परिचय
तुलसी विवाह बिल्कुल एक असली विवाह की तरह होता है। तुलसी के गमले के चारों ओर गन्ने का मंडप सजाया जाता है, माता तुलसी को दुल्हन की तरह लाल चुनरी और सोलह श्रृंगार से सजाया जाता है और शालिग्राम जी (या भगवान विष्णु की प्रतिमा) को दूल्हे के रूप में पीले वस्त्र पहनाए जाते हैं। फिर प्रदोष काल में कन्यादान, गठबंधन और सात फेरे होते हैं, मंगल गीत गाए जाते हैं और प्रसाद बांटा जाता है।
नीचे पूरी सामग्री, घर पर विवाह की क्रमवार विधि, मंत्र और ज़रूरी नियम दिए गए हैं।
तुलसी विवाह का महत्व
तुलसी विवाह 2026 कब है?
वर्ष 2026 में तुलसी विवाह शनिवार, 21 नवंबर 2026 को कार्तिक शुक्ल द्वादशी पर किया जाएगा। यह देवउठनी एकादशी (20 नवंबर) के अगले दिन है।
- एकादशी तिथि: 20 नवंबर सुबह लगभग 07:17 से 21 नवंबर सुबह लगभग 06:33 तक
- द्वादशी तिथि प्रारंभ: 21 नवंबर 2026, सुबह लगभग 06:33 बजे
- द्वादशी तिथि समाप्त: 22 नवंबर 2026, सुबह लगभग 04:58 बजे
- विवाह मुहूर्त — प्रदोष काल (नई दिल्ली): 21 नवंबर, शाम 05:25 (सूर्यास्त) से 07:49 तक
एकादशी या द्वादशी — कब करें तुलसी विवाह?
उत्तर भारत के ज़्यादातर परिवार द्वादशी की शाम (2026 में 21 नवंबर) को तुलसी विवाह करते हैं। कई परिवार और क्षेत्र देवउठनी एकादशी की शाम (20 नवंबर) को ही विवाह करा लेते हैं। शास्त्रों के अनुसार तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा (24 नवंबर) तक किसी भी दिन शाम को किया जा सकता है। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार दिन चुनें। कोई परंपरा न हो तो द्वादशी की शाम सबसे प्रचलित है।
प्रदोष काल का समय हर शहर के सूर्यास्त के अनुसार कुछ मिनट बदलता है। अपने शहर के लिए स्थानीय पंचांग देखें।
तुलसी विवाह का महत्व
- कन्यादान का पुण्य: शास्त्रों में कहा गया है कि तुलसी विवाह कराने वाले को कन्यादान के बराबर पुण्य मिलता है। जिन दंपतियों की बेटी नहीं है, वे विशेष रूप से तुलसी विवाह कराकर यह पुण्य कमाते हैं।
- शुभ कार्यों की शुरुआत: चातुर्मास में भगवान विष्णु योग निद्रा में रहते हैं, इसलिए विवाह जैसे मंगल कार्य नहीं होते। देवउठनी एकादशी पर भगवान जागते हैं और तुलसी विवाह के साथ विवाह का मौसम शुरू होता है।
- सुखी दांपत्य: मान्यता है कि तुलसी विवाह कराने से वैवाहिक जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, कुंवारी कन्याओं को अच्छा वर मिलता है और दंपतियों का प्रेम बढ़ता है।
- विष्णुप्रिया तुलसी: तुलसी को माता लक्ष्मी का रूप और भगवान विष्णु की सबसे प्रिय माना जाता है। तुलसी दल के बिना भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का भोग स्वीकार नहीं होता।
- आयुर्वेद में तुलसी: तुलसी को "जड़ी-बूटियों की रानी" कहा जाता है। घर में तुलसी का पौधा वातावरण को शुद्ध रखने वाला माना जाता है।
तुलसी विवाह की कथा — वृंदा और जालंधर
पुराणों के अनुसार प्राचीन काल में जालंधर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था, जिसका जन्म भगवान शिव के तेज से समुद्र में हुआ था। उसकी पत्नी वृंदा असुर राज कालनेमि की पुत्री थी, पर वह भगवान विष्णु की परम भक्त और महान पतिव्रता स्त्री थी।
वृंदा के पतिव्रत धर्म के प्रभाव से जालंधर अजेय हो गया था। कोई भी देवता उसे युद्ध में हरा नहीं पाता था। इस शक्ति के अहंकार में उसने देवताओं पर अत्याचार शुरू कर दिए और स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। यहां तक कि उसने माता पार्वती को पाने की कामना से भगवान शिव से भी युद्ध छेड़ दिया।
देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु जी जानते थे कि जब तक वृंदा का पतिव्रत धर्म अखंड है, जालंधर का अंत संभव नहीं। तब भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण किया और वृंदा के पास गए। वृंदा ने उन्हें अपना पति समझकर स्पर्श किया और उसका पतिव्रत भंग हो गया। उसी क्षण युद्ध में भगवान शिव ने जालंधर का वध कर दिया।
सच्चाई जानकर वृंदा अत्यंत दुखी और क्रोधित हुई। उसने भगवान विष्णु को श्राप दिया — "आपने मेरे साथ छल किया है, इसलिए आप पत्थर बन जाएंगे।" भगवान विष्णु ने श्राप स्वीकार किया और शालिग्राम शिला बन गए। देवताओं के प्रार्थना करने पर वृंदा ने श्राप वापस ले लिया और स्वयं अपने पति के साथ सती हो गई।
वृंदा की भस्म से एक पौधा उगा, जिसे भगवान विष्णु ने "तुलसी" नाम दिया और वरदान दिया — "तुम मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय रहोगी। मेरे शालिग्राम रूप के साथ तुम्हारा विवाह होगा और तुम्हारे बिना मेरी पूजा पूरी नहीं होगी।" तभी से हर वर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी-द्वादशी को तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराया जाता है। वृंदा के नाम पर ही तुलसी को वृंदा और श्रीकृष्ण की लीला भूमि को वृंदावन कहा जाता है।
शिक्षा: सच्ची भक्ति और पतिव्रत धर्म इतना शक्तिशाली है कि स्वयं भगवान भी उसका सम्मान करते हैं।
देश में तुलसी विवाह की परंपराएं
- उत्तर भारत: घर के आंगन में गन्ने का मंडप बनाकर पूरे विधि-विधान से विवाह, मंगल गीत और प्रसाद वितरण।
- महाराष्ट्र और गुजरात: कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक कई घरों और मंदिरों में बड़े स्तर पर तुलसी विवाह होता है। मंगलाष्टक गाए जाते हैं और विवाह के बाद ही परिवारों में शादियों की तारीखें तय होती हैं।
- मंदिरों में: कई विष्णु और कृष्ण मंदिरों में बारात निकालकर धूमधाम से तुलसी-शालिग्राम का विवाह कराया जाता है।
पूजा सामग्री
मंडप और स्थापना के लिए
- तुलसी का स्वस्थ पौधा (गमले में) — गमले को गेरू या रंगों से सजाएं
- शालिग्राम जी या भगवान विष्णु / श्रीकृष्ण की छोटी प्रतिमा
- मंडप के लिए 4 गन्ने, आम के पत्ते, केले के पत्ते, फूलों की लड़ियां
- लकड़ी की चौकी, लाल और पीला कपड़ा
- रंगोली के रंग या आटा
- जल से भरा कलश, नारियल
माता तुलसी (दुल्हन) के लिए
- लाल चुनरी या छोटी लाल साड़ी
- सोलह श्रृंगार — सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, मेहंदी, काजल, बिछिया, पायल, नथ, कंघी, शीशा, आलता, महावर
- फूलों की माला (वरमाला), गजरा
शालिग्राम जी (दूल्हे) के लिए
- पीले वस्त्र (धोती), छोटा मुकुट या सेहरा
- जनेऊ, पीला चंदन
- फूलों की माला (वरमाला)
पूजा और विवाह सामग्री
- गंगाजल, पंचामृत
- रोली, हल्दी, कुमकुम, अक्षत, चंदन
- मौली (कलावा), गठबंधन के लिए पीला/लाल कपड़ा
- घी का दीपक, धूप-अगरबत्ती, कपूर
- पान, सुपारी, लौंग, इलायची, दक्षिणा
- शंख और घंटी
भोग और मौसमी चढ़ावा
- आंवला, बेर, सिंघाड़ा, शकरकंद, सीताफल, मूली, गन्ने के टुकड़े — कार्तिक के मौसमी फल-सब्ज़ियां
- हलवा, खीर, पूरी, मिठाई
- पंचामृत और मिश्री
- बताशे और खील (कई जगह)
पूजा विधि
चरण 1: दिन में तैयारी (21 नवंबर)
- सुबह स्नान करके तुलसी जी को जल अर्पित करें। जो लोग कन्यादान करेंगे, वे इस दिन व्रत रखते हैं और कन्यादान के बाद ही भोजन करते हैं।
- दोपहर तक तुलसी के गमले को आंगन, छत या पूजा स्थान पर रखकर गेरू और रंगोली से सजाएं।
- गमले के चारों कोनों पर चार गन्ने खड़े करके ऊपर से बांधकर मंडप बनाएं और फूलों, आम के पत्तों और लड़ियों से सजाएं।
- तुलसी के दाईं ओर एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर शालिग्राम जी के बैठने की जगह बनाएं, पास में जल से भरा कलश रखें।
चरण 2: शाम को दूल्हा-दुल्हन का श्रृंगार (प्रदोष काल शुरू होने से पहले)
- माता तुलसी को लाल चुनरी ओढ़ाएं और सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। सिंदूर और बिंदी लगाएं, चूड़ियां पहनाएं।
- शालिग्राम जी को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराएं, पीले वस्त्र पहनाएं, जनेऊ और पीला चंदन लगाएं।
- दोनों को हल्दी लगाने की रस्म करें (हल्दी की थोड़ी सी पेस्ट या हल्दी मिला जल)।
चरण 3: पूजन और संकल्प (प्रदोष काल — शाम 05:25 से 07:49, दिल्ली)
- सबसे पहले श्री गणेश का पूजन करें — ॐ गं गणपतये नमः
- हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें — "मैं (अपना नाम) अपने परिवार की सुख-समृद्धि और कन्यादान के पुण्य के लिए माता तुलसी और भगवान शालिग्राम का विवाह करा रहा/रही हूँ।"
- घी का दीपक जलाएं। तुलसी जी को रोली, हल्दी, अक्षत और फूल अर्पित करें। शालिग्राम जी को पीला चंदन, तिल, तुलसी दल और फूल अर्पित करें। फिर दोनों को धूप-दीप दिखाएं।
- तुलसी मंत्र का जाप करें — ॐ श्री तुलस्यै विद्महे, विष्णुप्रियायै धीमहि, तन्नो वृन्दा प्रचोदयात्॥
चरण 4: वरमाला, कन्यादान और गठबंधन
- शालिग्राम जी की चौकी को तुलसी जी के सामने लाएं और दोनों को वरमाला पहनाएं।
- घर के जो सदस्य कन्या पक्ष बने हैं (आम तौर पर दंपती), वे हाथ में जल, अक्षत, फूल और दक्षिणा लेकर कन्यादान करें — माता तुलसी का हाथ शालिग्राम जी को सौंपने का भाव रखें।
- तुलसी जी की चुनरी और शालिग्राम जी के पीले वस्त्र से गठबंधन करें (या मौली से दोनों को जोड़ें)।
चरण 5: सात फेरे
- घर का कोई पुरुष सदस्य शालिग्राम जी की चौकी या प्रतिमा हाथ में लेकर तुलसी जी के चारों ओर सात परिक्रमा (फेरे) करे।
- फेरों के दौरान बाकी लोग मंगल गीत गाएं, शंख और घंटी बजाएं और फूल बरसाएं।
- फेरों के बाद शालिग्राम जी को तुलसी जी के बाईं ओर बिठाएं (विवाह के बाद पत्नी का स्थान बाईं ओर होता है)।
चरण 6: भोग और आरती
- हलवा, खीर, पूरी, मिठाई और मौसमी फल — आंवला, बेर, सिंघाड़ा, शकरकंद, गन्ना — का भोग लगाएं।
- तुलसी नामाष्टक या यह स्तुति पढ़ें:
महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्यवर्धिनी।
आधि व्याधि हरा नित्यं तुलसी त्वं नमोऽस्तुते॥ - तुलसी माता की आरती और भगवान विष्णु की आरती ("ॐ जय जगदीश हरे") करें।
- सुहागिन महिलाएं तुलसी जी को चढ़ाया सिंदूर अपनी मांग में लगाती हैं।
चरण 7: प्रसाद और समापन
- सभी को प्रसाद बांटें और कन्यादान करने वाले व्रत खोलें।
- तुलसी जी पर चढ़ाया सुहाग का सामान अगले दिन किसी सुहागिन ब्राह्मणी या ज़रूरतमंद महिला को दान कर दें।
- मंडप के गन्ने अगले दिन प्रसाद के रूप में बांट दें।
व्रत के नियम
✅ तुलसी विवाह पर क्या करें
- विवाह प्रदोष काल (शाम) में, द्वादशी तिथि के दौरान करें।
- तुलसी जी का पूरा श्रृंगार दुल्हन की तरह करें और शालिग्राम जी को पीले वस्त्र पहनाएं।
- कन्यादान करने वाले दिन भर व्रत रखें और कन्यादान के बाद पारण करें।
- भोग में कार्तिक के मौसमी फल — आंवला, बेर, सिंघाड़ा, शकरकंद और गन्ना अवश्य रखें।
- शाम को तुलसी के पास घी का दीपक जलाएं — पूरे कार्तिक मास में यह विशेष पुण्यदायी है।
- सुहाग का सामान बाद में किसी सुहागिन को दान करें।
❌ तुलसी विवाह पर क्या न करें
- इस दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें। भोग के लिए तुलसी दल एक दिन पहले तोड़कर रख लें। रविवार, एकादशी और सूर्यास्त के बाद भी तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
- शालिग्राम जी पर अक्षत (चावल) नहीं चढ़ाए जाते — कई परंपराओं में इसकी जगह तिल या सफेद चंदन चढ़ाते हैं। अपनी परंपरा के अनुसार चलें।
- तुलसी जी को दूध न चढ़ाएं — केवल शुद्ध जल अर्पित करें (दूध से पौधा खराब होता है)।
- सूखी या मुरझाई तुलसी का विवाह न कराएं — विवाह से पहले स्वस्थ, हरा पौधा तैयार रखें।
- इस दिन लहसुन, प्याज़, मांस और मदिरा का सेवन न करें।
- तुलसी के पौधे के पास गंदगी, जूते-चप्पल या कूड़ा न रखें।
तुलसी विवाह — व्रत कथा
तुलसी विवाह — आरती
तुलसी विवाह — चालीसा
Hinglish
Tulsi Vivah 2026 kab hai? Shanivar, 21 November 2026, Kartik Shukla Dwadashi. Dwadashi 21 November subah 06:33 se 22 November subah 04:58 tak.
Muhurat: Pradosh kaal (New Delhi) shaam 05:25 se 07:49 tak. Kai parivaar Devuthani Ekadashi (20 Nov) ki shaam ko bhi vivah karate hain. Ekadashi se Kartik Purnima (24 Nov) tak kisi bhi shaam vivah ho sakta hai.
Vidhi: Tulsi ke gamle ke chaaron or 4 ganne ka mandap banayein. Tulsi ji ko laal chunri aur solah shringar se dulhan ki tarah sajayein, aur Shaligram ji ko peele vastra pehnayein. Phir varmala, kanyadaan aur gathbandhan karein, aur Shaligram ji ko haath mein lekar Tulsi ke 7 phere lein. Bhog mein amla, ber, singhara, shakarkand aur ganna rakhein, phir aarti karein.
Niyam: Is din tulsi ke patte na todein. Tulsi par doodh na chadhayein. Suhaag ka saamaan baad mein daan karein.
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
तुलसी विवाह 2026 कब है?
तुलसी विवाह 2026 में शनिवार, 21 नवंबर को कार्तिक शुक्ल द्वादशी पर है।
द्वादशी तिथि कब से कब तक है?
कार्तिक शुक्ल द्वादशी 21 नवंबर 2026 सुबह लगभग 06:33 से 22 नवंबर सुबह लगभग 04:58 तक है।
तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त क्या है?
नई दिल्ली में प्रदोष काल 21 नवंबर शाम 05:25 से 07:49 तक है। विवाह इसी समय करना सबसे शुभ है।
क्या तुलसी विवाह एकादशी को भी कर सकते हैं?
हां, कई परिवार देवउठनी एकादशी (20 नवंबर) की शाम को ही तुलसी विवाह करते हैं। एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा (24 नवंबर) तक किसी भी शाम विवाह किया जा सकता है।
तुलसी विवाह किससे होता है?
माता तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम जी से होता है। शालिग्राम न हो तो भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा का प्रयोग कर सकते हैं।
तुलसी विवाह कराने से क्या फल मिलता है?
मान्यता है कि तुलसी विवाह कराने से कन्यादान के समान पुण्य मिलता है, वैवाहिक जीवन सुखी होता है और कुंवारी कन्याओं को अच्छा वर मिलता है।
तुलसी विवाह में फेरे कौन लेता है?
घर का कोई पुरुष सदस्य शालिग्राम जी को हाथ में लेकर तुलसी जी के चारों ओर सात फेरे लेता है।
तुलसी विवाह की कथा क्या है?
पतिव्रता वृंदा के पति जालंधर का अंत करने के लिए भगवान विष्णु ने छल किया। वृंदा के श्राप से विष्णु जी शालिग्राम बने और वृंदा की भस्म से तुलसी उगी। विष्णु जी ने वरदान दिया कि शालिग्राम रूप में उनका विवाह तुलसी से होगा।
तुलसी विवाह में क्या भोग लगाते हैं?
हलवा, खीर, पूरी, मिठाई और कार्तिक के मौसमी फल — आंवला, बेर, सिंघाड़ा, शकरकंद, सीताफल और गन्ना।
क्या तुलसी विवाह के दिन तुलसी तोड़ सकते हैं?
नहीं, इस दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते। भोग के लिए एक दिन पहले तुलसी दल तोड़कर रख लें।
तुलसी विवाह के बाद क्या शुरू होता है?
तुलसी विवाह के साथ विवाह आदि शुभ और मांगलिक कार्यों का मौसम शुरू हो जाता है, जो चातुर्मास में बंद रहता है।