होम / त्योहार / दशहरा (विजयादशमी)
🏹
⏳ 4 दिन बाकी

दशहरा 2026: विजय मुहूर्त, रावण दहन का समय, शस्त्र-शमी-अपराजिता पूजा विधि और कथा

विजयादशमी असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म और अहंकार पर विनम्रता की विजय का महापर्व है। इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया और माँ दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया था। इस पेज पर दशहरे की सही तिथि, विजय मुहूर्त, अपराजिता देवी, शमी वृक्ष और शस्त्र पूजन की चरणबद्ध विधि, रावण दहन, नवरात्रि पारण और इस दिन से जुड़ी हर परंपरा विस्तार से दी गई है।

📅
तारीख 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार
🌙
हिंदू तिथि आश्विन शुक्ल दशमी
⏰
शुभ मुहूर्त विजय मुहूर्त दोपहर 01:59 से 02:45 | अपराह्न पूजा 01:14 से 03:30 | रावण दहन सूर्यास्त (05:47) के बाद (नई दिल्ली)
🙏
पूज्य देवता भगवान श्रीराम, माँ दुर्गा, माँ अपराजिता
📖

परिचय

दशहरा भारत के सबसे बड़े और सबसे पुराने त्योहारों में से एक है। यह नवरात्रि की नौ रातों की शक्ति उपासना का समापन और दिवाली की तैयारियों की शुरुआत का दिन है — दशहरे के ठीक 20 दिन बाद दिवाली आती है, क्योंकि मान्यता है कि रावण वध के बाद श्रीराम को अयोध्या लौटने में इतना समय लगा था।

इस दिन घर पर अपराजिता देवी पूजा, शमी पूजा और शस्त्र/औज़ार पूजा की जाती है, शाम को रावण दहन देखा जाता है और घर के बड़ों से आशीर्वाद लिया जाता है। नीचे पूरी विधि क्रम से दी गई है।

✨

दशहरा (विजयादशमी) का महत्व

दशहरा 2026 कब है?

वर्ष 2026 में दशहरा (विजयादशमी) मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा। यह पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को आता है, जो शारदीय नवरात्रि के ठीक बाद का दिन है।

  • दशमी तिथि प्रारंभ: 20 अक्टूबर 2026, दोपहर 12:50 बजे
  • दशमी तिथि समाप्त: 21 अक्टूबर 2026, दोपहर 02:11 बजे
  • विजय मुहूर्त: दोपहर 01:59 से 02:45 तक (अवधि लगभग 46 मिनट)
  • अपराह्न पूजा का समय: दोपहर 01:14 से 03:30 तक
  • श्रवण नक्षत्र: 19 अक्टूबर दोपहर 03:38 से 20 अक्टूबर शाम 06:02 तक
  • सूर्यास्त (नई दिल्ली): शाम लगभग 05:47 बजे
  • रावण दहन: सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में, यानी शाम लगभग 05:47 के बाद (हर शहर की रामलीला समिति अपना समय तय करती है)

सभी समय नई दिल्ली के अनुसार हैं। अन्य शहरों में मुहूर्त 10–20 मिनट आगे-पीछे हो सकते हैं।

20 अक्टूबर या 21 अक्टूबर — दशहरा किस दिन?

इस वर्ष दशमी तिथि दो दिन पड़ रही है, इसलिए यह सवाल बहुत पूछा जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार विजयादशमी उस दिन मनाई जाती है जब अपराह्न काल (दोपहर का समय) में दशमी तिथि विद्यमान हो। 20 अक्टूबर को दशमी दोपहर 12:50 से शुरू होकर पूरे अपराह्न काल में रहेगी, साथ ही श्रवण नक्षत्र का संयोग भी है। इसलिए उत्तर भारत में दशहरा, रावण दहन और शस्त्र पूजा 20 अक्टूबर को होगी।

वहीं बंगाल, असम, ओडिशा और त्रिपुरा में उदया तिथि को मानने की परंपरा है, इसलिए वहाँ विजया दशमी, सिंदूर खेला और माँ दुर्गा का विसर्जन 21 अक्टूबर को होगा।

विजय मुहूर्त का महत्व

दिन के दसवें मुहूर्त को "विजय मुहूर्त" कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने इसी मुहूर्त में लंका पर विजय के लिए प्रस्थान किया था। इस समय में शुरू किया गया हर कार्य सफल होता है, इसलिए नया व्यापार, वाहन या संपत्ति खरीदना, नया काम शुरू करना, विद्यारंभ और शस्त्र पूजन इसी मुहूर्त में करना सबसे शुभ माना जाता है। दशहरा साढ़े तीन स्वयंसिद्ध (अबूझ) मुहूर्तों में से एक है — यानी इस पूरे दिन किसी भी शुभ कार्य के लिए अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती।

दशहरे का धार्मिक महत्व

"दशहरा" शब्द "दश" (दस) और "हरा" (हारना / हरण) से बना है — यानी वह दिन जब दस सिर वाले रावण की हार हुई। आध्यात्मिक दृष्टि से रावण के दस सिर मनुष्य के भीतर के दस विकारों का प्रतीक हैं — काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद (अहंकार), मत्सर (ईर्ष्या), स्वार्थ, अन्याय, अमानवीयता और असत्य। दशहरा हमें इन बुराइयों पर विजय पाने का संदेश देता है।

"विजयादशमी" नाम माँ दुर्गा की विजय से जुड़ा है। नौ दिनों तक चले युद्ध के बाद दसवें दिन माँ ने महिषासुर का वध किया था। इसलिए नवरात्रि में नौ दिन शक्ति की उपासना के बाद दसवां दिन विजय उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

दशहरे की पौराणिक कथाएं

1. भगवान श्रीराम द्वारा रावण वध

लंकापति रावण ने छल से माता सीता का हरण कर लिया था। भगवान श्रीराम ने हनुमान जी, सुग्रीव, जाम्बवंत और वानर सेना के साथ समुद्र पर सेतु बनाकर लंका पर चढ़ाई की। युद्ध से पहले श्रीराम ने नौ दिनों तक माँ दुर्गा की आराधना की। कथा है कि पूजा के लिए 108 नीलकमल चाहिए थे, पर एक कम पड़ गया। तब "कमलनयन" कहलाने वाले श्रीराम अपना एक नेत्र अर्पित करने को तैयार हो गए। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माँ दुर्गा ने उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया। दसवें दिन श्रीराम ने विभीषण के बताए रहस्य के अनुसार रावण की नाभि में स्थित अमृत को बाण से सुखाकर उसका वध किया। इसी विजय की स्मृति में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किया जाता है।

2. माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर वध

असुर महिषासुर को वरदान था कि कोई देवता या पुरुष उसे नहीं मार सकेगा। वरदान के अहंकार में उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित सभी देवताओं के तेज से माँ दुर्गा प्रकट हुईं। देवताओं ने उन्हें अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र दिए। नौ दिनों तक भयंकर युद्ध के बाद दशमी के दिन माँ ने महिषासुर का वध किया और "महिषासुरमर्दिनी" कहलाईं।

3. पांडव और शमी वृक्ष

बारह वर्ष के वनवास के बाद एक वर्ष के अज्ञातवास में जाने से पहले पांडवों ने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र राजा विराट के नगर के पास एक शमी वृक्ष पर छिपा दिए थे। अज्ञातवास पूरा होने पर विजयादशमी के दिन ही अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपना गांडीव धनुष उतारा, उसकी पूजा की और कौरव सेना को अकेले परास्त किया। तभी से दशहरे पर शमी वृक्ष और शस्त्रों की पूजा की परंपरा है।

4. कौत्स और राजा रघु — आपटा के पत्ते "सोना"

महर्षि वरतंतु के शिष्य कौत्स को गुरुदक्षिणा में 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देनी थीं। वे अयोध्या के राजा रघु के पास पहुंचे, पर राजा उस समय अपना सब कुछ दान कर चुके थे। राजा रघु ने कुबेर पर आक्रमण की तैयारी की, तो डरकर कुबेर ने अयोध्या के पास के शमी और आपटा के पेड़ों पर स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा कर दी। कौत्स ने गुरुदक्षिणा जितनी मुद्राएं लेकर बाकी लोगों में बांट दीं। यह घटना विजयादशमी के दिन हुई थी। इसीलिए महाराष्ट्र और कर्नाटक में आज भी दशहरे पर आपटा के पत्ते "सोना" कहकर एक-दूसरे को दिए जाते हैं।

दशहरे की प्रमुख परंपराएं

  • रामलीला और रावण दहन: नवरात्रि के नौ दिनों तक रामलीला का मंचन होता है और दशमी की शाम रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किया जाता है।
  • शस्त्र पूजा: क्षत्रिय परंपरा में अस्त्र-शस्त्र, किसान अपने औज़ार, व्यापारी तराजू-बही और विद्यार्थी पुस्तकों की पूजा करते हैं। सेना और पुलिस में भी शस्त्र पूजन होता है।
  • नीलकंठ दर्शन: दशहरे के दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन बहुत शुभ माने जाते हैं। मान्यता है कि रावण वध से पहले श्रीराम को नीलकंठ के दर्शन हुए थे। नीलकंठ को भगवान शिव का स्वरूप भी माना जाता है।
  • जवारे (जौ) धारण करना: नवरात्रि में बोए गए जौ के जवारे दशहरे पर काटकर कान पर, पगड़ी में या टोपी में लगाए जाते हैं और घर के बड़े आशीर्वाद के रूप में देते हैं।
  • पान और जलेबी: उत्तर भारत में रावण दहन के बाद पान खाने और जलेबी-फाफड़ा (गुजरात) खाने की परंपरा है।
  • सीमोल्लंघन: महाराष्ट्र में शाम को गाँव/शहर की सीमा पार करके शमी या आपटा के पेड़ की पूजा की जाती है।

भारत के प्रसिद्ध दशहरा उत्सव

  • मैसूर दसरा (कर्नाटक): 400 से अधिक वर्षों से चली आ रही शाही परंपरा। मैसूर पैलेस लाखों बल्बों से जगमगाता है और विजयादशमी पर माँ चामुंडेश्वरी की स्वर्ण हौदे में भव्य "जंबू सवारी" निकलती है।
  • कुल्लू दशहरा (हिमाचल प्रदेश): यहाँ दशहरा विजयादशमी से शुरू होकर सात दिन चलता है। आसपास के गाँवों के सैकड़ों देवी-देवता पालकियों में भगवान रघुनाथ जी के दरबार में आते हैं। यहाँ रावण दहन नहीं होता।
  • कोटा दशहरा मेला (राजस्थान): 130 साल से अधिक पुराना राष्ट्रीय मेला, जहाँ देश के सबसे ऊंचे रावण के पुतलों में से एक का दहन होता है।
  • बस्तर दशहरा (छत्तीसगढ़): लगभग 75 दिनों तक चलने वाला विश्व का सबसे लंबा दशहरा, जो माँ दंतेश्वरी को समर्पित है। इसमें भी रावण दहन नहीं होता।
  • बंगाल की विजया दशमी: माँ दुर्गा का विसर्जन, विवाहित महिलाओं का "सिंदूर खेला" और "शुभो बिजोया" की शुभकामनाएं।
  • दिल्ली की रामलीला: रामलीला मैदान और लाल किले की रामलीला देश भर में प्रसिद्ध है।
🧺

पूजा सामग्री

अपराजिता पूजा के लिए

  • लकड़ी की चौकी या साफ़ पटा
  • लाल या पीला कपड़ा
  • चंदन, रोली (कुमकुम), हल्दी — अष्टदल कमल बनाने के लिए
  • अपराजिता के फूल (नीले या सफेद) — न मिलें तो कोई भी ताज़ा फूल
  • अक्षत (साबुत चावल), मौली, सुपारी, पान के पत्ते
  • भगवान श्रीराम, माँ दुर्गा या अपराजिता देवी का चित्र (वैकल्पिक)

शमी पूजा के लिए

  • शमी का पेड़ या गमले में लगा शमी का पौधा
  • जल का लोटा, रोली, अक्षत, मौली, फूल
  • घी या तेल का दीपक
  • सुपारी, सिक्का

शस्त्र / औज़ार पूजा के लिए

  • घर के शस्त्र (तलवार, लाइसेंसी बंदूक आदि), औज़ार, वाहन की चाबी, कंप्यूटर/लैपटॉप, तराजू, बही-खाता, कलम और विद्यार्थियों की पुस्तकें
  • साफ़ लाल या पीला कपड़ा (शस्त्र रखने के लिए)
  • गंगाजल, रोली, हल्दी, चंदन, अक्षत, मौली
  • फूल और फूलमाला (गेंदा), दूर्वा
  • शमी के पत्ते और अपराजिता के फूल

सामान्य पूजन सामग्री

  • घी का दीपक, धूप-अगरबत्ती, कपूर
  • गंगाजल, जल से भरा कलश
  • फल, मिठाई (जलेबी, लड्डू), गुड़, नारियल
  • नवरात्रि में बोए गए जौ के जवारे
  • पान का बीड़ा (रावण दहन के बाद खाने के लिए)
  • आपटा या शमी के पत्ते ("सोना" के रूप में बांटने के लिए)
  • दक्षिणा के लिए सिक्के

वाहन पूजा के लिए

  • पानी और कपड़ा (वाहन साफ़ करने के लिए)
  • रोली, हल्दी, फूलमाला, नारियल, नींबू
  • मौली (स्टेयरिंग या हैंडल पर बांधने के लिए)
🪔

पूजा विधि

चरण 1: सुबह की तैयारी

  • सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और साफ़ या नए वस्त्र पहनें। लाल, पीला या केसरिया रंग शुभ है।
  • घर के मुख्य द्वार पर आम के पत्तों और गेंदे के फूलों का तोरण लगाएं।
  • घर के सभी शस्त्र, औज़ार, वाहन, पुस्तकें और बही-खाते साफ़ करके एक जगह रख लें।
  • जो लोग नवरात्रि का व्रत कर रहे थे, वे पहले माँ दुर्गा की पूजा करें।

चरण 2: नवरात्रि पारण और कलश / जवारे विसर्जन

  • नवरात्रि में स्थापित कलश और माँ दुर्गा की पूजा करें — रोली, अक्षत, फूल, मिठाई अर्पित करें और आरती करें।
  • माँ से क्षमा प्रार्थना करके अगले वर्ष फिर पधारने का निवेदन करें।
  • कलश का नारियल प्रसाद के रूप में बांटें और कलश का जल पूरे घर में छिड़कें। बचा हुआ जल तुलसी या पेड़-पौधों में डाल दें।
  • बोए गए जवारे (जौ) को काट लें। कुछ जवारे पूजा में रखें, कुछ परिवार के लोग कान पर या पगड़ी में धारण करें, और बाकी को किसी पवित्र नदी, तालाब या मिट्टी में विसर्जित करें।
  • इसके बाद व्रत का पारण (व्रत खोलना) करें। ध्यान रखें कि पारण दशमी तिथि में ही किया जाता है।

चरण 3: अपराजिता देवी पूजा (अपराह्न काल में — दोपहर 01:14 से 03:30)

अपराजिता का अर्थ है "जिसे कोई हरा न सके"। माँ अपराजिता विजय की देवी हैं और भगवान श्रीराम ने भी लंका प्रस्थान से पहले उनकी पूजा की थी। यह पूजा घर के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में करनी चाहिए।

  • ईशान कोण में साफ़ स्थान पर गंगाजल छिड़कें और चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं।
  • चंदन, रोली या हल्दी से अष्टदल कमल (आठ पंखुड़ियों वाला कमल) बनाएं।
  • हाथ में अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें — "मैं (अपना नाम) अपने परिवार की रक्षा, सफलता और हर कार्य में विजय के लिए माँ अपराजिता की पूजा कर रहा/रही हूँ।"
  • अष्टदल कमल के बीच में माँ अपराजिता का आवाहन करें और यह मंत्र बोलें:
    ॐ अपराजितायै नमः
  • कमल के दाईं ओर जया देवी का आवाहन करें — ॐ क्रियाशक्त्यै नमः
  • कमल के बाईं ओर विजया देवी का आवाहन करें — ॐ उमायै नमः
  • तीनों देवियों को रोली, अक्षत, अपराजिता के फूल, धूप-दीप और मिठाई अर्पित करें।
  • हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि माँ हर कार्य में विजय प्रदान करें और परिवार की रक्षा करें।
  • पूजा के बाद अपराजिता के कुछ फूल और अक्षत लेकर परिवार के सदस्यों पर छिड़कें या तिजोरी/पर्स में रखें।

चरण 4: शस्त्र और औज़ार पूजा (विजय मुहूर्त में — दोपहर 01:59 से 02:45)

  • एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर सभी शस्त्र, औज़ार, कलम, पुस्तकें, बही-खाते, कंप्यूटर और वाहन की चाबियाँ व्यवस्थित रखें।
  • सबसे पहले श्री गणेश का स्मरण करें — ॐ गं गणपतये नमः
  • सभी शस्त्रों पर गंगाजल छिड़ककर उन्हें शुद्ध करें।
  • हर शस्त्र और औज़ार पर रोली या हल्दी का तिलक लगाएं और मौली बांधें।
  • अक्षत, फूल, शमी के पत्ते और अपराजिता के फूल अर्पित करें। गेंदे की माला चढ़ाएं।
  • धूप-दीप दिखाएं और मिठाई का भोग लगाएं।
  • शस्त्र पूजन का मंत्र बोलें:
    ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
  • माँ दुर्गा से प्रार्थना करें कि ये शस्त्र सदा धर्म और रक्षा के लिए ही प्रयोग हों, कभी अन्याय के लिए नहीं।
  • विद्यार्थी अपनी पुस्तकों और कलम पर ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः बोलकर पूजा करें। व्यापारी तराजू और बही-खाते पर स्वस्तिक बनाकर शुभ-लाभ लिखें।
  • पूजा के दिन शस्त्रों को कुछ घंटे पूजा स्थान पर ही रहने दें। शस्त्र पूजा के दिन शस्त्र का प्रयोग नहीं किया जाता।

चरण 5: वाहन पूजा

  • वाहन को अच्छी तरह धोकर साफ़ करें।
  • वाहन पर रोली से स्वस्तिक बनाएं, फूलमाला चढ़ाएं और स्टेयरिंग या हैंडल पर मौली बांधें।
  • वाहन के सामने नारियल फोड़ें या चारों पहियों के नीचे नींबू रखकर वाहन को आगे बढ़ाएं।
  • नया वाहन खरीदने या घर लाने के लिए दशहरा सबसे शुभ दिनों में से एक है।

चरण 6: शमी पूजा (सूर्यास्त से पहले या प्रदोष काल में)

शमी वृक्ष को शनि देव का प्रिय और शत्रुओं का नाश करने वाला माना जाता है। अर्जुन ने इसी वृक्ष से अपना गांडीव उतारा था।

  • घर के पास के शमी के पेड़ या गमले के शमी के पौधे के पास जाएं।
  • पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें और रोली, अक्षत, फूल चढ़ाएं।
  • तने पर मौली लपेटें और सामने घी या तेल का दीपक जलाएं।
  • हाथ जोड़कर यह श्लोक बोलें:
    शमी शमयते पापं शमी शत्रुविनाशिनी। अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी॥
  • पेड़ की सात परिक्रमा करें और विजय व शत्रु बाधा से मुक्ति की प्रार्थना करें।
  • पेड़ की जड़ के पास से थोड़ी मिट्टी और कुछ पत्ते (गिरे हुए या अनुमति लेकर तोड़े हुए) घर लाएं। पत्तों को तिजोरी, पूजा स्थान या पर्स में रखें।
  • महाराष्ट्र में शमी या आपटा के पत्ते "सोना" कहकर मित्रों और रिश्तेदारों को दिए जाते हैं।

चरण 7: श्रीराम पूजा

  • शाम को भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी के चित्र के सामने दीपक जलाएं।
  • रोली, अक्षत, फूल और मिठाई अर्पित करें।
  • मंत्र जाप करें: श्री राम जय राम जय जय राम (108 बार) या ॐ श्री रामाय नमः।
  • हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है।
  • भगवान श्रीराम की आरती ("श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन") करें।

चरण 8: रावण दहन (सूर्यास्त के बाद — शाम लगभग 05:47 के बाद)

  • परिवार के साथ पास की रामलीला या रावण दहन स्थल पर जाएं।
  • रावण दहन देखते समय मन में संकल्प लें कि आप अपने भीतर के एक दोष — क्रोध, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या या आलस्य — को त्यागेंगे। यही दशहरे का असली संदेश है।
  • रावण दहन के बाद कई परिवारों में दहन की थोड़ी लकड़ी या राख घर लाने की परंपरा है, जिसे बुरी नज़र से बचाव के लिए रखा जाता है।
  • सुरक्षा का ध्यान रखें — पुतले से उचित दूरी बनाए रखें और बच्चों को अपने पास रखें।

चरण 9: रावण दहन के बाद

  • घर लौटकर पूजा स्थान पर दीपक जलाएं।
  • घर के सभी बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लें। बड़े छोटों को जवारे, शमी के पत्ते और शगुन देते हैं।
  • पान का बीड़ा खाएं और खिलाएं — इसे विजय और प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
  • रिश्तेदारों और मित्रों के घर जाकर दशहरे की शुभकामनाएं दें और मिठाई बांटें।
  • संभव हो तो इस दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन करें।
📋

व्रत के नियम

✅ दशहरे पर क्या करें

  • अपराजिता पूजा अपराह्न काल में और शस्त्र पूजा विजय मुहूर्त में करें।
  • शमी वृक्ष की पूजा करें और उसके पत्ते घर लाएं।
  • नया काम, व्यापार, वाहन या संपत्ति की खरीदारी करनी हो तो दशहरे का दिन चुनें — यह अबूझ मुहूर्त है।
  • बच्चों का विद्यारंभ, नई पढ़ाई या नया कौशल सीखना इस दिन शुरू करना शुभ है।
  • घर के बड़ों का आशीर्वाद लें और रिश्तेदारों से मिलें।
  • ज़रूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करें।
  • रावण दहन देखते समय अपनी एक बुराई छोड़ने का संकल्प लें।
  • नीलकंठ पक्षी के दर्शन करने का प्रयास करें।

❌ दशहरे पर क्या न करें

  • शस्त्र पूजा के दिन शस्त्रों का प्रयोग, लेन-देन या उन्हें अपवित्र स्थान पर न रखें।
  • किसी से झगड़ा, अपमान या कटु वचन न बोलें — यह विजय और सद्भाव का दिन है।
  • पेड़-पौधे, विशेषकर शमी के पेड़ को नुकसान न पहुंचाएं। पत्ते ज़रूरत भर ही लें।
  • मांस, मदिरा और नशे से दूर रहें, खासकर नवरात्रि का व्रत रखने वाले।
  • दशमी तिथि समाप्त होने से पहले नवरात्रि व्रत का पारण कर लें — देर न करें।
  • रावण दहन के समय पुतले के बहुत पास न जाएं और पटाखों से सावधान रहें।
  • बच्चों को रावण दहन में अकेले न छोड़ें।
🪔

दशहरा (विजयादशमी) — आरती

📖

दशहरा (विजयादशमी) — चालीसा

🔤

Hinglish

Dussehra 2026 kab hai? Mangalvar, 20 October 2026. Vijay muhurat dopahar 01:59 se 02:45 tak, Aparahna puja 01:14 se 03:30 tak aur Ravan dahan suryast (shaam lagbhag 05:47) ke baad.

20 ya 21 October? North India mein Dussehra 20 October ko hai kyunki Dashami tithi isi din dopahar (aparahna kaal) mein hai. Bengal, Assam aur Odisha mein Vijaya Dashami aur Durga visarjan 21 October ko hoga.

Aparajita puja: Ghar ke ishaan kon mein chowki par ashtadal kamal banayein. Beech mein "Om Aparajitayai Namah", daayein Jaya devi aur baayein Vijaya devi ka aavahan karke roli, akshat, phool aur mithai chadhayein.

Shastra puja: Vijay muhurat mein shastra, auzaar, kitaabein, bahi-khata aur gaadi ki chaabi par gangajal chhidkein, tilak lagayein, mauli baandhein aur phool chadhayein. Us din shastra ka prayog na karein.

Shami puja: Shami ke ped ki jad mein jal chadhayein, deepak jalayein, "Shami shamayate paapam" shlok bolein aur 7 parikrama karein. Shami ke patte ghar layein.

Shaam ko: Shri Ram ki puja aur aarti karein, Ravan dahan dekhein, apni ek buraai chhodne ka sankalp lein, bado ka aashirvaad lein aur paan khayein.

❓

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

दशहरा 2026 कब है?

दशहरा (विजयादशमी) 2026 में मंगलवार, 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा।

दशहरा 20 अक्टूबर को है या 21 अक्टूबर को?

उत्तर भारत में दशहरा 20 अक्टूबर को है, क्योंकि इसी दिन अपराह्न काल में दशमी तिथि रहेगी। बंगाल, असम, ओडिशा और त्रिपुरा में उदया तिथि के अनुसार विजया दशमी और दुर्गा विसर्जन 21 अक्टूबर को होगा।

दशहरा 2026 का विजय मुहूर्त क्या है?

विजय मुहूर्त 20 अक्टूबर को दोपहर 01:59 से 02:45 तक (नई दिल्ली) है। शस्त्र पूजा और नए कार्य की शुरुआत के लिए यह सबसे शुभ समय है।

दशमी तिथि कब से कब तक है?

दशमी तिथि 20 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12:50 बजे से 21 अक्टूबर को दोपहर 02:11 बजे तक रहेगी।

रावण दहन कितने बजे होगा?

रावण दहन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में किया जाता है। नई दिल्ली में 20 अक्टूबर को सूर्यास्त लगभग शाम 05:47 बजे है, इसलिए इसके बाद रावण दहन होगा। सटीक समय आपके शहर की रामलीला समिति तय करती है।

दशहरे पर शस्त्र पूजा क्यों की जाती है?

मान्यता है कि अज्ञातवास के बाद विजयादशमी के दिन ही अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने शस्त्र उतारकर उनकी पूजा की थी और विजय पाई थी। साथ ही माँ दुर्गा ने भी देवताओं के दिए शस्त्रों से महिषासुर का वध किया था।

शमी के पेड़ की पूजा क्यों की जाती है?

पांडवों ने अपने शस्त्र शमी वृक्ष पर छिपाए थे और भगवान श्रीराम ने भी लंका विजय से पहले शमी की पूजा की थी। शमी को पाप और शत्रुओं का नाश करने वाला माना जाता है।

अपराजिता पूजा कब और कहाँ करनी चाहिए?

अपराजिता पूजा दशहरे के दिन अपराह्न काल (दोपहर 01:14 से 03:30) में घर के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में करनी चाहिए।

दशहरे पर नीलकंठ पक्षी देखना शुभ क्यों है?

मान्यता है कि रावण वध से पहले भगवान श्रीराम को नीलकंठ पक्षी के दर्शन हुए थे। नीलकंठ को भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है, इसलिए इस दिन उसके दर्शन को विजय और सौभाग्य का संकेत माना जाता है।

दशहरे के कितने दिन बाद दिवाली आती है?

दशहरे के लगभग 20 दिन बाद दिवाली आती है। 2026 में दशहरा 20 अक्टूबर और दिवाली 8 नवंबर को है।

क्या दशहरे पर नया वाहन या घर खरीदना शुभ है?

हाँ, दशहरा साढ़े तीन अबूझ मुहूर्तों में से एक है। इस दिन वाहन, संपत्ति, सोना खरीदना या नया व्यापार शुरू करना बहुत शुभ माना जाता है।

नवरात्रि व्रत का पारण कब करें?

नवरात्रि व्रत का पारण दशमी तिथि में किया जाता है। 2026 में दशमी 20 अक्टूबर दोपहर 12:50 से शुरू हो रही है, इसलिए पारण उसके बाद करें।

📢 शेयर करें