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करवा चौथ 2026: पूजा मुहूर्त, चंद्रोदय समय, संपूर्ण व्रत विधि, सामग्री और कथा

करवा चौथ सुहागिन महिलाओं का सबसे पावन व्रत है, जिसमें वे सूर्योदय से चंद्रोदय तक बिना अन्न-जल के निर्जला उपवास रखकर पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। इस पेज पर सरगी, संकल्प, करवा भरना, शाम की पूजा, थाली फेरना, कथा सुनना और छलनी से चाँद देखकर अर्घ्य देने तक की हर बात क्रम से दी गई है।

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तारीख 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार
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हिंदू तिथि कार्तिक कृष्ण चतुर्थी (वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी)
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शुभ मुहूर्त शाम 05:38 से 06:56 तक | चंद्रोदय रात 08:17 (नई दिल्ली)
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पूज्य देवता माँ पार्वती (करवा माता), भगवान शिव, श्री गणेश, चंद्र देव
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परिचय

करवा चौथ केवल एक उपवास नहीं, बल्कि पति-पत्नी के अटूट प्रेम, विश्वास और समर्पण का उत्सव है। इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं, हाथों में मेहंदी लगाती हैं और दिन भर निर्जला रहकर शाम को माँ गौरी की पूजा करती हैं। रात को छलनी से चाँद और फिर पति का चेहरा देखकर, पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोला जाता है।

नीचे दी गई विधि घर पर स्वयं पूजा करने वाली महिलाओं के लिए आसान भाषा में, क्रम से लिखी गई है। एक दिन पहले सामग्री की सूची देखकर सारा सामान तैयार कर लें।

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करवा चौथ का महत्व

करवा चौथ 2026 कब है?

वर्ष 2026 में करवा चौथ का व्रत गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा। यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को होता है (अमांत पंचांग वाले क्षेत्रों में इसे आश्विन कृष्ण चतुर्थी कहा जाता है — तिथि वही है)। उदया तिथि और चंद्रोदय के समय चतुर्थी होने के कारण 29 अक्टूबर ही व्रत का सही दिन है।

  • चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 29 अक्टूबर 2026, रात 01:06 बजे (28-29 की मध्यरात्रि के बाद)
  • चतुर्थी तिथि समाप्त: 29 अक्टूबर 2026, रात 10:09 बजे
  • करवा चौथ पूजा मुहूर्त: शाम 05:38 से 06:56 तक (नई दिल्ली, अवधि लगभग 1 घंटा 18 मिनट)
  • व्रत का समय: सूर्योदय लगभग सुबह 06:31 से चंद्रोदय रात 08:17 तक (नई दिल्ली)
  • चंद्रोदय (नई दिल्ली): रात लगभग 08:17 बजे
  • सरगी का समय: सूर्योदय से पहले, सुबह लगभग 03:30 से 05:30 के बीच

नोट: चंद्रोदय का समय हर शहर में अलग होता है। बादल, ऊंची इमारतें या क्षितिज साफ़ न होने पर चाँद कुछ मिनट देर से दिखाई दे सकता है।

आपके शहर में करवा चौथ का चाँद कितने बजे निकलेगा? (29 अक्टूबर 2026)

  • दिल्ली / नई दिल्ली: पूजा 05:38–06:56 PM | चंद्रोदय लगभग 08:17 PM
  • जयपुर: पूजा 05:46–07:03 PM | चंद्रोदय लगभग 08:28 PM
  • चंडीगढ़: पूजा 05:37–06:54 PM | चंद्रोदय लगभग 08:12 PM
  • लुधियाना: पूजा 05:41–06:58 PM | चंद्रोदय लगभग 08:15 PM
  • देहरादून: पूजा 05:33–06:50 PM | चंद्रोदय लगभग 08:08 PM
  • आगरा: पूजा 05:37–06:54 PM | चंद्रोदय लगभग 08:18 PM
  • लखनऊ: पूजा 05:26–06:43 PM | चंद्रोदय लगभग 08:06 PM
  • कानपुर: पूजा 05:28–06:45 PM | चंद्रोदय लगभग 08:10 PM
  • वाराणसी: पूजा 05:19–06:36 PM | चंद्रोदय लगभग 08:02 PM
  • पटना: पूजा 05:10–06:27 PM | चंद्रोदय लगभग 07:52 PM
  • कोलकाता: पूजा 05:01–06:17 PM | चंद्रोदय लगभग 07:47 PM
  • भोपाल: पूजा 05:44–07:01 PM | चंद्रोदय लगभग 08:31 PM
  • इंदौर: पूजा 05:50–07:07 PM | चंद्रोदय लगभग 08:39 PM
  • अहमदाबाद: पूजा 06:03–07:20 PM | चंद्रोदय लगभग 08:52 PM
  • सूरत: पूजा 06:04–07:21 PM | चंद्रोदय लगभग 08:55 PM
  • मुंबई: पूजा 06:06–07:23 PM | चंद्रोदय लगभग 09:01 PM
  • पुणे: पूजा 06:03–07:20 PM | चंद्रोदय लगभग 08:58 PM
  • हैदराबाद: पूजा 05:46–07:03 PM | चंद्रोदय लगभग 08:41 PM
  • बेंगलुरु: पूजा 05:54–07:11 PM | चंद्रोदय लगभग 08:56 PM
  • चेन्नई: पूजा 05:43–07:00 PM | चंद्रोदय लगभग 08:44 PM

करवा चौथ का महत्व

"करवा" का अर्थ है मिट्टी का टोंटीदार पात्र और "चौथ" का अर्थ है चतुर्थी तिथि। इस दिन सुहागिन महिलाएं माँ पार्वती (करवा माता), भगवान शिव, श्री गणेश, कार्तिकेय जी और चंद्र देव की पूजा करती हैं। माँ पार्वती अखंड सौभाग्य की देवी हैं — उन्होंने कठोर तप करके भगवान शिव को पति रूप में पाया था, इसलिए सुहाग की रक्षा के लिए उनकी पूजा की जाती है।

इस दिन संकष्टी चतुर्थी भी होती है, जिसे वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी कहते हैं, इसलिए श्री गणेश की पूजा का विशेष महत्व है। चंद्रमा को मन, शीतलता और दीर्घायु का कारक माना जाता है, इसलिए चाँद को अर्घ्य देकर ही व्रत पूर्ण होता है।

यह व्रत पति-पत्नी के प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक है। आजकल कई पति भी पत्नी के साथ यह व्रत रखते हैं। कई जगह अविवाहित कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत रखती हैं।

करवा चौथ व्रत कथा — रानी वीरावती की कहानी

प्राचीन समय में एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी, जिसका नाम वीरावती था। सातों भाई अपनी इकलौती बहन से बहुत प्रेम करते थे। विवाह के बाद पहली करवा चौथ पर वीरावती अपने मायके आई हुई थी। उसने भाभियों के साथ निर्जला व्रत रखा, लेकिन शाम होते-होते भूख-प्यास से वह बेहाल हो गई और मूर्छित-सी होने लगी।

भाइयों से बहन की यह हालत देखी नहीं गई। उन्होंने एक उपाय सोचा। एक भाई दूर पीपल के पेड़ पर चढ़ गया और छलनी के पीछे दीपक जलाकर रख दिया। दूर से वह रोशनी ऐसी लग रही थी जैसे चाँद निकल आया हो। भाइयों ने वीरावती से कहा — "देखो बहन, चाँद निकल आया है, अर्घ्य देकर भोजन कर लो।"

वीरावती ने भाभियों से भी चलने को कहा, पर भाभियाँ समझ गई थीं और बोलीं — "अभी तुम्हारा चाँद निकला है, हमारा नहीं।" भोली वीरावती ने उस नकली चाँद को अर्घ्य दे दिया और भोजन करने बैठ गई। पहले कौर में बाल निकला, दूसरे में छींक आई और तीसरा कौर मुंह में डालते ही ससुराल से संदेश आया कि उसके पति की मृत्यु हो गई है।

वीरावती बिलख-बिलख कर रोने लगी। तब भाभियों ने उसे सच्चाई बताई कि भाइयों के छल के कारण उसका व्रत खंडित हुआ है और करवा माता रुष्ट हो गई हैं। वीरावती ने संकल्प लिया कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व के बल पर उन्हें जीवित करेगी। वह पूरे एक वर्ष तक पति के शव के पास बैठी रही, उसकी देखभाल करती रही और हर चौथ का व्रत पूरी श्रद्धा से करती रही।

अगले वर्ष कार्तिक कृष्ण चतुर्थी आने पर उसने पूरे विधि-विधान से करवा चौथ का व्रत किया। शाम को जब भाभियाँ व्रत खोलने लगीं तो वह हर भाभी से कहती — "यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो।" अंत में सबसे छोटी भाभी ने, जिसके पति के कारण व्रत टूटा था, उसकी सच्ची भक्ति देखकर अपनी छोटी उंगली चीरकर उसके पति के मुंह में अमृत डाला। पति "श्री गणेश-श्री गणेश" कहता हुआ उठ बैठा। करवा माता और गणेश जी की कृपा से वीरावती का सुहाग लौट आया।

हे करवा माता! जैसे वीरावती का सुहाग अमर किया, वैसे ही सबका सुहाग अमर रखना। कहानी कहने वाले, सुनने वाले और हुंकारा भरने वाले — सबकी मनोकामना पूर्ण करना।

करवा चौथ से जुड़ी अन्य कथाएं

करवा धोबिन और मगरमच्छ

करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री थी। एक दिन नदी में स्नान करते समय उसके पति का पैर मगरमच्छ ने पकड़ लिया। करवा ने अपने तप के बल से कच्चे सूत से मगरमच्छ को बांध दिया और यमराज के पास जाकर पति के प्राण मांगे। उसकी पतिभक्ति और सतीत्व से डरकर यमराज ने मगरमच्छ को यमलोक भेजा और उसके पति को दीर्घायु का वरदान दिया। इसी करवा के नाम से यह व्रत "करवा चौथ" कहलाया।

द्रौपदी और श्रीकृष्ण

महाभारत काल में जब अर्जुन तपस्या के लिए नीलगिरि पर्वत पर गए थे और पांडवों पर संकट आया, तब द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछा। श्रीकृष्ण ने उन्हें वही व्रत बताया जो माँ पार्वती ने भगवान शिव के कहने पर किया था। द्रौपदी ने करवा चौथ का व्रत किया और पांडव संकट से मुक्त हुए।

सत्यवान-सावित्री

सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस मांगे और अपने अटूट निश्चय से उन्हें जीवनदान दिलाया। करवा चौथ पर इस कथा को भी पतिव्रत धर्म की शक्ति के उदाहरण के रूप में याद किया जाता है।

भारत में करवा चौथ की परंपराएं

  • पंजाब-हरियाणा: सास बहू को सरगी देती है। शाम को महिलाएं गोल घेरे में बैठकर थाली फेरती हैं और "वीरो कुड़िए करवड़ा" गाती हैं।
  • राजस्थान: दीवार पर करवा माता का चित्र बनाकर पूजा, गणगौर जैसी सजी-धजी परंपरा और बायना निकालना।
  • उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश: दीवार पर गेरू से करवा चौथ का चित्र (चाँद, सूरज, करवा, शिव-पार्वती), चौथ माता की कहानी और कुम्हार के करवे से पूजा।
  • बिहार-झारखंड: कुछ क्षेत्रों में इसी तरह चंद्र पूजा का पर्व "चौरचन" भाद्रपद में मनाया जाता है।
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पूजा सामग्री

सरगी के लिए (सास की ओर से)

  • फेनी / सेवइयां (दूध वाली), मठरी
  • सूखे मेवे — बादाम, काजू, किशमिश, अखरोट, नारियल
  • फल — केला, सेब, अनार, पपीता
  • मिठाई और नारियल पानी / दूध
  • श्रृंगार का सामान और वस्त्र (सास बहू को उपहार में देती है)

करवा और पूजा स्थापना

  • मिट्टी के 2 करवे (टोंटी वाले) ढक्कन सहित — एक व्रती का और एक बायने के लिए (कई जगह पीतल या तांबे का करवा भी लेते हैं)
  • करवा माता / चौथ माता का चित्र या कैलेंडर (जिसमें शिव-पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और चंद्रमा हों)
  • गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी या गोबर (या माँ पार्वती की छोटी मूर्ति)
  • लकड़ी की चौकी या पटा और उस पर बिछाने के लिए लाल कपड़ा
  • गेरू और चावल का आटा / खड़िया (दीवार या ज़मीन पर चित्र बनाने के लिए)

पूजा की थाली

  • रोली (कुमकुम), हल्दी, चंदन, अक्षत (साबुत चावल), सिंदूर
  • मौली (कलावा), दीपक, घी, रुई की बत्ती, माचिस
  • धूप-अगरबत्ती, कपूर
  • फूल और फूलमाला, दूर्वा (गणेश जी के लिए)
  • गंगाजल, शुद्ध जल से भरा लोटा
  • मिठाई, फल, पान का पत्ता, सुपारी, लौंग, इलायची
  • दक्षिणा के लिए सिक्के / रुपये

करवे में भरने के लिए

  • जल (या कुछ परंपराओं में दूध) — व्रती के करवे में
  • गेहूँ या चावल, बताशे / शक्कर, खील — बायने वाले करवे में
  • करवे की टोंटी में लगाने के लिए सींक (कांस की 5 या 7 सींकें)
  • करवे के ढक्कन पर रखने के लिए मिठाई या बताशे

श्रृंगार / सुहाग सामग्री (माँ गौरी के लिए)

  • लाल चुनरी, चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, काजल, महावर
  • बिछिया, कंघी, शीशा, इत्र
  • यही सामान व्रती महिला स्वयं भी सोलह श्रृंगार में धारण करती है

चंद्र दर्शन और अर्घ्य के लिए

  • छलनी (आटा छानने वाली, नई या साफ़ — सजाई हुई भी मिलती है)
  • अर्घ्य के लिए जल से भरा लोटा या करवा (जल में थोड़ा दूध, चावल और फूल डाल सकते हैं)
  • एक जलता हुआ दीपक (छलनी में रखने के लिए)
  • मिठाई (पति के हाथ से व्रत खोलने के लिए)

बायना (सास / जेठानी को देने के लिए)

  • मिठाई, मठरी, फल, सूखे मेवे
  • वस्त्र या साड़ी, श्रृंगार का सामान
  • भरा हुआ करवा और दक्षिणा
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पूजा विधि

चरण 1: एक दिन पहले की तैयारी

  • व्रत से एक दिन पहले हाथों और पैरों में मेहंदी लगाएं। मेहंदी को सुहाग का प्रतीक माना जाता है।
  • पूजा का सारा सामान, करवे, छलनी और श्रृंगार का सामान एक जगह तैयार कर लें।
  • रात को हल्का और सात्विक भोजन करें।

चरण 2: सरगी (सूर्योदय से पहले)

  • सुबह सूर्योदय से पहले (लगभग 03:30 से 05:30 के बीच) उठकर स्नान करें।
  • सास द्वारा दी गई सरगी ग्रहण करें — फेनी/सेवइयां, मठरी, सूखे मेवे, फल और मिठाई। सास न हों तो घर की कोई बड़ी महिला या स्वयं भी सरगी तैयार कर सकती हैं।
  • सरगी में ऐसी चीज़ें खाएं जिनसे दिन भर शरीर में ऊर्जा और पानी की कमी न हो — जैसे नारियल पानी, फल, दूध वाली सेवइयां और भीगे हुए मेवे। बहुत नमकीन और तली चीज़ें न खाएं, इनसे प्यास ज़्यादा लगती है।
  • सरगी सूर्योदय से पहले ही खत्म कर लें। इसके बाद व्रत शुरू हो जाता है।

चरण 3: व्रत का संकल्प

  • सूर्योदय के समय स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें और पूजा स्थान पर दीपक जलाएं।
  • हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प करें:
    मम सुख सौभाग्य पुत्र-पौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।
  • या सरल भाषा में बोलें — "मैं (अपना नाम) अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य के लिए आज करवा चौथ का निर्जला व्रत रख रही हूँ। हे करवा माता, मेरा व्रत सफल करें।"
  • जल को ज़मीन पर छोड़ दें। अब पूरे दिन बिना अन्न और जल के व्रत रखें।

चरण 4: दिन भर क्या करें

  • दिन में भगवान का स्मरण करें, भजन सुनें और मन को शांत रखें।
  • दोपहर तक सोलह श्रृंगार की तैयारी करें। शाम की पूजा के लिए लाल, गुलाबी, मरून या पीले रंग के वस्त्र (शादी का जोड़ा या साड़ी) पहनना शुभ माना जाता है।
  • कैंची, सुई-धागे का काम (सिलाई-कढ़ाई) करने से बचें — यह परंपरा में वर्जित माना जाता है।
  • किसी से झगड़ा या कटु वचन न बोलें।

चरण 5: पूजा स्थान और करवा माता का चित्र

  • शाम को पूजा से पहले पूजा स्थान को साफ़ करके गंगाजल छिड़कें।
  • दीवार पर गेरू से करवा चौथ का चित्र बनाएं (या चौथ माता का कैलेंडर लगाएं) — इसमें चाँद, सूरज, करवा, शिव-पार्वती, गणेश जी और कार्तिकेय जी होते हैं।
  • चित्र के नीचे लकड़ी की चौकी रखें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं।
  • चौकी पर पीली मिट्टी या गोबर से गौरी (माँ पार्वती) बनाकर रखें। उनकी गोद में छोटे गणेश जी बनाएं। चाहें तो शिव परिवार की मूर्ति या फोटो रखें।
  • गौरी माँ को लाल चुनरी ओढ़ाएं और सुहाग का सामान (बिंदी, सिंदूर, चूड़ी, मेहंदी) अर्पित करें।

चरण 6: करवा भरना और स्थापित करना

  • मिट्टी के करवे को धोकर उस पर मौली बांधें और रोली से स्वस्तिक बनाएं।
  • व्रती का करवा: इसमें जल (कुछ परंपराओं में दूध) भरें। इसी जल से रात को चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।
  • बायने का करवा: इसमें गेहूँ या चावल, बताशे या शक्कर भरें।
  • करवे की टोंटी में कांस की सींकें लगाएं (यह करवा माता की शक्ति का प्रतीक है)।
  • करवे के ढक्कन पर बताशे या मिठाई और कुछ दक्षिणा रखें।
  • दोनों करवों को गौरी माँ के सामने चौकी पर स्थापित करें।

चरण 7: शाम की पूजा (मुहूर्त 05:38 से 06:56, दिल्ली)

  • सोलह श्रृंगार करके, सिर ढककर, पूजा स्थान पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • घी का दीपक जलाएं और सबसे पहले श्री गणेश की पूजा करें — रोली, अक्षत, दूर्वा, फूल और मिठाई चढ़ाकर बोलें: ॐ गं गणपतये नमः।
  • फिर भगवान शिव की पूजा करें — ॐ नमः शिवाय।
  • अब माँ गौरी (करवा माता) की पूजा करें — रोली, सिंदूर, अक्षत, फूल, सुहाग सामग्री, फल और मिठाई अर्पित करें। हाथ जोड़कर यह मंत्र बोलें:
    नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संततिं शुभाम्। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥
  • कार्तिकेय जी का स्मरण करें — ॐ षण्मुखाय नमः।
  • करवों पर रोली, अक्षत और फूल चढ़ाकर उनकी पूजा करें।

चरण 8: थाली फेरना

  • कई क्षेत्रों (खासकर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली) में महिलाएं एक गोल घेरे में बैठती हैं और अपनी-अपनी पूजा की थाली एक-दूसरे को आगे बढ़ाती (फेरती) हैं।
  • थाली सात बार फेरी जाती है और साथ में पारंपरिक गीत गाया जाता है। पहली छह फेरी में व्रत के नियम दोहराए जाते हैं और सातवीं फेरी में व्रत पूरा होने की खुशी गाई जाती है।
  • थाली फेरते समय घर की बड़ी या कोई अनुभवी महिला कथा कहती है।

चरण 9: करवा चौथ की कथा सुनना

  • हाथ में थोड़े गेहूँ या चावल के 13 दाने और जल का लोटा लेकर कथा सुनें। कथा के बीच-बीच में "हुंकारा" भरें।
  • वीरावती की कथा (ऊपर दी गई है) और करवा धोबिन की कथा सुनी जाती है। कई घरों में गणेश जी की कहानी भी सुनाई जाती है।
  • कथा के बाद हाथ के दाने करवे पर चढ़ा दें या संभालकर रखें — इन्हें चंद्र अर्घ्य के समय उपयोग करते हैं।
  • कथा के बाद करवा माता की आरती करें।

चरण 10: बायना निकालना

  • पूजा के बाद बायने वाला करवा, मिठाई, फल, मेवे, वस्त्र और दक्षिणा एक थाली में रखें।
  • हाथ में थाली लेकर उस पर 7 बार हाथ घुमाएं (वारना करें) और फिर सास के पैर छूकर उन्हें बायना दें।
  • सास न हों तो जेठानी, ननद या किसी बड़ी सुहागिन महिला को बायना दें, या मंदिर में दान करें।
  • सास आशीर्वाद देती हैं — "सदा सुहागन रहो, दूधों नहाओ पूतों फलो।"

चरण 11: चंद्र दर्शन और अर्घ्य (चंद्रोदय लगभग 08:17, दिल्ली)

  • चाँद निकलने की खबर मिलते ही पति के साथ छत या खुली जगह पर जाएं। साथ में पूजा की थाली, जल से भरा करवा/लोटा, छलनी, दीपक और मिठाई ले जाएं।
  • छलनी में जलता हुआ दीपक रखें और छलनी से चाँद को देखें।
  • चंद्रमा को रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएं और करवे के जल से अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय यह मंत्र बोलें:
    करकं क्षीरसंपूर्णं तोयपूर्णमथापि वा। ददामि रत्नसंयुक्तं चिरंजीवतु मे पतिः॥
    या सरल मंत्र: ॐ सोमाय नमः
  • अर्घ्य देते हुए चंद्र देव से पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन की प्रार्थना करें।
  • चाँद की 7 बार परिक्रमा (अपने स्थान पर घूमकर) करें।
  • फिर उसी छलनी से पति का चेहरा देखें।

चरण 12: व्रत खोलना (पारण)

  • पति के पैर छूकर आशीर्वाद लें।
  • पति अपने हाथ से करवे या लोटे का जल पिलाकर व्रत खुलवाते हैं, फिर मिठाई खिलाते हैं।
  • घर के सभी बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लें।
  • इसके बाद पूजा का प्रसाद ग्रहण करें और फिर सात्विक भोजन करें। व्रत के बाद एकदम बहुत भारी या तला हुआ खाना न खाएं; पहले थोड़ा पानी, फल या हल्का भोजन लें।

चरण 13: अगले दिन

  • करवे का बचा हुआ जल तुलसी या किसी पौधे में डाल दें।
  • मिट्टी की गौरी को अगले दिन किसी पवित्र नदी, तालाब या गमले की मिट्टी में विसर्जित करें।
  • करवा संभालकर रख सकते हैं या किसी सुहागिन को दान कर दें।

विशेष परिस्थितियों में

  • बादलों के कारण चाँद न दिखे: पंचांग में दिए चंद्रोदय समय के बाद चंद्रमा की दिशा (पूर्व/उत्तर-पूर्व) में अर्घ्य दे दें, या भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान चंद्रमा (शिव जी की तस्वीर) को अर्घ्य देकर व्रत खोलें। कई जगह दूसरे शहर में रहने वाले परिजनों से वीडियो कॉल पर चाँद देखने की परंपरा भी चल पड़ी है।
  • पति घर पर न हों: पति की तस्वीर को छलनी से देखकर या वीडियो कॉल पर देखकर व्रत खोल सकती हैं।
  • गर्भवती, बीमार या दवाई लेने वाली महिलाएं: निर्जला व्रत न रखें। डॉक्टर की सलाह से जल, दूध, नारियल पानी या फल लेकर व्रत करें — शास्त्रों में भी स्वास्थ्य के अनुसार व्रत रखने की अनुमति है।
  • अविवाहित कन्याएं: परंपरा के अनुसार वे चाँद के बजाय तारों को देखकर अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं, और उनके लिए निर्जला की बाध्यता नहीं होती।
  • पीरियड्स (मासिक धर्म) में: व्रत रख सकती हैं, लेकिन पूजा की सामग्री और मूर्ति स्वयं न छुएं। कथा सुनें और किसी अन्य महिला से पूजा करवाएं।
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व्रत के नियम

✅ करवा चौथ पर क्या करें

  • सूर्योदय से पहले सरगी अवश्य ग्रहण करें और फिर संकल्प लेकर व्रत शुरू करें।
  • पूरे दिन मन में सकारात्मक विचार रखें और भगवान शिव-पार्वती का स्मरण करें।
  • सोलह श्रृंगार करें — मेहंदी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, बिछिया, मंगलसूत्र अवश्य पहनें।
  • लाल, मरून, गुलाबी, पीले या हरे रंग के वस्त्र पहनें।
  • शाम को शुभ मुहूर्त में ही पूजा करें और कथा अवश्य सुनें — बिना कथा के व्रत अधूरा माना जाता है।
  • सास या घर की बड़ी महिला को बायना देकर आशीर्वाद लें।
  • चाँद को छलनी से देखकर अर्घ्य दें और फिर पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोलें।
  • व्रत के बाद ज़रूरतमंद सुहागिन महिलाओं को श्रृंगार का सामान दान करना शुभ माना जाता है।

❌ करवा चौथ पर क्या न करें

  • पूजा में काले, सफेद या गहरे नीले रंग के कपड़े न पहनें — इन्हें सुहाग के व्रत में शुभ नहीं माना जाता।
  • सरगी सूर्योदय के बाद न खाएं।
  • दिन में सोएं नहीं (स्वास्थ्य की समस्या हो तो छूट है)।
  • कैंची, चाकू, सुई-धागे का प्रयोग (कटाई, सिलाई, कढ़ाई) करने से बचें।
  • किसी का अपमान, झगड़ा, चुगली या कटु वचन न बोलें।
  • सुहाग की चीज़ें — सिंदूर, चूड़ी, बिंदी — किसी को उधार न दें और न फेंकें।
  • चाँद निकलने से पहले किसी भी हालत में व्रत न खोलें, और नकली रोशनी या अनुमान पर अर्घ्य न दें (वीरावती की कथा यही सिखाती है)।
  • व्रत खोलने के बाद मांस, मदिरा या तामसिक भोजन न करें।
  • सेहत खराब होने पर ज़िद में निर्जला व्रत न रखें — जल या फल लेकर भी व्रत मान्य है।
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करवा चौथ — आरती

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Hinglish

Karwa Chauth 2026 kab hai? Guruvar, 29 October 2026. Puja muhurat shaam 05:38 se 06:56 tak aur chandroday raat lagbhag 08:17 baje (New Delhi).

Sargi: Suryoday se pehle (lagbhag 03:30 se 05:30) saas ki di hui sargi khayein — pheni, mathri, dry fruits, fal aur mithai. Iske baad din bhar nirjala vrat rakhein.

Sankalp: Haath mein jal, akshat aur phool lekar pati ki lambi aayu aur akhand saubhagya ke liye vrat ka sankalp lein.

Shaam ki puja: Laal kapde wali chowki par Gauri Maa (Karwa Mata) sthapit karein. Mitti ke karwe par mauli baandhein, swastik banayein, ek karwe mein jal aur doosre mein gehu/chawal aur batashe bharein. Pehle Ganesh ji, phir Shiv ji aur Gauri Maa ki puja karein. Thaali pherein, Veeravati ki katha sunein aur Karwa Mata ki aarti karein.

Baayna: Karwa, mithai, kapde aur dakshina saas ko dekar pair chhuein aur aashirvaad lein.

Chand ko arghya: Chand nikalne par chhalni mein deepak rakhkar chand dekhein, karwe ke jal se arghya dein, phir usi chhalni se pati ka chehra dekhein. Pati ke haath se paani peekar aur mithai khaakar vrat kholein.

Dhyan rakhein: Kaale ya safed kapde na pehnein, din mein na soyein, kainchi-sui ka kaam na karein aur chand nikalne se pehle vrat na kholein.

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

करवा चौथ 2026 कब है?

करवा चौथ 2026 में गुरुवार, 29 अक्टूबर को है। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर को रात 01:06 से रात 10:09 तक रहेगी।

करवा चौथ 2026 में चाँद कितने बजे निकलेगा?

नई दिल्ली में चंद्रोदय रात लगभग 08:17 बजे होगा। मुंबई में लगभग 09:01, कोलकाता में 07:47, जयपुर में 08:28 और लखनऊ में 08:06 बजे चाँद निकलेगा।

करवा चौथ 2026 का पूजा मुहूर्त क्या है?

नई दिल्ली के अनुसार करवा चौथ पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 05:38 से 06:56 तक है।

सरगी कितने बजे खानी चाहिए?

सरगी सूर्योदय से पहले, सुबह लगभग 03:30 से 05:30 बजे के बीच खा लेनी चाहिए। सूर्योदय के बाद व्रत शुरू हो जाता है।

करवा चौथ पर किसकी पूजा की जाती है?

इस दिन माँ पार्वती (करवा माता), भगवान शिव, श्री गणेश, कार्तिकेय जी और चंद्र देव की पूजा की जाती है।

करवा चौथ में छलनी से चाँद क्यों देखते हैं?

मान्यता है कि छलनी से चाँद और फिर पति को देखने से चंद्रमा की शीतलता और दीर्घायु का आशीर्वाद पति को मिलता है। वीरावती की कथा में छलनी से बने नकली चाँद के कारण व्रत टूटा था, इसलिए असली चाँद को छलनी से देखकर व्रत पूरा करने की परंपरा है।

करवे में क्या भरते हैं?

व्रती के करवे में जल (कुछ परंपराओं में दूध) भरा जाता है, जिससे चाँद को अर्घ्य दिया जाता है। बायने वाले करवे में गेहूँ या चावल और बताशे/शक्कर भरे जाते हैं।

अगर बादलों की वजह से चाँद न दिखे तो क्या करें?

पंचांग में दिए चंद्रोदय समय के बाद पूर्व दिशा में चंद्रमा की ओर अर्घ्य दे दें, या भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान चंद्रमा (शिव जी की तस्वीर) को अर्घ्य देकर व्रत खोल सकती हैं।

क्या गर्भवती महिलाएं करवा चौथ का निर्जला व्रत रख सकती हैं?

गर्भवती, बीमार या दवाई लेने वाली महिलाओं को निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए। डॉक्टर की सलाह से जल, दूध, नारियल पानी या फल लेकर व्रत रखा जा सकता है।

क्या अविवाहित लड़कियाँ करवा चौथ का व्रत रख सकती हैं?

हाँ, अविवाहित कन्याएं अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत रख सकती हैं। परंपरा के अनुसार वे चाँद के बजाय तारों को देखकर अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं।

करवा चौथ पर कौन से रंग के कपड़े पहनें?

लाल, मरून, गुलाबी, पीला और हरा रंग शुभ माना जाता है। काले, सफेद और गहरे नीले रंग से बचना चाहिए।

बायना किसे दिया जाता है?

बायना (करवा, मिठाई, फल, वस्त्र और दक्षिणा) सास को पैर छूकर दिया जाता है। सास न हों तो जेठानी, ननद या किसी बड़ी सुहागिन महिला को दिया जा सकता है।

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