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कार्तिक पूर्णिमा 2026: देव दीपावली मुहूर्त, गंगा स्नान, दीपदान विधि, त्रिपुरारी कथा और महत्व

कार्तिक पूर्णिमा को वर्ष की सबसे पवित्र पूर्णिमा माना जाता है। इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था, जिसकी खुशी में देवताओं ने काशी में दीप जलाकर दिवाली मनाई — इसीलिए इसे देव दीपावली कहते हैं। इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था और गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व भी मनाया जाता है। इस पेज पर गंगा स्नान, दीपदान, पूजा विधि, कथा और इस दिन की हर परंपरा विस्तार से दी गई है।

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तारीख 24 नवंबर 2026, मंगलवार
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हिंदू तिथि कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा
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शुभ मुहूर्त गंगा स्नान ब्रह्म मुहूर्त में | देव दीपावली प्रदोष: वाराणसी 05:08 से 07:47 PM, दिल्ली 05:24 से 07:48 PM
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पूज्य देवता भगवान शिव (त्रिपुरारी), भगवान विष्णु, सत्यनारायण भगवान, माँ गंगा
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परिचय

कार्तिक पूर्णिमा पर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान, दिन में भगवान विष्णु, भगवान शिव और सत्यनारायण भगवान की पूजा, ज़रूरतमंदों को दान और शाम को प्रदोष काल में दीपदान किया जाता है। रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण किया जाता है।

नीचे स्नान से लेकर दीपदान और चंद्र अर्घ्य तक की पूरी विधि क्रम से दी गई है। अगर आप नदी तक नहीं जा सकते, तो घर पर ही स्नान और दीपदान करने का तरीका भी बताया गया है।

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कार्तिक पूर्णिमा (देव दीपावली) का महत्व

कार्तिक पूर्णिमा 2026 कब है?

वर्ष 2026 में कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली मंगलवार, 24 नवंबर 2026 को मनाई जाएगी। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है, जिसे त्रिपुरारी पूर्णिमा, त्रिपुरी पूर्णिमा, देव दीपावली और गंगा स्नान पर्व भी कहते हैं।

  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 23 नवंबर 2026, रात लगभग 11:42 बजे
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 24 नवंबर 2026, रात लगभग 08:23 बजे
  • गंगा स्नान का उत्तम समय: 24 नवंबर, ब्रह्म मुहूर्त से सूर्योदय तक
  • देव दीपावली प्रदोष काल मुहूर्त (वाराणसी): शाम लगभग 05:08 से 07:47 तक
  • देव दीपावली प्रदोष काल (नई दिल्ली): शाम लगभग 05:24 से 07:48 तक

23 नवंबर को पूर्णिमा रात में शुरू होगी, जबकि 24 नवंबर को सूर्योदय से लेकर प्रदोष काल तक पूर्णिमा रहेगी, इसलिए स्नान, दान, व्रत और देव दीपावली सभी 24 नवंबर को ही हैं। प्रदोष काल का समय सूर्यास्त के अनुसार हर शहर में कुछ मिनट अलग होता है।

कार्तिक पूर्णिमा का महत्व

पूरे वर्ष की बारह पूर्णिमाओं में कार्तिक पूर्णिमा सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन किया गया गंगा स्नान, दीपदान, दान और जप पूरे वर्ष के स्नान-दान के बराबर फल देता है। इस दिन से जुड़े कई बड़े पर्व एक साथ आते हैं:

  • त्रिपुरारी पूर्णिमा: भगवान शिव ने इसी दिन त्रिपुरासुर का वध कर तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त किया था।
  • देव दीपावली: त्रिपुरासुर वध की खुशी में देवताओं ने स्वर्ग से उतरकर काशी (वाराणसी) के गंगा घाटों पर दीप जलाकर दिवाली मनाई थी। मान्यता है कि आज भी इस रात देवता काशी आते हैं।
  • मत्स्य अवतार: भगवान विष्णु ने इसी दिन प्रलय के समय वेदों और सृष्टि की रक्षा के लिए अपना पहला अवतार — मत्स्य (मछली) अवतार — लिया था।
  • कार्तिक स्नान का समापन: शरद पूर्णिमा से शुरू होने वाला एक महीने का कार्तिक स्नान इसी दिन पूर्ण होता है। भीष्म पंचक का भी यह अंतिम दिन है।
  • गुरु नानक जयंती (प्रकाश पर्व): सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्म कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था। गुरुद्वारों में अखंड पाठ, नगर कीर्तन और लंगर होता है।
  • पुष्कर मेला: राजस्थान के पुष्कर में ब्रह्मा जी के एकमात्र प्रमुख मंदिर और पुष्कर सरोवर पर लगने वाला विश्व प्रसिद्ध मेला कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के साथ संपन्न होता है।
  • जैन धर्म: जैन समाज के लिए भी यह दिन पवित्र है; पालीताणा (गुजरात) में शत्रुंजय पर्वत की यात्रा इसी दिन से फिर शुरू होती है।

त्रिपुरारी पूर्णिमा की कथा — भगवान शिव और त्रिपुरासुर

भगवान कार्तिकेय ने जब तारकासुर का वध किया, तो उसके तीन पुत्रों — तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली — ने देवताओं से बदला लेने के लिए ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए तो उन्होंने अमरता का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने कहा — "अमरता का वरदान किसी को नहीं मिल सकता, कुछ और मांगो।"

तब तीनों ने चतुराई से वरदान मांगा — "हमारे लिए तीन ऐसे नगर (पुर) बनें जो आकाश में घूमते रहें — एक सोने का, एक चांदी का और एक लोहे का। हज़ार वर्ष बाद जब ये तीनों नगर एक सीध में आएं, तब कोई देवता एक ही बाण से तीनों को नष्ट कर सके, तभी हमारी मृत्यु हो।" ब्रह्मा जी ने यह वरदान दे दिया। मय दानव ने ये तीनों नगर बनाए, जिन्हें त्रिपुर कहा गया और ये तीनों असुर त्रिपुरासुर कहलाए।

वरदान के अहंकार में त्रिपुरासुर ने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया और देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। तब सभी देवता भगवान शिव की शरण में गए। भगवान शिव ने त्रिपुर के विनाश का संकल्प लिया। पृथ्वी को रथ, सूर्य और चंद्रमा को रथ के पहिए, ब्रह्मा जी को सारथी, मेरु पर्वत को धनुष, वासुकी नाग को धनुष की डोरी और स्वयं भगवान विष्णु को बाण बनाया गया।

जैसे ही हज़ार वर्ष बाद तीनों नगर एक सीध में आए, भगवान शिव ने एक ही बाण से तीनों पुरों को भस्म कर दिया। उस दिन कार्तिक पूर्णिमा थी। इसीलिए भगवान शिव को "त्रिपुरारी" कहा गया और इस दिन को त्रिपुरारी पूर्णिमा। त्रिपुरासुर के अंत की खुशी में सभी देवताओं ने काशी के घाटों पर दीप जलाकर उत्सव मनाया, जो आज देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है।

वाराणसी की देव दीपावली

देव दीपावली का सबसे भव्य रूप वाराणसी (काशी) में देखने को मिलता है। इस रात अस्सी घाट से राजघाट तक गंगा के सभी 80 से अधिक घाटों पर लाखों मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं। गंगा का पूरा किनारा अर्धचंद्राकार प्रकाश की माला जैसा दिखता है।

  • दशाश्वमेध घाट पर वर्ष की सबसे भव्य गंगा आरती होती है, जिसमें सामान्य दिनों से अधिक पुजारी भाग लेते हैं।
  • पंचगंगा घाट के प्राचीन दीप स्तंभ (हजारा) इस रात जलाए जाते हैं।
  • श्रद्धालु नाव से घाटों की जगमगाहट देखते हैं और गंगा में दीपदान करते हैं।
  • इस दिन बहुत भीड़ होती है — घाट पर सूर्यास्त से कम से कम एक घंटा पहले पहुंचें और नाव पहले से बुक कर लें।

देश में कार्तिक पूर्णिमा की परंपराएं

  • उत्तर प्रदेश, बिहार: गंगा, यमुना और संगम पर लाखों लोग स्नान करते हैं। गढ़मुक्तेश्वर, प्रयागराज, हरिद्वार और सोनपुर (बिहार) में विशाल मेले लगते हैं।
  • राजस्थान: पुष्कर सरोवर में पवित्र स्नान और पुष्कर मेला।
  • ओडिशा: "बोइत बंदाण" — लोग नदियों और समुद्र में केले के तने और कागज़ की छोटी नावें दीपक के साथ बहाते हैं, जो प्राचीन समुद्री व्यापार की याद में है।
  • महाराष्ट्र और दक्षिण भारत: "त्रिपुरी पूर्णिमा" पर शिव मंदिरों में दीपमाला जलाई जाती है। तमिलनाडु में "कार्तिगई दीपम" का पर्व भी कार्तिक मास में ही मनाया जाता है।
  • सिख समाज: गुरु नानक जयंती पर प्रभात फेरी, नगर कीर्तन, अखंड पाठ और लंगर।
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पूजा सामग्री

स्नान और पूजा के लिए

  • गंगाजल (घर पर स्नान करने वालों के लिए)
  • लकड़ी की चौकी, पीला या लाल कपड़ा
  • भगवान विष्णु, भगवान शिव और सत्यनारायण भगवान का चित्र या मूर्ति / शिवलिंग
  • रोली, हल्दी, चंदन, अक्षत, मौली
  • फूल, फूलमाला, तुलसी दल (विष्णु जी के लिए), बेलपत्र और धतूरा (शिव जी के लिए)
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • घी का दीपक, धूप-अगरबत्ती, कपूर
  • सत्यनारायण कथा की पुस्तक (वैकल्पिक)

दीपदान के लिए

  • मिट्टी के दीये — कम से कम 11, 21 या 51 (घर, आंगन, मंदिर और तुलसी के लिए)
  • आटे के दीये या पत्तों के दोने (नदी में प्रवाहित करने के लिए)
  • घी या तिल का तेल, रुई की बत्तियाँ
  • 365 बत्ती वाला दीपक (परंपरा अनुसार — 365 बत्तियों को एक साथ बटकर बनाया जाता है)
  • फूल और थोड़ा कुमकुम (दोने में रखने के लिए)

भोग और प्रसाद

  • पंजीरी, पंचामृत, केला (सत्यनारायण कथा के लिए)
  • खीर, हलवा, मिठाई, फल
  • चंद्र अर्घ्य के लिए कच्चा दूध, जल, अक्षत और सफेद फूल

दान के लिए

  • अन्न — गेहूँ, चावल, दाल
  • वस्त्र और कंबल (सर्दियों की शुरुआत में कंबल दान विशेष पुण्यदायी)
  • दीपक, घी, तिल, गुड़
  • फल, मिठाई और दक्षिणा
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पूजा विधि

चरण 1: ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान

  • 24 नवंबर को सूर्योदय से पहले, ब्रह्म मुहूर्त में उठें।
  • संभव हो तो गंगा, यमुना, नर्मदा, संगम या किसी पवित्र नदी / सरोवर में स्नान करें।
  • नदी तक न जा सकें तो घर पर नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नान करते समय यह मंत्र बोलें:
    गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥
  • स्नान के बाद साफ़ या पीले वस्त्र पहनें और सूर्य देव को तांबे के लोटे से जल अर्पित करें।

चरण 2: संकल्प

  • पूजा स्थान पर बैठकर हाथ में जल, अक्षत और फूल लें।
  • संकल्प लें — "मैं (अपना नाम) आज कार्तिक पूर्णिमा पर भगवान विष्णु, भगवान शिव और सत्यनारायण भगवान की कृपा, पापों के नाश और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए स्नान, पूजन, दान और दीपदान कर रहा/रही हूँ।"
  • व्रत रखने वाले दिन भर फलाहार करें और चंद्र अर्घ्य के बाद भोजन करें।

चरण 3: भगवान विष्णु और सत्यनारायण पूजा

  • चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु / सत्यनारायण भगवान को स्थापित करें।
  • सबसे पहले श्री गणेश का स्मरण करें — ॐ गं गणपतये नमः
  • भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएं, पीला चंदन, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें।
  • मंत्र जाप करें: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (108 बार)
  • सत्यनारायण भगवान की कथा सुनें या पढ़ें — पूर्णिमा पर सत्यनारायण कथा का विशेष महत्व है।
  • पंजीरी, पंचामृत और केले का भोग लगाएं और "ॐ जय जगदीश हरे" आरती करें।

चरण 4: भगवान शिव पूजा (त्रिपुरारी पूजन)

  • शिवलिंग पर जल, कच्चा दूध और गंगाजल अर्पित करें।
  • बेलपत्र, धतूरा, सफेद फूल, चंदन और अक्षत चढ़ाएं।
  • मंत्र जाप करें: ॐ नमः शिवाय (108 बार) या महामृत्युंजय मंत्र।
  • भगवान शिव की आरती करें। संभव हो तो पास के शिव मंदिर में दीपदान करें।

चरण 5: तुलसी पूजा

  • तुलसी के पौधे में जल अर्पित करें, रोली-अक्षत चढ़ाएं और घी का दीपक जलाएं।
  • तुलसी की परिक्रमा करें। कार्तिक मास में तुलसी पूजा का विशेष महत्व है और पूर्णिमा पर यह मास पूर्ण होता है।

चरण 6: दान

  • स्नान-पूजा के बाद अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र, कंबल, दीपक, घी, तिल या गुड़ का दान करें।
  • मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर किया गया दान अक्षय फल देता है।
  • गाय को हरा चारा या रोटी खिलाएं।

चरण 7: देव दीपावली — शाम को दीपदान (प्रदोष काल में)

  • शाम को प्रदोष काल में (वाराणसी में लगभग 05:08 से 07:47, दिल्ली में लगभग 05:24 से 07:48) दीपदान करें।
  • नदी में दीपदान: आटे के दीये या पत्तों के दोने में घी/तेल का दीपक, फूल और थोड़ा कुमकुम रखकर उसे जलाएं और भगवान का नाम लेते हुए धीरे से नदी में प्रवाहित करें।
  • घर पर दीपदान: घर के मुख्य द्वार, आंगन, छत, तुलसी, पूजा स्थान, रसोई और पानी के स्थान पर दीपक जलाएं। पास के मंदिर और पीपल के पेड़ के नीचे भी दीपक रखें।
  • 365 बत्ती का दीपक: परंपरा के अनुसार घी में डूबी 365 बत्तियों को एक साथ बटकर एक बड़ा दीपक जलाया जाता है। मान्यता है कि इससे पूरे वर्ष दीपक जलाने का पुण्य मिलता है।
  • दीपदान करते समय यह मंत्र बोलें:
    कीटाः पतङ्गा मशकाश्च वृक्षा जले स्थले ये विचरन्ति जीवाः। दृष्ट्वा प्रदीपं न च जन्मभागिनः भवन्ति नित्यं श्वपचा हि विप्राः॥
    (अर्थ: जल और थल पर रहने वाले जो भी कीट, पतंगे, मच्छर, वृक्ष और जीव इस दीपक को देखें, वे सभी जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हों।)

चरण 8: चंद्र अर्घ्य

  • चंद्रोदय के बाद छत या खुली जगह पर जाकर तांबे के लोटे में जल, कच्चा दूध, अक्षत और सफेद फूल मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें।
  • मंत्र: ॐ सों सोमाय नमः
  • चंद्र देव से मानसिक शांति और आरोग्य की प्रार्थना करें। व्रत रखने वाले इसके बाद भोजन करें।
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व्रत के नियम

✅ कार्तिक पूर्णिमा पर क्या करें

  • ब्रह्म मुहूर्त में गंगा या पवित्र नदी में स्नान करें, या घर पर गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  • भगवान विष्णु, भगवान शिव और सत्यनारायण भगवान की पूजा करें।
  • शाम को प्रदोष काल में दीपदान अवश्य करें — घर, मंदिर, तुलसी और नदी में।
  • अन्न, वस्त्र, कंबल और दीपक का दान करें।
  • तुलसी के पास घी का दीपक जलाएं।
  • चंद्रमा को अर्घ्य दें।
  • सत्यनारायण कथा सुनें या पढ़ें।
  • सिख परिवार और सभी श्रद्धालु गुरुद्वारे जाकर गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व मनाएं।

❌ कार्तिक पूर्णिमा पर क्या न करें

  • इस दिन मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज़ और तामसिक भोजन से दूर रहें।
  • नदी में स्नान करते समय साबुन, शैम्पू का प्रयोग न करें और नदी में कचरा, प्लास्टिक या पूजा की सामग्री का प्लास्टिक न डालें।
  • दीपदान के लिए प्लास्टिक या थर्माकोल के दोने का प्रयोग न करें — आटे के दीये या पत्तों के दोने ही लें।
  • किसी से झगड़ा, अपमान या कटु वचन न बोलें।
  • घर को शाम के समय अंधेरा न छोड़ें।
  • भीड़ वाले घाटों पर बच्चों और बुज़ुर्गों को अकेला न छोड़ें; गहरे पानी में न जाएं।
  • तुलसी के पत्ते सूर्यास्त के बाद न तोड़ें।
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कार्तिक पूर्णिमा (देव दीपावली) — व्रत कथा

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कार्तिक पूर्णिमा (देव दीपावली) — आरती

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Hinglish

Kartik Purnima 2026 kab hai? Mangalvar, 24 November 2026. Purnima tithi 23 November raat 11:42 se 24 November raat 08:23 tak. Dev Deepawali pradosh muhurat Varanasi mein shaam 05:08 se 07:47 tak (Delhi mein lagbhag 05:24 se 07:48).

Mahatva: Is din Bhagwan Shiv ne Tripurasur ka vadh kiya tha, devtaon ne Kashi mein diye jalakar Dev Deepawali manayi thi, Vishnu ji ne Matsya avatar liya tha aur Guru Nanak Dev ji ka Prakash Parv bhi isi din hai.

Puja vidhi: Brahma muhurat mein Ganga snaan (ya ghar par gangajal milakar), sankalp, Vishnu ji aur Satyanarayan ki puja aur katha, Shiv ji ko jal, doodh aur belpatra, Tulsi ke paas diya, aur ann-vastra ka daan karein.

Deepdaan: Shaam ko pradosh kaal mein ghar, mandir, tulsi aur nadi mein diye jalayein. Aate ke diye ya patte ke done mein diya rakhkar nadi mein pravahit karein. 365 batti ka diya jalane ki bhi parampara hai.

Dhyan rakhein: Nadi mein plastic ya sabun na daalein, thermocol ke done ka use na karein aur tamsik bhojan se bachein.

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कार्तिक पूर्णिमा 2026 कब है?

कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली 2026 में मंगलवार, 24 नवंबर को मनाई जाएगी।

पूर्णिमा तिथि कब से कब तक है?

पूर्णिमा तिथि 23 नवंबर 2026 को रात लगभग 11:42 बजे से 24 नवंबर को रात लगभग 08:23 बजे तक रहेगी।

देव दीपावली 2026 का मुहूर्त क्या है?

देव दीपावली का प्रदोष काल मुहूर्त वाराणसी में 24 नवंबर को शाम लगभग 05:08 से 07:47 तक और नई दिल्ली में लगभग 05:24 से 07:48 तक है।

कार्तिक पूर्णिमा 23 नवंबर को है या 24 नवंबर को?

कार्तिक पूर्णिमा 24 नवंबर को है। 23 नवंबर को पूर्णिमा देर रात शुरू होगी, जबकि 24 नवंबर को सूर्योदय से प्रदोष काल तक पूर्णिमा रहेगी, इसलिए स्नान, दान और देव दीपावली 24 नवंबर को ही हैं।

देव दीपावली क्यों मनाई जाती है?

कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था। इसकी खुशी में देवताओं ने काशी के गंगा घाटों पर दीप जलाकर दिवाली मनाई थी, इसलिए इसे देव दीपावली यानी देवताओं की दिवाली कहते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा क्यों कहते हैं?

इस दिन भगवान शिव ने एक ही बाण से त्रिपुरासुर के तीनों नगरों को भस्म किया था, जिससे वे त्रिपुरारी कहलाए। इसलिए इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा कहते हैं।

गुरु नानक जयंती 2026 कब है?

गुरु नानक जयंती (प्रकाश पर्व) कार्तिक पूर्णिमा के दिन, मंगलवार 24 नवंबर 2026 को है।

कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान कब करें?

कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान 24 नवंबर को ब्रह्म मुहूर्त से सूर्योदय तक करना सबसे उत्तम है। नदी तक न जा सकें तो घर पर पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।

365 बत्ती का दीपक क्यों जलाते हैं?

मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर 365 बत्तियों वाला दीपक जलाने से पूरे वर्ष रोज़ दीपक जलाने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।

कार्तिक पूर्णिमा पर क्या दान करें?

अन्न, वस्त्र, कंबल, दीपक, घी, तिल, गुड़ और फल का दान करना शुभ माना जाता है। सर्दियों की शुरुआत होने के कारण कंबल दान का विशेष महत्व है।

मत्स्य अवतार कार्तिक पूर्णिमा से कैसे जुड़ा है?

मान्यता है कि भगवान विष्णु ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही प्रलय से वेदों और सृष्टि की रक्षा के लिए अपना पहला अवतार, मत्स्य अवतार, लिया था।

वाराणसी में देव दीपावली कैसे देखें?

सूर्यास्त से कम से कम एक घंटा पहले घाट पर पहुंचें। दशाश्वमेध घाट की गंगा आरती और नाव से घाटों की जगमगाहट देखना सबसे सुंदर अनुभव है। इस दिन बहुत भीड़ होती है, इसलिए नाव पहले से बुक कर लें।

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