसाद के रूप में सबमें बांटा जाता है।
पूजा सामग्री
पूजा स्थापना के लिए
- लकड़ी की चौकी और लाल या पीला कपड़ा
- भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र
- सकट माता के लिए — गोबर या मिट्टी से बनी आकृति, या सुपारी पर मौली लपेटकर (कई परिवारों में दीवार पर गेरू से चित्र)
- जल से भरा कलश
- गंगाजल
पूजन सामग्री
- रोली (कुमकुम), हल्दी, चंदन, अक्षत (साबुत चावल), सिंदूर
- मौली (कलावा), जनेऊ
- दूर्वा (21 दूर्वा — गणेश जी को अति प्रिय)
- लाल और पीले फूल, फूलमाला
- घी का दीपक, धूप-अगरबत्ती, कपूर
- सुपारी, पान के पत्ते, लौंग, इलायची
भोग और प्रसाद
- तिलकुट — तिल और गुड़ को कूटकर बनाया गया (बकरा या पहाड़ के आकार में भी)
- तिल के लड्डू
- शकरकंद (उबली हुई या भुनी हुई)
- गुड़, गन्ना, बेर, अमरूद, केला
- मोदक या बेसन के लड्डू (गणेश जी के लिए)
चंद्र अर्घ्य के लिए
- तांबे या चांदी का लोटा
- जल, थोड़ा कच्चा दूध, काले तिल, अक्षत और सफेद फूल
- एक दीपक
पूजा विधि
चरण 1: सुबह — स्नान और संकल्प
- सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। नहाने के पानी में थोड़े काले तिल डाल सकते हैं।
- साफ़ वस्त्र पहनें — लाल, पीला या केसरिया रंग शुभ है।
- भगवान गणेश के सामने दीपक जलाएं और हाथ में जल, अक्षत, दूर्वा और फूल लेकर संकल्प लें — "मैं (अपना नाम) अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और सभी संकटों से रक्षा के लिए आज सकट चौथ का व्रत रख रही हूँ। हे गणपति, हे सकट माता, मेरा व्रत सफल करें।"
- व्रत अपनी परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार रखें — कई माताएं निर्जला व्रत रखती हैं, कई फलाहार करती हैं।
चरण 2: दिन में तिलकुट बनाना
- काले या सफेद तिल को धीमी आंच पर हल्का भून लें।
- भुने तिल और गुड़ को ओखली में कूटकर या मिक्सी में दरदरा पीसकर मिला लें — यही तिलकुट है।
- कई परिवारों में तिलकुट से बकरा या पहाड़ का आकार बनाया जाता है।
- शकरकंद को उबाल या भून लें।
चरण 3: शाम को पूजा स्थापना
- शाम को चंद्रोदय से पहले फिर से हाथ-मुंह धोकर पूजा की तैयारी करें।
- पूजा स्थान पर चौकी रखकर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं।
- चौकी पर भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- गणेश जी के पास सकट माता को स्थापित करें — गोबर या मिट्टी से बनी आकृति, या मौली लिपटी सुपारी के रूप में।
- चौकी पर जल से भरा कलश रखें।
चरण 4: गणेश जी और सकट माता की पूजा
- भगवान गणेश का ध्यान करें:
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ - गणेश जी को गंगाजल से स्नान कराएं (चित्र हो तो छींटे दें), फिर रोली-चंदन का तिलक, अक्षत, जनेऊ, लाल फूल और 21 दूर्वा अर्पित करें।
- सकट माता को रोली, सिंदूर, अक्षत, फूल और मौली अर्पित करें।
- धूप-दीप दिखाएं और तिलकुट, तिल के लड्डू, शकरकंद, गुड़, फल और मोदक का भोग लगाएं।
- मंत्र जाप करें: ॐ गं गणपतये नमः (108 बार) या ॐ लंबोदराय नमः
चरण 5: सकट चौथ की कथा
- हाथ में थोड़े तिल, गुड़ और दूर्वा लेकर बैठें और सकट चौथ की कथा (कुम्हार के आवां और बुढ़िया के बेटे की कहानी, ऊपर दी गई है) सुनें या पढ़ें।
- कथा के बीच-बीच में हुंकारा भरें।
- कथा के बाद हाथ के तिल-गुड़ भगवान को अर्पित कर दें।
- जिन परिवारों में तिलकुट का बकरा बनाया जाता है, वहाँ कथा के बाद घर का बच्चा उसे काटता है।
- भगवान गणेश की आरती ("जय गणेश जय गणेश देवा") करें।
चरण 6: चंद्रमा को अर्घ्य (चंद्रोदय के बाद — दिल्ली में रात लगभग 09:12-09:16)
- चाँद निकलने पर छत या खुली जगह पर जाएं।
- तांबे या चांदी के लोटे में जल, थोड़ा कच्चा दूध, काले तिल, अक्षत और सफेद फूल डालें।
- चंद्रमा की ओर मुख करके धीरे-धीरे अर्घ्य दें और यह मंत्र बोलें:
ॐ सों सोमाय नमः
या: गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक॥ - चंद्रमा को तिलकुट का भोग दिखाएं और संतान की रक्षा व दीर्घायु की प्रार्थना करें।
- अपने स्थान पर खड़े होकर परिक्रमा करें।
चरण 7: व्रत खोलना
- चंद्र अर्घ्य के बाद सबसे पहले तिलकुट या शकरकंद खाकर व्रत खोलें।
- इसके बाद सात्विक भोजन करें।
- तिलकुट का प्रसाद परिवार, पड़ोसियों और रिश्तेदारों में बांटें।
- अपनी संतान को तिलकुट खिलाकर आशीर्वाद दें।
व्रत के नियम
✅ सकट चौथ पर क्या करें
- सुबह स्नान करके संतान की रक्षा के लिए व्रत का संकल्प लें।
- भगवान गणेश को 21 दूर्वा अवश्य अर्पित करें।
- तिलकुट, तिल के लड्डू और शकरकंद का भोग लगाएं।
- शाम को सकट चौथ की कथा अवश्य सुनें — बिना कथा के व्रत अधूरा माना जाता है।
- चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को तिल मिले जल से अर्घ्य देकर ही व्रत खोलें।
- तिल, गुड़ और गर्म कपड़ों का दान करें।
- संतान को तिलकुट का प्रसाद अवश्य खिलाएं।
❌ सकट चौथ पर क्या न करें
- चंद्रमा को अर्घ्य देने से पहले व्रत न खोलें।
- गणेश जी को तुलसी अर्पित न करें।
- इस दिन मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज़ और तामसिक भोजन से दूर रहें।
- किसी से झगड़ा, अपमान या कटु वचन न बोलें।
- पूजा में काले रंग के कपड़े पहनने से बचें।
- चूहों को न मारें — चूहा गणेश जी का वाहन है।
- बीमार, गर्भवती महिलाएं और दवा लेने वाली माताएं निर्जला व्रत न रखें — फलाहार या जल लेकर व्रत रखें।
सकट चौथ (तिलकुटा चौथ) — व्रत कथा
सकट चौथ (तिलकुटा चौथ) — आरती
सकट चौथ (तिलकुटा चौथ) — चालीसा
Hinglish
Sakat Chauth 2027 kab hai? Somvar, 25 January 2027. Chaturthi tithi 25 January subah 08:10 se 26 January subah 06:00 tak. Chandroday New Delhi mein raat lagbhag 09:12-09:16 ke beech.
Vrat kisliye: Maayein apni santaan ki lambi aayu aur raksha ke liye Bhagwan Ganesh aur Sakat Mata ka vrat rakhti hain.
Puja vidhi: Subah snaan karke sankalp lein. Til aur gud kootkar tilkut banayein. Shaam ko chowki par Ganesh ji aur Sakat Mata sthapit karein, roli, akshat, 21 durva aur phool chadhayein, tilkut, shakarkand aur gud ka bhog lagayein. Sakat Chauth ki katha sunein aur Ganesh aarti karein.
Chand ko arghya: Chand nikalne par taambe ke lote mein jal, kachcha doodh, kaale til aur phool daalkar arghya dein, phir tilkut ya shakarkand khaakar vrat kholein.
Dhyan rakhein: Ganesh ji ko tulsi na chadhayein aur chand ko arghya dene se pehle vrat na kholein.
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सकट चौथ 2027 कब है?
सकट चौथ 2027 में सोमवार, 25 जनवरी को है।
चतुर्थी तिथि कब से कब तक है?
चतुर्थी तिथि 25 जनवरी 2027 को सुबह लगभग 08:10 बजे से 26 जनवरी को सुबह लगभग 06:00 बजे तक रहेगी।
सकट चौथ 2027 में चाँद कितने बजे निकलेगा?
नई दिल्ली में 25 जनवरी को चंद्रोदय रात लगभग 09:12 से 09:16 के बीच होगा। पुणे में लगभग 09:32 बजे चाँद निकलेगा।
सकट चौथ का व्रत कौन रखता है?
सकट चौथ का व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और संकटों से रक्षा के लिए रखती हैं। संतान प्राप्ति की कामना से भी यह व्रत किया जाता है।
सकट चौथ पर किसकी पूजा होती है?
सकट चौथ पर भगवान गणेश और सकट माता की पूजा होती है और रात को चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।
सकट चौथ को तिलकुटा चौथ क्यों कहते हैं?
इस दिन तिल और गुड़ को कूटकर बनाए गए तिलकुट का भोग लगाया जाता है और उसी से व्रत खोला जाता है, इसलिए इसे तिलकुटा चौथ कहते हैं।
सकट चौथ की कथा क्या है?
एक कुम्हार का आवां नहीं पक रहा था, तो राजा ने बच्चों की बलि का आदेश दिया। सकट चौथ के दिन एक बुढ़िया के बेटे की बारी आई। बुढ़िया ने सकट माता का व्रत रखा और उसका बेटा आवां से सुरक्षित निकला, साथ ही पहले बलि दिए गए बच्चे भी जीवित हो गए।
सकट चौथ में व्रत कैसे खोलते हैं?
चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को जल, दूध और तिल से अर्घ्य देकर तिलकुट या शकरकंद खाकर व्रत खोला जाता है।
सकट चौथ पर तिलकुट का बकरा क्यों काटते हैं?
यह एक प्रतीकात्मक पारंपरिक रस्म है। तिल-गुड़ से बकरे का आकार बनाकर घर का बच्चा उसे काटता है और फिर उसे प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। इसमें किसी जीव की हिंसा नहीं होती।
सकट चौथ को और किन नामों से जाना जाता है?
सकट चौथ को तिलकुटा चौथ, संकट चौथ, माघी चौथ, वक्रतुंडी चतुर्थी और लंबोदर संकष्टी चतुर्थी भी कहते हैं।
क्या सकट चौथ पर गणेश जी को तुलसी चढ़ा सकते हैं?
नहीं, गणेश जी की पूजा में तुलसी अर्पित नहीं की जाती। उन्हें दूर्वा अर्पित करें।