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सफला एकादशी 2027: तिथि, पारण समय, पूजा विधि, व्रत कथा और नियम

पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को सफला एकादशी कहते हैं। जैसा नाम है, वैसा ही फल — मान्यता है कि यह व्रत हर कार्य में सफलता देने वाला है। पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इसका महत्व बताते हुए कहा है कि जैसे नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़ और देवताओं में भगवान विष्णु श्रेष्ठ हैं, वैसे ही व्रतों में एकादशी श्रेष्ठ है। इस पेज पर व्रत की तिथि, पारण, पूजा विधि, राजकुमार लुम्पक की कथा और नियम विस्तार से दिए गए हैं।

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तारीख 3 जनवरी 2027, रविवार
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हिंदू तिथि पौष कृष्ण एकादशी
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शुभ मुहूर्त व्रत 3 जनवरी | पारण 4 जनवरी सुबह सूर्योदय के बाद (उज्जैन: 07:13 से 09:20 AM)
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पूज्य देवता भगवान विष्णु (अच्युत / नारायण)
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परिचय

सफला एकादशी पर भगवान विष्णु के अच्युत और नारायण स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दिन व्रत रखकर भगवान को मौसमी फल अर्पित किए जाते हैं, शाम को दीपदान किया जाता है और रात को भजन-कीर्तन के साथ जागरण किया जाता है। अगले दिन द्वादशी को पारण करके व्रत पूरा होता है।

नीचे व्रत से एक दिन पहले की तैयारी, एकादशी की पूजा, रात्रि जागरण और पारण की पूरी विधि क्रम से दी गई है।

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सफला एकादशी का महत्व

सफला एकादशी 2027 कब है?

सफला एकादशी का व्रत रविवार, 3 जनवरी 2027 को रखा जाएगा। यह पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव, दोनों परंपराओं में यह व्रत इसी दिन है।

  • एकादशी तिथि प्रारंभ: 2 जनवरी 2027 (शनिवार), दोपहर लगभग 02:24 बजे
  • एकादशी तिथि समाप्त: 3 जनवरी 2027 (रविवार), शाम लगभग 04:08 बजे
  • व्रत का दिन: 3 जनवरी 2027, रविवार
  • पारण (व्रत खोलने) का दिन: 4 जनवरी 2027, सोमवार — सूर्योदय के बाद, सुबह के समय। उज्जैन के अनुसार पारण का समय सुबह 07:13 से 09:20 तक है।

पारण का समय सूर्योदय के अनुसार हर शहर में कुछ मिनट अलग होता है। द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले और सुबह के समय पारण कर लेना सबसे उत्तम है। अपने शहर के सटीक समय के लिए स्थानीय पंचांग देखें।

ध्यान दें: 2027 में सफला एकादशी दो बार आएगी — पहली 3 जनवरी को और दूसरी 23 दिसंबर को (पौष मास साल में दो बार पड़ने के कारण)। यह पेज 3 जनवरी वाली सफला एकादशी के लिए है।

सफला एकादशी का महत्व

"सफला" का अर्थ है सफलता देने वाली। पद्म पुराण में वर्णन है कि सफला एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के सभी कार्य सफल होते हैं, पापों का नाश होता है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

  • भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा था कि सफला एकादशी का व्रत करने से जो पुण्य मिलता है, वह हज़ारों वर्षों की तपस्या से भी नहीं मिलता।
  • इस एकादशी पर भगवान विष्णु के अच्युत स्वरूप और भगवान नारायण की पूजा की जाती है।
  • इस दिन भगवान को ऋतुफल — नारियल, अनार, आंवला, बेर, सुपारी, नींबू, अमरूद आदि — अर्पित करने का विशेष विधान है।
  • रात को दीपदान और जागरण का विशेष महत्व बताया गया है।
  • यह व्रत नए वर्ष की शुरुआत में पड़ रहा है, इसलिए पूरे वर्ष की सफलता और शुभता की कामना के साथ इसे करना बहुत फलदायी माना जाता है।

सफला एकादशी व्रत कथा — राजकुमार लुम्पक की कहानी

प्राचीन काल में चंपावती नगरी में राजा महिष्मत राज्य करते थे। उनके पाँच पुत्र थे। उनमें सबसे बड़ा पुत्र लुम्पक बहुत दुराचारी था। वह जुआ खेलता, मांस-मदिरा का सेवन करता, साधु-संतों और ब्राह्मणों का अपमान करता और प्रजा को परेशान करता था। पिता के धन को वह बुरे कामों में उड़ा देता था।

जब राजा को लुम्पक के कुकर्मों का पता चला, तो उन्होंने दुखी होकर उसे राज्य से निकाल दिया। लुम्पक जंगल में चला गया और वहाँ एक पुराने पीपल के पेड़ के नीचे रहने लगा। वह दिन में जंगल के जानवरों का शिकार करता और कभी-कभी रात को नगर में जाकर चोरी करता। फिर भी पिता का पुत्र होने के कारण लोग उसे कुछ नहीं कहते थे।

एक बार पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी की रात बहुत कड़ाके की ठंड पड़ी। लुम्पक के पास ओढ़ने के लिए कुछ नहीं था। वह पूरी रात ठंड से कांपता रहा और सो नहीं सका। सुबह होते-होते ठंड से उसका शरीर अकड़ गया और वह बेहोश हो गया।

अगले दिन एकादशी को दोपहर में सूरज की गर्मी से उसे होश आया। शरीर में इतनी कमज़ोरी थी कि वह शिकार करने नहीं जा सका। बड़ी मुश्किल से उसने आसपास गिरे कुछ फल इकट्ठे किए। तब तक सूर्यास्त हो चुका था। भूख होते हुए भी वह कुछ खा न सका और दुखी होकर फलों को पीपल के पेड़ की जड़ में रखते हुए बोला — "हे भगवान! ये फल आप ही ग्रहण कीजिए।" उस रात भी ठंड के कारण वह सो नहीं सका और पूरी रात जागता रहा।

इस तरह अनजाने में ही लुम्पक से सफला एकादशी का व्रत, भगवान को फल अर्पण और रात्रि जागरण हो गया। भगवान विष्णु उसके इस अनजाने व्रत से ही प्रसन्न हो गए। अगली सुबह आकाशवाणी हुई — "हे राजकुमार! सफला एकादशी के प्रभाव से तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो गए हैं। अब तुम अपने पिता के पास लौट जाओ और राज्य संभालो।"

उसी समय एक दिव्य घोड़ा उसके पास आकर खड़ा हो गया। लुम्पक का मन पूरी तरह बदल चुका था। वह अपने पिता के पास लौटा और उनसे क्षमा मांगी। राजा महिष्मत ने प्रसन्न होकर उसे राज्य सौंप दिया। लुम्पक ने धर्मपूर्वक राज्य किया, हर एकादशी का व्रत रखा और अंत में वैकुंठ धाम को प्राप्त हुआ।

शिक्षा: जब अनजाने में किए गए सफला एकादशी के व्रत से एक पापी का भी उद्धार हो गया, तो श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया व्रत निश्चित ही हर कार्य में सफलता देता है।

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पूजा सामग्री

पूजन सामग्री

  • लकड़ी की चौकी और पीला कपड़ा
  • भगवान विष्णु / श्रीकृष्ण / लड्डू गोपाल की मूर्ति या चित्र
  • गंगाजल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • पीला चंदन, रोली, हल्दी, अक्षत, मौली
  • पीले फूल और फूलमाला
  • तुलसी दल (दशमी को ही तोड़कर रख लें)
  • पीले वस्त्र, जनेऊ
  • घी का दीपक, धूप-अगरबत्ती, कपूर
  • शंख और घंटी

फलों का भोग (सफला एकादशी पर विशेष)

  • नारियल
  • अनार, अमरूद, बेर, संतरा, केला
  • आंवला, नींबू
  • सुपारी, लौंग, इलायची
  • मौसम में उपलब्ध कोई भी ताज़ा फल

भोग और प्रसाद

  • पंजीरी, मखाने या साबूदाने की खीर
  • मिठाई, गुड़, सूखे मेवे

दीपदान और दान के लिए

  • मिट्टी के दीये, घी या तिल का तेल
  • दान के लिए अन्न, तिल, गुड़, कंबल, गर्म वस्त्र (सर्दियों में विशेष रूप से)
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पूजा विधि

चरण 1: एक दिन पहले — दशमी (2 जनवरी)

  • दशमी को सूर्यास्त से पहले सात्विक भोजन कर लें। रात को चावल, प्याज़-लहसुन और भारी भोजन न खाएं।
  • पूजा के लिए तुलसी दल दशमी को ही तोड़कर रख लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
  • मन में भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए अगले दिन व्रत रखने का संकल्प करें।

चरण 2: एकादशी की सुबह — स्नान और संकल्प (3 जनवरी)

  • ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें।
  • पीले या साफ़ वस्त्र पहनें और पूजा स्थान पर चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  • हाथ में जल, अक्षत, फूल और तुलसी दल लेकर संकल्प लें — "मैं (अपना नाम) भगवान अच्युत की प्रसन्नता, पापों के नाश और अपने सभी कार्यों में सफलता के लिए आज सफला एकादशी का व्रत रख रहा/रही हूँ। हे प्रभु, मेरा व्रत निर्विघ्न पूर्ण करें।"
  • व्रत अपनी क्षमता के अनुसार रखें — निर्जला, केवल जल वाला या फलाहारी।

चरण 3: भगवान विष्णु (अच्युत) की पूजा

  • सबसे पहले श्री गणेश का स्मरण करें — ॐ गं गणपतये नमः
  • भगवान विष्णु को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं, फिर शुद्ध जल से।
  • पीले वस्त्र, जनेऊ, पीला चंदन, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें।
  • ऋतुफल अर्पित करें — नारियल, अनार, आंवला, बेर, अमरूद, सुपारी, नींबू आदि। सफला एकादशी पर फलों का भोग विशेष फलदायी माना गया है।
  • धूप-दीप दिखाएं और मंत्र जाप करें:
    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (108 बार)
    या ॐ अच्युताय नमः
  • विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और सफला एकादशी की व्रत कथा (ऊपर दी गई है) सुनें या पढ़ें।
  • "ॐ जय जगदीश हरे" आरती करें।

चरण 4: शाम को दीपदान

  • शाम को घर के मंदिर, तुलसी के पौधे, मुख्य द्वार और पीपल के पेड़ के नीचे घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं।
  • संभव हो तो पास के विष्णु मंदिर में जाकर दीपदान करें।
  • सफला एकादशी पर दीपदान का विशेष पुण्य बताया गया है।

चरण 5: रात्रि जागरण

  • रात को भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन करें। राजकुमार लुम्पक की कथा में भी रात्रि जागरण का ही प्रभाव बताया गया है।
  • "हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे" महामंत्र या "ॐ नमो नारायणाय" का जाप करें।
  • पूरी रात न जाग सकें तो कम से कम रात के पहले प्रहर तक भजन करें।

चरण 6: पारण — व्रत खोलना (4 जनवरी, सोमवार)

  • द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और तुलसी दल अर्पित करें।
  • किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराएं और अन्न, तिल, गुड़ या कंबल का दान करें।
  • सूर्योदय के बाद, सुबह के समय (उज्जैन के अनुसार 07:13 से 09:20) व्रत खोलें।
  • सबसे पहले भगवान का चरणामृत या तुलसी दल ग्रहण करें, फिर सात्विक भोजन से पारण करें।
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व्रत के नियम

✅ सफला एकादशी पर क्या करें

  • दशमी की रात से ही सात्विक रहें और एकादशी पर सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु को ऋतुफल अवश्य अर्पित करें।
  • पूजा में तुलसी दल चढ़ाएं (दशमी को ही तोड़ लें)।
  • शाम को दीपदान करें और रात को जागरण-कीर्तन करें।
  • सफला एकादशी की व्रत कथा अवश्य सुनें या पढ़ें।
  • सर्दी के मौसम को देखते हुए ज़रूरतमंदों को कंबल और गर्म कपड़े दान करें।
  • द्वादशी को सही समय पर पारण करें।

❌ सफला एकादशी पर क्या न करें

  • एकादशी के दिन चावल और चावल से बनी चीज़ें न खाएं।
  • एकादशी पर तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
  • मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज़, मसूर दाल और तामसिक भोजन से दूर रहें।
  • दिन में न सोएं (बीमार, बुज़ुर्ग और बच्चों को छूट है)।
  • झूठ, निंदा, क्रोध और किसी का अपमान न करें।
  • बाल और नाखून न काटें।
  • पारण का समय निकल जाने के बाद व्रत न खोलें।
  • बीमार, गर्भवती महिलाएं और दवा लेने वाले लोग निर्जला व्रत न रखें — फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रखें।
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सफला एकादशी — आरती

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Hinglish

Saphala Ekadashi 2027 kab hai? Ravivar, 3 January 2027. Ekadashi tithi 2 January dopahar 02:24 se 3 January shaam 04:08 tak. Paaran 4 January (Somvar) ki subah suryoday ke baad (Ujjain: 07:13 se 09:20).

Dhyan dein: 2027 mein Saphala Ekadashi do baar hai — 3 January aur 23 December.

Puja vidhi: Dashami ko satvik bhojan aur tulsi pehle tod lein. Ekadashi ko snaan karke sankalp lein, Vishnu ji ko panchamrit snaan, peele phool, chandan, tulsi aur mausami phal (nariyal, anaar, aamla, ber, supari) chadhayein. "Om Namo Bhagavate Vasudevaya" ka jaap karein, katha sunein aur aarti karein.

Shaam aur raat: Mandir, tulsi aur peepal ke neeche diya jalayein aur raat ko bhajan-kirtan ke saath jaagran karein.

Dhyan rakhein: Ekadashi par chawal na khayein, tulsi na todein aur sahi samay par paaran karein.

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सफला एकादशी 2027 कब है?

सफला एकादशी रविवार, 3 जनवरी 2027 को है। 2027 में दूसरी सफला एकादशी 23 दिसंबर को आएगी।

एकादशी तिथि कब से कब तक है?

एकादशी तिथि 2 जनवरी 2027 को दोपहर लगभग 02:24 बजे से 3 जनवरी को शाम लगभग 04:08 बजे तक रहेगी।

सफला एकादशी का पारण कब करें?

पारण 4 जनवरी 2027, सोमवार की सुबह सूर्योदय के बाद करें। उज्जैन के अनुसार पारण का समय सुबह 07:13 से 09:20 तक है। अपने शहर के लिए स्थानीय पंचांग देखें।

सफला एकादशी पर किसकी पूजा होती है?

सफला एकादशी पर भगवान विष्णु के अच्युत और नारायण स्वरूप की पूजा की जाती है।

सफला एकादशी का क्या महत्व है?

"सफला" का अर्थ है सफलता देने वाली। मान्यता है कि यह व्रत सभी कार्यों में सफलता देता है, पापों का नाश करता है और मोक्ष प्रदान करता है।

सफला एकादशी की कथा क्या है?

राजा महिष्मत के दुराचारी पुत्र लुम्पक ने राज्य से निकाले जाने के बाद जंगल में अनजाने में सफला एकादशी पर उपवास, फल अर्पण और रात्रि जागरण किया। इसके प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हुए और उसे राज्य वापस मिला।

सफला एकादशी पर कौन से फल चढ़ाएं?

नारियल, अनार, आंवला, बेर, अमरूद, नींबू, सुपारी, केला और मौसम में उपलब्ध कोई भी ताज़ा फल भगवान को अर्पित करें।

एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते?

शास्त्रों के अनुसार एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित है। इसलिए सभी एकादशी व्रतों में चावल और चावल से बनी चीज़ें नहीं खाई जातीं।

सफला एकादशी व्रत में क्या खा सकते हैं?

फल, दूध, दही, मेवे, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक का प्रयोग कर सकते हैं।

क्या 2027 में दो सफला एकादशी हैं?

हाँ, 2027 में पौष मास साल की शुरुआत और अंत दोनों में पड़ने के कारण सफला एकादशी 3 जनवरी और 23 दिसंबर, दो बार आएगी।

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