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गोवर्धन पूजा 2026: पूजा मुहूर्त, गोवर्धन बनाने की विधि, अन्नकूट-56 भोग, परिक्रमा और कथा

दिवाली के बाद कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाई जाने वाली गोवर्धन पूजा भगवान श्रीकृष्ण, गिरिराज गोवर्धन पर्वत और गौ माता को समर्पित है। इसी दिन श्रीकृष्ण ने इंद्र का अहंकार तोड़ने के लिए अपनी कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी। इस पेज पर गोबर से गोवर्धन जी बनाने से लेकर नाभि में दीपक रखने, परिक्रमा, गौ पूजा और अन्नकूट भोग तक की पूरी विधि क्रम से दी गई है।

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तारीख 10 नवंबर 2026, मंगलवार
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हिंदू तिथि कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा
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शुभ मुहूर्त प्रातःकाल सुबह 06:40 से 08:50 तक (नई दिल्ली) | प्रतिपदा दोपहर 02:00 तक
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पूज्य देवता भगवान श्रीकृष्ण, गिरिराज गोवर्धन, गौ माता
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परिचय

गोवर्धन पूजा दीपोत्सव का चौथा दिन है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, गिरिराज गोवर्धन, गौ माता और वरुण, इंद्र, अग्नि आदि देवताओं की पूजा की जाती है। घर के आंगन में गाय के गोबर से लेटे हुए पुरुष के आकार में गोवर्धन जी बनाए जाते हैं, उनकी नाभि में दीपक रखा जाता है और परिवार के सभी लोग उनकी परिक्रमा करते हैं।

नीचे गोवर्धन बनाने से लेकर पूजा, परिक्रमा, गौ पूजन और अन्नकूट भोग तक की पूरी विधि क्रम से दी गई है।

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गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) का महत्व

गोवर्धन पूजा 2026 कब है?

वर्ष 2026 में गोवर्धन पूजा और अन्नकूट मंगलवार, 10 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को आता है।

  • प्रतिपदा तिथि प्रारंभ: 9 नवंबर 2026, दोपहर 12:31 बजे
  • प्रतिपदा तिथि समाप्त: 10 नवंबर 2026, दोपहर 02:00 बजे
  • गोवर्धन पूजा प्रातःकाल मुहूर्त: सुबह 06:40 से 08:50 तक (नई दिल्ली)

मुहूर्त दिल्ली पंचांग के अनुसार है; अन्य शहरों में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है। प्रतिपदा तिथि 10 नवंबर को दोपहर 02:00 बजे समाप्त हो जाएगी, इसलिए गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का भोग सुबह के मुहूर्त में या कम से कम दोपहर 2 बजे से पहले कर लेना सबसे उत्तम है।

दिवाली के अगले दिन नहीं, 10 नवंबर को क्यों?

सामान्यतः गोवर्धन पूजा दिवाली के अगले दिन होती है, लेकिन 2026 में बीच में एक दिन का अंतर है। दिवाली (8 नवंबर) की अमावस्या तिथि 9 नवंबर को दोपहर 12:31 बजे तक रहेगी और उसके बाद प्रतिपदा शुरू होगी। गोवर्धन पूजा सुबह के समय (उदया तिथि में) प्रतिपदा होने पर की जाती है। 9 नवंबर की सुबह अमावस्या होगी, जबकि 10 नवंबर को सूर्योदय के समय प्रतिपदा रहेगी। इसलिए गोवर्धन पूजा 10 नवंबर, मंगलवार को है। कुछ कैलेंडरों में 9 नवंबर भी लिखा मिल सकता है — अपने परिवार या मंदिर के पंचांग से पुष्टि कर लें।

गोवर्धन पूजा का महत्व

गोवर्धन पूजा प्रकृति, अन्न और गौ माता के प्रति कृतज्ञता का पर्व है। भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को समझाया था कि हमें वर्षा देने वाले इंद्र की नहीं, बल्कि उस गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए जो हमारी गायों को घास, हमें फल-फूल और जल देता है। यह पर्व सिखाता है कि अहंकार चाहे देवराज का ही क्यों न हो, वह टूटता ज़रूर है, और भगवान अपने भक्तों की हर संकट में रक्षा करते हैं।

इस दिन घर-घर में गाय के गोबर से गोवर्धन जी बनाकर उनकी पूजा की जाती है, गायों को सजाकर उनकी आरती की जाती है और भगवान को नए अन्न से बने अनेक व्यंजनों का भोग लगाया जाता है, जिसे अन्नकूट कहते हैं।

गोवर्धन पूजा की कथा — श्रीकृष्ण ने उठाया गोवर्धन पर्वत

द्वापर युग में ब्रज के लोग हर साल वर्षा के देवता इंद्र की पूजा करते थे और उन्हें तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाते थे। एक बार बालक कृष्ण ने देखा कि पूरा ब्रज बड़े उत्साह से पकवान बना रहा है। उन्होंने माता यशोदा और नंद बाबा से पूछा — "यह तैयारी किसकी पूजा के लिए हो रही है?"

नंद बाबा ने बताया — "हम देवराज इंद्र की पूजा करते हैं, क्योंकि वे वर्षा करते हैं, जिससे हमारी खेती होती है और गायों को चारा मिलता है।" तब कृष्ण बोले — "बाबा, वर्षा करना तो इंद्र का कर्तव्य है। असल में तो गोवर्धन पर्वत हमारी गायों को चारा देता है, हमें फल-फूल, लकड़ी और जल देता है और बादलों को रोककर वर्षा कराता है। हमें तो गोवर्धन पर्वत और अपनी गायों की पूजा करनी चाहिए।"

ब्रजवासियों को कृष्ण की बात सही लगी और उन्होंने इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा की। सारे पकवान गिरिराज जी को अर्पित किए गए। भगवान ने स्वयं गिरिराज के रूप में प्रकट होकर वह भोग स्वीकार किया।

यह देखकर इंद्र क्रोधित हो गए। अपने अपमान का बदला लेने के लिए उन्होंने मेघों को आदेश दिया कि ब्रज को डुबो दो। मूसलाधार वर्षा होने लगी, आंधी-तूफान से पूरा ब्रज कांप उठा। भयभीत ब्रजवासी अपनी गायों और बच्चों को लेकर कृष्ण की शरण में पहुंचे।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बाएं हाथ की कनिष्ठा (सबसे छोटी) उंगली पर पूरा गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी ब्रजवासियों और गायों को उसके नीचे शरण दी। सुदर्शन चक्र ने वर्षा के वेग को रोका और शेषनाग ने पानी को पर्वत के नीचे आने से रोका। सात दिन और सात रात तक लगातार वर्षा होती रही, पर कृष्ण पर्वत उठाए खड़े रहे और ब्रज का एक भी जीव पीड़ित नहीं हुआ।

अंत में इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ। ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। इंद्र ने वर्षा रोक दी और भगवान से क्षमा मांगी। कामधेनु गाय ने अपने दूध से श्रीकृष्ण का अभिषेक किया और इंद्र ने उन्हें "गोविंद" नाम दिया। तभी से कृष्ण को गिरिधारी और गोवर्धनधारी कहा जाता है, और हर वर्ष इस दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का उत्सव मनाया जाता है।

अन्नकूट और 56 भोग का रहस्य

"अन्नकूट" का अर्थ है अन्न का पहाड़। इस दिन नई फसल के अन्न और सब्ज़ियों से अनेक व्यंजन बनाकर भगवान के सामने पर्वत के आकार में सजाए जाते हैं।

56 भोग (छप्पन भोग) क्यों? मान्यता है कि बालक कृष्ण माता यशोदा के हाथ से दिन में आठ बार (आठों प्रहर) भोजन करते थे। गोवर्धन पर्वत उठाए रहने के कारण उन्होंने सात दिनों तक कुछ नहीं खाया। जब वर्षा रुकी, तो ब्रजवासियों और माता यशोदा ने सात दिन के आठों प्रहर का भोजन (7 × 8 = 56) एक साथ बनाकर उन्हें खिलाया। तभी से भगवान को 56 भोग लगाने की परंपरा है।

घर पर 56 व्यंजन बनाना ज़रूरी नहीं है। श्रद्धा के अनुसार जितने व्यंजन बना सकें, उतने बनाएं। उत्तर भारत में अन्नकूट की मिक्स सब्ज़ी, कढ़ी-चावल, बाजरे की खिचड़ी, पूरी और खीर विशेष रूप से बनाई जाती है।

गोवर्धन पर्वत परिक्रमा (मथुरा)

मथुरा ज़िले में स्थित गिरिराज गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर की होती है। गोवर्धन पूजा के दिन यहाँ लाखों श्रद्धालु परिक्रमा करने आते हैं। परिक्रमा में मानसी गंगा, दानघाटी, राधा कुंड, श्याम कुंड, कुसुम सरोवर, जतीपुरा मुखारविंद और पूंछरी का लौठा जैसे प्रमुख स्थल आते हैं।

  • परिक्रमा सूर्योदय से पहले शुरू करें, क्योंकि इस दिन बहुत भीड़ होती है।
  • संभव हो तो नंगे पैर परिक्रमा करें और गिरिराज जी को हमेशा अपने दाईं ओर रखें।
  • पर्वत पर चढ़ा नहीं जाता, केवल उसकी परिक्रमा की जाती है।
  • पानी साथ रखें। पूरी परिक्रमा न कर सकें तो आंशिक परिक्रमा या मुखारविंद के दर्शन करें।

देश में गोवर्धन पूजा की परंपराएं

  • ब्रज (मथुरा-वृंदावन-नाथद्वारा): मंदिरों में भव्य अन्नकूट उत्सव, गिरिराज जी का दूध से अभिषेक और छप्पन भोग। नाथद्वारा (राजस्थान) में श्रीनाथजी का अन्नकूट विश्व प्रसिद्ध है।
  • उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश: घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन बनाकर पूजा और परिक्रमा।
  • गुजरात: कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से गुजराती नववर्ष (बेस्तु वरस) की शुरुआत मानी जाती है।
  • महाराष्ट्र और दक्षिण भारत: इस तिथि को बलि प्रतिपदा (पाडवा) के रूप में भी मनाया जाता है, जिसमें राजा बलि की पूजा की जाती है।
  • कुछ क्षेत्रों में: इसी दिन शिल्प और औज़ारों के देवता भगवान विश्वकर्मा की पूजा भी की जाती है।
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पूजा सामग्री

गोवर्धन जी बनाने के लिए

  • गाय का ताज़ा गोबर — पर्याप्त मात्रा में (आंगन या पूजा स्थान के आकार के अनुसार)
  • लकड़ी का पटा या साफ़ ज़मीन (गोबर से लीपने के लिए)
  • रुई (कपास) — गोवर्धन जी को सजाने के लिए
  • फूल, फूलों की पंखुड़ियाँ, दूर्वा, पेड़ों की छोटी टहनियाँ (वृक्ष के प्रतीक)
  • खील, बताशे, चावल
  • मिट्टी का छोटा दीपक या दीया (नाभि में रखने के लिए)
  • गोबर या मिट्टी से बनी छोटी गायें, बछड़े, ग्वाले और श्रीकृष्ण (वैकल्पिक)

पूजन सामग्री

  • रोली (कुमकुम), हल्दी, चंदन, अक्षत, मौली
  • घी और तेल के दीपक, धूप-अगरबत्ती, कपूर
  • फूल, फूलमाला (गेंदा)
  • दूध, दही, शहद, घी, गंगाजल (नाभि में भरने के लिए)
  • तुलसी दल (श्रीकृष्ण के भोग के लिए)
  • पान के पत्ते, सुपारी, लौंग, इलायची
  • जल से भरा लोटा (परिक्रमा के लिए)
  • जौ (परिक्रमा में बोने के लिए — परंपरा अनुसार)
  • श्रीकृष्ण / गिरिराज जी का चित्र या मूर्ति
  • दक्षिणा के लिए सिक्के

अन्नकूट भोग के लिए (श्रद्धा अनुसार)

  • अन्नकूट की सब्ज़ी: मौसम की सभी सब्ज़ियाँ मिलाकर — आलू, गोभी, मटर, गाजर, शकरकंद, बैंगन, कद्दू, मूली, पालक, सेम, अरबी
  • कढ़ी और चावल
  • बाजरे की खिचड़ी
  • पूरी, कचौरी
  • खीर, हलवा, लड्डू, पेड़े, मालपुए, गुलाब जामुन
  • माखन-मिश्री, दही, रबड़ी (श्रीकृष्ण को अति प्रिय)
  • पंजीरी, मठरी, नमकीन
  • मौसमी फल, गन्ना, सिंघाड़ा, सूखे मेवे
  • पान का बीड़ा

गौ पूजा के लिए

  • गाय और बछड़े को नहलाने के लिए पानी
  • रोली, हल्दी, मेहंदी (सींग और शरीर पर लगाने के लिए)
  • फूलों की माला, घंटी, रंगीन कपड़ा (झूल)
  • गुड़, हरा चारा, गेहूँ का आटा या रोटी (गौ ग्रास के लिए)
  • दीपक और आरती की थाली
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पूजा विधि

चरण 1: सुबह की तैयारी

  • सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और साफ़ वस्त्र पहनें। शरीर पर तेल लगाकर स्नान करने की भी परंपरा है।
  • घर के आंगन, मुख्य द्वार या पूजा स्थान को अच्छी तरह साफ़ करें और गाय के गोबर से लीप दें (शहरों में लकड़ी का पटा या साफ़ फर्श पर बड़ा कागज़/कपड़ा बिछा सकते हैं)।
  • रसोई में स्नान के बाद पवित्रता के साथ अन्नकूट का भोग बनाना शुरू करें।

चरण 2: गोबर से गोवर्धन जी बनाना

  • गाय के गोबर से लेटे हुए पुरुष के आकार में गोवर्धन जी (गिरिराज जी) की आकृति बनाएं — सिर, दोनों हाथ, शरीर और दोनों पैर। कुछ परिवारों में गोवर्धन पर्वत का आकार (पहाड़) भी बनाया जाता है।
  • आकृति के बीच में नाभि के स्थान पर एक गड्ढा बनाएं या मिट्टी का छोटा दीया/कटोरी रख दें।
  • गोवर्धन जी के चारों ओर गोबर से छोटी-छोटी गायें, बछड़े, ग्वाल-बाल, श्रीकृष्ण और पेड़ बनाएं। चाहें तो मिट्टी के खिलौने रख सकते हैं।
  • गोवर्धन जी को रुई, फूलों, दूर्वा और छोटी टहनियों से सजाएं। आँखों के स्थान पर कौड़ी या चावल के दाने लगा सकते हैं।
  • गोवर्धन जी के ऊपर खील और बताशे बिखेरें।

चरण 3: संकल्प (प्रातःकाल मुहूर्त — सुबह 06:40 से 08:50)

  • परिवार के सभी सदस्य गोवर्धन जी के सामने बैठें। पूजा करने वाला पूर्व या उत्तर की ओर मुख करे।
  • हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें — "मैं (अपना नाम) अपने परिवार की सुख-समृद्धि, अन्न-धन की वृद्धि, गौ वंश की रक्षा और भगवान श्रीकृष्ण की कृपा के लिए आज गोवर्धन पूजा और अन्नकूट कर रहा/रही हूँ।"
  • सबसे पहले श्री गणेश का स्मरण करें — ॐ गं गणपतये नमः

चरण 4: गोवर्धन जी की पूजा

  • गोवर्धन जी पर गंगाजल छिड़ककर उन्हें शुद्ध करें।
  • रोली, चंदन और हल्दी से तिलक करें, अक्षत चढ़ाएं।
  • फूल, फूलमाला और तुलसी दल अर्पित करें। मौली (कलावा) चढ़ाएं।
  • गोवर्धन जी की नाभि में दूध, दही, शहद, गंगाजल और बताशे डालें और वहाँ एक घी का दीपक जलाएं।
  • धूप-दीप दिखाएं और हाथ जोड़कर यह प्रार्थना मंत्र बोलें:
    गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक। विष्णुबाहु कृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव॥
    (अर्थ: हे पृथ्वी को धारण करने वाले, गोकुल के रक्षक गोवर्धन! भगवान विष्णु की भुजा पर उठाए गए आप हमें करोड़ों गायें प्रदान करें।)
  • भगवान श्रीकृष्ण का मंत्र जपें: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या श्री गिरिराज धरण की जय।

चरण 5: अन्नकूट भोग

  • बनाए गए सभी व्यंजनों को थालियों और पत्तलों में सजाकर गोवर्धन जी और भगवान श्रीकृष्ण के सामने पर्वत के आकार में रखें।
  • हर व्यंजन पर एक तुलसी दल रखें — श्रीकृष्ण तुलसी के बिना भोग स्वीकार नहीं करते।
  • भोग के बीच में चावल या सब्ज़ी का एक ऊंचा ढेर बनाएं, जो गोवर्धन पर्वत का प्रतीक हो।
  • भगवान से प्रार्थना करें कि वे भोग स्वीकार करें, फिर कुछ देर के लिए पर्दा कर दें या आंखें बंद करके प्रणाम करें।

चरण 6: गोवर्धन जी की परिक्रमा

  • पूजा और भोग के बाद परिवार के सभी सदस्य गोवर्धन जी की 7 बार परिक्रमा करें (कई परिवारों में 5 या 11 परिक्रमा की परंपरा है)।
  • परिक्रमा करते समय एक व्यक्ति हाथ में जल का लोटा लेकर धीरे-धीरे जल गिराता हुआ चले और दूसरा व्यक्ति पीछे-पीछे जौ बोता हुआ चले (यह परंपरा क्षेत्र अनुसार अलग होती है)।
  • परिक्रमा करते हुए "गिरिराज धरण की जय", "गोवर्धन महाराज की जय" या "श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे" का जयकारा लगाएं।
  • परिक्रमा हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में करें, ताकि गोवर्धन जी आपके दाईं ओर रहें।

चरण 7: गौ पूजा

  • घर में या पास में गाय हो तो उसे और उसके बछड़े को नहलाएं।
  • गाय के सींगों पर रंग या मेहंदी लगाएं, माथे पर रोली का तिलक करें, गले में फूलों की माला और घंटी बांधें, पीठ पर रंगीन झूल डालें।
  • गाय की आरती उतारें और यह मंत्र बोलें:
    लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता। घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु॥
  • गाय को गुड़, हरा चारा, रोटी और अन्नकूट का भोग खिलाएं। गाय की परिक्रमा करके उसके पैर छूकर आशीर्वाद लें।
  • घर में गाय न हो तो किसी गौशाला में जाकर गायों की सेवा करें, चारा या गुड़ दान करें।

चरण 8: आरती और प्रसाद

  • घी के दीपक और कपूर से गोवर्धन जी की आरती ("श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रहेओ") और श्रीकृष्ण की आरती ("आरती कुंजबिहारी की") करें।
  • आरती के बाद अन्नकूट का प्रसाद पहले परिवार में, फिर पड़ोसियों, रिश्तेदारों और ज़रूरतमंदों में बांटें।
  • कई जगह मंदिरों में सामूहिक अन्नकूट होता है — वहाँ भी प्रसाद ग्रहण करें या सेवा करें।

चरण 9: अगले दिन

  • गोवर्धन जी के गोबर को फेंकें नहीं। सूखने के बाद इसके उपले बनाकर होलिका दहन या हवन में प्रयोग करने की परंपरा है, या इसे खेत/बगीचे की मिट्टी में मिला दें।
  • पूजा स्थान को साफ़ करके गंगाजल छिड़कें।
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व्रत के नियम

✅ गोवर्धन पूजा पर क्या करें

  • पूजा और अन्नकूट का भोग प्रातःकाल मुहूर्त (सुबह 06:40 से 08:50) में या दोपहर 2 बजे प्रतिपदा समाप्त होने से पहले कर लें।
  • गोवर्धन जी गाय के शुद्ध और ताज़ा गोबर से ही बनाएं।
  • हर भोग पर तुलसी दल अवश्य रखें।
  • परिवार के सभी सदस्य मिलकर गोवर्धन जी की परिक्रमा करें।
  • गायों की सेवा करें — उन्हें गुड़, चारा और रोटी खिलाएं।
  • अन्नकूट का प्रसाद अधिक से अधिक लोगों में बांटें, खासकर ज़रूरतमंदों में।
  • संभव हो तो मंदिर में अन्नकूट उत्सव में सेवा करें।
  • प्रकृति, अन्न और जल के प्रति आभार व्यक्त करें — भोजन बर्बाद न करें।

❌ गोवर्धन पूजा पर क्या न करें

  • गोवर्धन पूजा बंद कमरे में न करें — यह पूजा आंगन, छत या खुले स्थान पर करना उत्तम है।
  • गोवर्धन जी या गाय को पैर न लगाएं।
  • भोग बनाते समय और पूजा के दिन मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज़ का प्रयोग न करें।
  • परिक्रमा अधूरी न छोड़ें और परिक्रमा उल्टी दिशा में न करें।
  • किसी जीव, विशेषकर गाय को कष्ट न दें।
  • भोग लगाने से पहले स्वयं भोजन न करें।
  • घर में कलह और अपशब्दों से बचें।
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गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) — आरती

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गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) — चालीसा

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Hinglish

Govardhan Puja 2026 kab hai? Mangalvar, 10 November 2026. Pratipada tithi 9 November dopahar 12:31 se 10 November dopahar 02:00 tak. Pratahkal puja muhurat subah 06:40 se 08:50 tak (New Delhi).

Diwali ke agle din kyon nahi? 9 November ki subah Amavasya rahegi aur Pratipada dopahar 12:31 se shuru hogi. Govardhan puja subah ki Pratipada mein hoti hai, isliye 10 November ko hai.

Govardhan ji kaise banayein: Aangan mein gaay ke gobar se lete hue purush ke aakaar mein Govardhan ji banayein. Naabhi ki jagah ek diya ya katori rakhein. Chaaron taraf gobar se gaayein, bachhde aur gwal-baal banayein aur rui, phool aur dhoorva se sajayein.

Puja vidhi: Gangajal chhidkein, roli-chandan ka tilak karein, phool aur tulsi chadhayein. Naabhi mein doodh, dahi, shahad aur batashe daalkar ghee ka diya jalayein. Annakut ka bhog lagayein aur parivar ke saath 7 parikrama karein.

Annakut / 56 bhog: Annakut ki mix sabzi, kadhi-chawal, bajre ki khichdi, puri, kheer aur mithaiyan banakar har bhog par tulsi rakhein. 56 bhog isliye kyunki Krishna ne 7 din tak parvat uthaye rakha aur roz 8 baar bhojan karte the (7 × 8 = 56).

Gau puja: Gaay ko nehlakar sajayein, tilak karein, aarti utaarein aur gud, chaara aur roti khilayein.

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गोवर्धन पूजा 2026 कब है?

गोवर्धन पूजा और अन्नकूट 2026 में मंगलवार, 10 नवंबर को मनाया जाएगा।

गोवर्धन पूजा 9 नवंबर को है या 10 नवंबर को?

गोवर्धन पूजा 10 नवंबर को है। 9 नवंबर की सुबह अमावस्या रहेगी और प्रतिपदा दोपहर 12:31 बजे शुरू होगी, जबकि 10 नवंबर को सूर्योदय के समय प्रतिपदा होगी।

गोवर्धन पूजा 2026 का मुहूर्त क्या है?

नई दिल्ली के अनुसार गोवर्धन पूजा का प्रातःकाल मुहूर्त 10 नवंबर को सुबह 06:40 से 08:50 तक है।

प्रतिपदा तिथि कब से कब तक है?

प्रतिपदा तिथि 9 नवंबर 2026 को दोपहर 12:31 बजे से 10 नवंबर को दोपहर 02:00 बजे तक रहेगी।

गोवर्धन पूजा में गोबर से क्या बनाते हैं?

गाय के गोबर से लेटे हुए पुरुष के आकार में गोवर्धन जी (गिरिराज जी) बनाए जाते हैं, उनकी नाभि में दीपक रखा जाता है और चारों ओर गोबर से गायें, बछड़े और ग्वाल-बाल बनाए जाते हैं।

गोवर्धन पूजा पर 56 भोग क्यों लगाते हैं?

श्रीकृष्ण ने सात दिन तक गोवर्धन पर्वत उठाए रखा और कुछ नहीं खाया। वे दिन में आठ बार भोजन करते थे, इसलिए सात दिन के आठों प्रहर का भोजन (7 × 8 = 56) एक साथ बनाकर उन्हें खिलाया गया। तभी से 56 भोग की परंपरा है।

अन्नकूट का क्या अर्थ है?

अन्नकूट का अर्थ है "अन्न का पहाड़"। इस दिन नई फसल के अन्न और सब्ज़ियों से अनेक व्यंजन बनाकर भगवान के सामने पर्वत के आकार में सजाए जाते हैं।

गोवर्धन जी की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए?

परंपरा के अनुसार गोवर्धन जी की 7 परिक्रमा की जाती है। कुछ परिवारों में 5 या 11 परिक्रमा की परंपरा भी है।

गोवर्धन पूजा पर किसकी पूजा होती है?

इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, गिरिराज गोवर्धन पर्वत और गौ माता की पूजा की जाती है।

मथुरा में गोवर्धन परिक्रमा कितने किलोमीटर की है?

मथुरा में गिरिराज गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर की होती है।

गोवर्धन पूजा का मंत्र क्या है?

गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक। विष्णुबाहु कृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव॥

गोवर्धन पूजा के बाद गोबर का क्या करें?

गोवर्धन जी के गोबर को फेंकना नहीं चाहिए। सूखने के बाद इसके उपले बनाकर होलिका दहन या हवन में प्रयोग किए जाते हैं, या इसे खेत/बगीचे की मिट्टी में मिला दिया जाता है।

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