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देवउठनी एकादशी 2026: तिथि, पारण समय, देव उठाने की विधि, मंत्र, व्रत कथा और नियम

कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं, इसलिए इसे देवउठनी, देवोत्थान या प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं। इसी दिन चातुर्मास समाप्त होता है और विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे सभी शुभ कार्यों की फिर से शुरुआत होती है। इस पेज पर व्रत की सही तिथि, पारण का समय, गन्ने का मंडप बनाकर भगवान को जगाने की पारंपरिक विधि, मंत्र, कथा और तुलसी विवाह की पूरी जानकारी दी गई है।

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तारीख 20 नवंबर 2026, शुक्रवार
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हिंदू तिथि कार्तिक शुक्ल एकादशी
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शुभ मुहूर्त पारण 21 नवंबर दोपहर 01:10 से 03:18 (नई दिल्ली) | हरि वासर 12:08 PM तक
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पूज्य देवता भगवान विष्णु (शालिग्राम), माता तुलसी
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परिचय

देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु को चार महीने की नींद से जगाने का उत्सव मनाया जाता है। उत्तर भारत में इस दिन घर के आंगन में गेरू और खड़िया से भगवान के चरण बनाए जाते हैं, गन्ने का मंडप सजाया जाता है, नई फसल के फल चढ़ाए जाते हैं और शाम को थाली-घंटा बजाकर, गीत गाकर भगवान को जगाया जाता है।

नीचे व्रत की तैयारी, दिन की पूजा, शाम को देव उठाने की पारंपरिक विधि और अगले दिन पारण की पूरी जानकारी क्रम से दी गई है।

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देवउठनी एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) का महत्व

देवउठनी एकादशी 2026 कब है?

वर्ष 2026 में देवउठनी एकादशी का व्रत शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 को रखा जाएगा। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी और देव प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं।

  • एकादशी तिथि प्रारंभ: 20 नवंबर 2026, सुबह लगभग 07:15 बजे
  • एकादशी तिथि समाप्त: 21 नवंबर 2026, सुबह लगभग 06:31 बजे
  • हरि वासर समाप्त: 21 नवंबर 2026, दोपहर लगभग 12:08 बजे
  • पारण (व्रत खोलने) का समय: 21 नवंबर 2026, दोपहर लगभग 01:10 से 03:18 तक (नई दिल्ली)

पारण का समय हर शहर में अलग होता है — उदाहरण के लिए उज्जैन में पारण दोपहर लगभग 01:17 से 03:27 तक है। हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) में पारण नहीं किया जाता। सटीक समय के लिए अपने शहर का पंचांग देखें।

20 नवंबर या 21 नवंबर — व्रत किस दिन?

गृहस्थ (स्मार्त) परंपरा में देवउठनी एकादशी का व्रत 20 नवंबर, शुक्रवार को रखा जाएगा और पारण 21 नवंबर को होगा। वैष्णव (इस्कॉन आदि) परंपरा में एकादशी 21 नवंबर, शनिवार को मानी गई है और उनका पारण 22 नवंबर की सुबह होगा। आप जिस परंपरा या संप्रदाय को मानते हैं, उसी के अनुसार व्रत रखें।

देवउठनी एकादशी का महत्व

आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) को भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इन चार महीनों को चातुर्मास कहते हैं, जिसमें विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, यज्ञोपवीत जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु निद्रा से जागते हैं — इसीलिए यह दिन देवउठनी कहलाता है।

  • चातुर्मास का समापन: इस दिन से सभी शुभ और मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं और शादी-विवाह का सीज़न आरंभ होता है।
  • सबसे पुण्यदायी एकादशियों में से एक: पद्म पुराण के अनुसार प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करने से हज़ार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ के बराबर पुण्य मिलता है।
  • तुलसी विवाह: इसी दिन से (कई परिवारों में इसी शाम, और कई में अगले दिन द्वादशी को) भगवान शालिग्राम और माता तुलसी का विवाह कराया जाता है।
  • खाटू श्याम जन्मोत्सव: राजस्थान के खाटू धाम में देवउठनी एकादशी को बाबा श्याम का जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।
  • भीष्म पंचक: देवउठनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक के पाँच दिन "भीष्म पंचक" कहलाते हैं, जिनमें व्रत और दान का विशेष महत्व है।

देवउठनी एकादशी की व्रत कथा

भगवान विष्णु की योगनिद्रा की कथा

एक बार माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से कहा — "हे नाथ! आप दिन-रात जागते रहते हैं और जब सोते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्षों तक सो जाते हैं। उस समय सारा संसार अस्त-व्यस्त हो जाता है। आप नियम से विश्राम किया करें, तो मुझे भी आपकी सेवा से कुछ समय विश्राम मिल जाए।"

भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले — "देवी, तुमने ठीक कहा। मेरे जागने से सभी देवताओं और विशेषकर तुम्हें कष्ट होता है, तुम्हें मेरी सेवा से अवकाश नहीं मिलता। इसलिए अब से मैं हर वर्ष वर्षा ऋतु में चार महीने शयन किया करूंगा। मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और प्रलयकालीन महानिद्रा कहलाएगी। इस दौरान जो भक्त मेरी सेवा करेंगे और मेरे शयन और उत्थान का उत्सव मनाएंगे, उनके घर मैं तुम्हारे साथ निवास करूंगा।"

तभी से भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी को शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं, और भक्त इन दोनों दिनों पर व्रत रखकर भगवान की आराधना करते हैं।

राजा और एकादशी व्रत की कथा

एक राज्य में एकादशी के दिन प्रजा से लेकर पशुओं तक कोई भी अन्न नहीं खाता था। एक दिन दूसरे राज्य का एक व्यक्ति राजा के पास नौकरी मांगने आया। राजा ने शर्त रखी — "नौकरी मिलेगी, पर एकादशी के दिन अन्न नहीं मिलेगा।" वह व्यक्ति मान गया। एकादशी के दिन उसे फलाहार दिया गया, पर उसकी भूख नहीं मिटी। उसने राजा से विनती की तो राजा ने उसे आटा, दाल और चावल दे दिया।

वह व्यक्ति नदी किनारे गया, स्नान करके भोजन बनाया और भगवान को पुकारने लगा — "आओ भगवान, भोजन तैयार है।" उसकी सच्ची पुकार सुनकर भगवान विष्णु पीतांबर धारण किए प्रकट हुए और प्रेम से उसके साथ भोजन किया। यह क्रम हर एकादशी पर चलने लगा। एक दिन उसने राजा से दुगुना अन्न मांगा और कहा — "भगवान भी मेरे साथ खाते हैं।" राजा को विश्वास नहीं हुआ और वह छिपकर देखने गया।

उस दिन भगवान बहुत देर तक नहीं आए। तब उस व्यक्ति ने कहा — "भगवान, अगर आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण दे दूंगा।" जैसे ही वह कूदने लगा, भगवान प्रकट हुए, उसे रोका और उसके साथ भोजन किया, फिर उसे अपने साथ विमान में बैठाकर अपने धाम ले गए। यह देखकर राजा को समझ आया कि व्रत का असली फल शुद्ध मन और सच्ची भक्ति से मिलता है, केवल दिखावे से नहीं। उस दिन से राजा भी सच्चे मन से व्रत करने लगा और अंत में उसे भी स्वर्ग की प्राप्ति हुई।

तुलसी विवाह — देवउठनी एकादशी से जुड़ी परंपरा

पौराणिक कथा के अनुसार वृंदा नाम की पतिव्रता स्त्री के सतीत्व के कारण उसका पति, असुर जालंधर अजेय हो गया था। देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने छल से वृंदा का पतिव्रत भंग किया, जिससे जालंधर मारा गया। यह जानकर वृंदा ने विष्णु जी को पत्थर (शालिग्राम) होने का श्राप दिया और स्वयं सती हो गईं। जहाँ वृंदा भस्म हुईं, वहाँ तुलसी का पौधा उगा। भगवान विष्णु ने वरदान दिया कि शालिग्राम रूप में उनका विवाह तुलसी से होगा और तुलसी के बिना उनकी पूजा अधूरी मानी जाएगी।

तभी से कार्तिक शुक्ल एकादशी या द्वादशी (2026 में अधिकतर परिवारों में 21 नवंबर, शनिवार) को भगवान शालिग्राम और माता तुलसी का विवाह पूरे विधि-विधान से कराया जाता है। जिन दंपतियों की बेटी नहीं होती, वे तुलसी विवाह में कन्यादान करके कन्यादान का पुण्य प्राप्त करते हैं।

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पूजा सामग्री

भगवान विष्णु पूजा के लिए

  • लकड़ी की चौकी और पीला कपड़ा
  • भगवान विष्णु / शालिग्राम जी की मूर्ति या चित्र
  • गंगाजल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • पीला चंदन, रोली, हल्दी, अक्षत, मौली
  • पीले फूल, कमल, फूलमाला
  • तुलसी दल (एकादशी के दिन तुलसी न तोड़ें — एक दिन पहले तोड़कर रख लें)
  • पीले वस्त्र, जनेऊ
  • घी का दीपक, धूप-अगरबत्ती, कपूर
  • शंख और घंटी

देव उठाने के लिए (पारंपरिक)

  • गन्ने — 4 या 5 (मंडप बनाने के लिए)
  • गेरू और खड़िया या चावल का आटा (भगवान के चरण और चौक बनाने के लिए)
  • नई फसल के फल-सब्ज़ियाँ: सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर, आंवला, मूली, गाजर, सीताफल, अमरूद
  • गुड़, बताशे, मूंगफली
  • बांस की डलिया या परात (भगवान के चरणों और फलों को ढकने के लिए)
  • थाली और चम्मच या घंटा (भगवान को जगाने के लिए बजाने के लिए)
  • मिट्टी के 11 दीये

भोग और फलाहार

  • पंचामृत, पंजीरी, मिठाई
  • मखाने की खीर या साबूदाने की खीर
  • ऋतुफल
  • व्रत के लिए: फल, दूध, मेवे, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद

तुलसी विवाह के लिए (वैकल्पिक)

  • तुलसी का गमला और शालिग्राम जी
  • लाल चुनरी, सुहाग सामग्री (बिंदी, चूड़ी, सिंदूर, मेहंदी)
  • गन्ने का मंडप, मौली, फूलमाला
  • हल्दी, आंवला, सिंघाड़ा, बेर, मिठाई
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पूजा विधि

चरण 1: एक दिन पहले (दशमी, 19 नवंबर)

  • दशमी की शाम सूर्यास्त से पहले सात्विक भोजन कर लें। रात को चावल और भारी भोजन न खाएं।
  • एकादशी पर तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते, इसलिए पूजा के लिए तुलसी दल दशमी को ही तोड़कर रख लें।
  • घर और पूजा स्थान की सफाई कर लें।

चरण 2: एकादशी की सुबह — स्नान और संकल्प (20 नवंबर)

  • ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और पीले या साफ़ वस्त्र पहनें।
  • पूजा स्थान पर चौकी रखकर पीला कपड़ा बिछाएं और भगवान विष्णु या शालिग्राम जी को स्थापित करें।
  • हाथ में जल, अक्षत, फूल और तुलसी दल लेकर संकल्प लें — "मैं (अपना नाम) भगवान विष्णु की प्रसन्नता, पापों के नाश और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए आज देवउठनी एकादशी का व्रत रख रहा/रही हूँ। हे प्रभु, मेरा व्रत निर्विघ्न पूर्ण करें।"
  • व्रत अपनी क्षमता के अनुसार रखें — निर्जला, केवल जल वाला या फलाहारी।

चरण 3: दिन में भगवान विष्णु की पूजा

  • भगवान विष्णु को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं, फिर शुद्ध जल से।
  • पीले वस्त्र, जनेऊ, पीला चंदन, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें। भगवान विष्णु की पूजा तुलसी के बिना अधूरी है।
  • धूप-दीप दिखाएं और पंचामृत, पंजीरी व फलों का भोग लगाएं।
  • मंत्र जाप करें: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय (108 बार)
  • विष्णु सहस्रनाम या श्री हरि स्तोत्र का पाठ करें और देवउठनी एकादशी की कथा (ऊपर दी गई है) सुनें या पढ़ें।
  • "ॐ जय जगदीश हरे" आरती करें।

चरण 4: शाम को देव उठाना — चरण और गन्ने का मंडप (प्रदोष काल में)

  • शाम को घर के आंगन या पूजा स्थान पर गेरू और खड़िया (या चावल के आटे) से चौक बनाएं और उसके बीच में भगवान विष्णु के चरण (पैरों के निशान) बनाएं।
  • चौक के चारों कोनों पर 4 गन्ने खड़े करके उनके ऊपरी सिरे आपस में बांध दें — इससे गन्ने का मंडप बन जाता है।
  • भगवान के चरणों के पास नई फसल के फल रखें — सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर, आंवला, मूली, गाजर, सीताफल — साथ में गुड़, बताशे और मूंगफली।
  • चरणों और फलों को बांस की डलिया या परात से ढक दें।
  • मंडप के पास और पूरे घर में दीपक जलाएं।

चरण 5: भगवान को जगाना

  • परिवार के सभी सदस्य मंडप के पास इकट्ठा हों। घर की बड़ी महिला डलिया के पास बैठकर थाली बजाती हैं या शंख-घंटा बजाया जाता है।
  • भगवान को जगाने के लिए यह संस्कृत मंत्र बोलें:
    उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्॥
    उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव।

    (अर्थ: हे गोविंद! उठिए, हे जगत्पति! निद्रा का त्याग कीजिए। आपके सोने से यह संसार सोया रहता है और आपके जागने से सब कुछ चेतन हो जाता है। हे माधव, उठिए!)
  • साथ में पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं — "उठो देव, बैठो देव..." जैसे गीतों से भगवान को जगाया जाता है।
  • फिर डलिया हटाकर भगवान के चरणों की पूजा करें — रोली, अक्षत, फूल, तुलसी दल अर्पित करें और फल-मिठाई का भोग लगाएं।
  • भगवान विष्णु की आरती करें और परिवार के साथ मंडप की परिक्रमा करें।
  • भोग में चढ़ाए गए फल, गन्ना और मिठाई अगले दिन प्रसाद के रूप में बांटें।

चरण 6: रात्रि जागरण

  • संभव हो तो रात को जागकर भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन करें। एकादशी की रात जागरण का विशेष पुण्य बताया गया है।
  • जो लोग इसी शाम तुलसी विवाह करते हैं, वे गन्ने के मंडप में तुलसी जी और शालिग्राम जी का विवाह करा सकते हैं।

चरण 7: पारण — व्रत खोलना (21 नवंबर, दोपहर 01:10 से 03:18, दिल्ली)

  • द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और तुलसी दल अर्पित करें।
  • किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें।
  • हरि वासर (दोपहर लगभग 12:08 तक) में पारण न करें। पारण के समय में ही व्रत खोलें।
  • सबसे पहले तुलसी दल या भगवान का चरणामृत ग्रहण करें, फिर सात्विक भोजन से व्रत खोलें। पारण में चावल खाने की भी परंपरा है।
  • वैष्णव परंपरा मानने वाले 21 नवंबर को व्रत रखकर 22 नवंबर की सुबह पारण करें।
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व्रत के नियम

✅ देवउठनी एकादशी पर क्या करें

  • दशमी की रात से ही सात्विक रहें और एकादशी पर सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल अवश्य अर्पित करें (तुलसी दशमी को ही तोड़ लें)।
  • शाम को गन्ने का मंडप सजाकर भगवान को जगाने की रस्म करें।
  • विष्णु सहस्रनाम, "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र और भजन-कीर्तन करें।
  • घर में दीपक जलाएं, संभव हो तो रात्रि जागरण करें।
  • द्वादशी को सही पारण समय में ही व्रत खोलें।
  • अन्न, वस्त्र और फलों का दान करें।
  • तुलसी विवाह में भाग लें या स्वयं कराएं।

❌ देवउठनी एकादशी पर क्या न करें

  • एकादशी के दिन चावल और चावल से बनी चीज़ें न खाएं — यह सभी एकादशियों का सबसे प्रमुख नियम है।
  • एकादशी पर तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
  • मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज़, मसूर दाल और तामसिक भोजन से दूर रहें।
  • दिन में न सोएं (बीमार, बुज़ुर्ग और बच्चों को छूट है)।
  • किसी की निंदा, झूठ, क्रोध और झगड़े से बचें।
  • हरि वासर में या पारण का समय निकल जाने के बाद व्रत न खोलें।
  • बाल और नाखून न काटें, और दाढ़ी न बनाएं।
  • बीमार, गर्भवती महिलाएं और दवा लेने वाले लोग निर्जला व्रत न रखें — फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रखें।
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देवउठनी एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) — व्रत कथा

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देवउठनी एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) — आरती

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Hinglish

Dev Uthani Ekadashi 2026 kab hai? Shukravar, 20 November 2026. Ekadashi tithi 20 November subah 07:15 se 21 November subah 06:31 tak. Paaran 21 November dopahar 01:10 se 03:18 tak (New Delhi). Vaishnav (ISKCON) parampara mein ekadashi 21 November ko hai.

Mahatva: Is din Bhagwan Vishnu chaar mahine ki yognidra se jaagte hain, chaturmas khatam hota hai aur shaadi-byaah jaise shubh kaam phir se shuru hote hain.

Din ki puja: Snaan karke sankalp lein, Vishnu ji ko panchamrit snaan, peele phool, chandan aur tulsi chadhayein, "Om Namo Bhagavate Vasudevaya" ka jaap karein, katha sunein aur aarti karein.

Dev uthana (shaam ko): Aangan mein geru-khadiya se Bhagwan ke charan banayein, chaar ganne khade karke mandap banayein, singhara, shakarkand, ber, aamla jaise phal rakhkar daliya se dhakein. Phir thaali ya ghanta bajakar "Uttishtha Govinda tyaj nidram jagatpate" mantra bolkar Bhagwan ko jagayein, puja aur aarti karein.

Dhyan rakhein: Ekadashi par chawal na khayein, tulsi na todein aur Hari vasar mein paaran na karein.

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

देवउठनी एकादशी 2026 कब है?

गृहस्थ (स्मार्त) परंपरा में देवउठनी एकादशी का व्रत शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 को रखा जाएगा। वैष्णव परंपरा में यह 21 नवंबर को है।

एकादशी तिथि कब से कब तक है?

एकादशी तिथि 20 नवंबर 2026 को सुबह लगभग 07:15 बजे से 21 नवंबर को सुबह लगभग 06:31 बजे तक रहेगी।

देवउठनी एकादशी का पारण कब करें?

नई दिल्ली के अनुसार पारण 21 नवंबर को दोपहर लगभग 01:10 से 03:18 तक करें। हरि वासर दोपहर लगभग 12:08 बजे समाप्त होगा, उससे पहले पारण न करें।

देवउठनी एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी क्यों कहते हैं?

"प्रबोधन" का अर्थ है जागना। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं, इसलिए इसे प्रबोधिनी या देवउठनी एकादशी कहते हैं।

चातुर्मास कब समाप्त होगा?

चातुर्मास देवउठनी एकादशी को समाप्त होता है। इसके बाद विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे सभी मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं।

देव उठाने के लिए कौन सा मंत्र बोलें?

उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्॥ उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव।

देवउठनी एकादशी पर गन्ने का मंडप क्यों बनाते हैं?

गन्ना नई फसल और मिठास का प्रतीक है। गन्ने के मंडप के नीचे भगवान विष्णु के चरण बनाकर नई फसल के फल चढ़ाए जाते हैं और भगवान को जगाया जाता है। इसी मंडप में तुलसी विवाह भी कराया जाता है।

तुलसी विवाह 2026 कब है?

अधिकतर परिवारों में तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल द्वादशी, शनिवार 21 नवंबर 2026 को होगा। कई परिवारों में यह देवउठनी एकादशी की शाम को ही कर दिया जाता है।

एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते?

शास्त्रों के अनुसार एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित है। मान्यता है कि इस दिन अन्न, विशेषकर चावल में पाप का वास होता है, इसलिए एकादशी व्रत में चावल नहीं खाए जाते।

एकादशी पर तुलसी क्यों नहीं तोड़ते?

मान्यता है कि एकादशी के दिन माता तुलसी भी भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, इसलिए इस दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते। पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पहले तोड़ लें।

देवउठनी एकादशी पर खाटू श्याम जन्मोत्सव क्यों मनाया जाता है?

राजस्थान के खाटू धाम में कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) को बाबा श्याम का जन्मोत्सव मनाया जाता है।

देवउठनी एकादशी व्रत में क्या खा सकते हैं?

फल, दूध, दही, मेवे, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे की पूरी, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक का प्रयोग कर सकते हैं। चावल, गेहूँ, दालें और साधारण नमक न खाएं।

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