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शरद पूर्णिमा 2026: चंद्रोदय समय, खीर रखने का सही समय, कोजागरी लक्ष्मी पूजा विधि और कथा

शरद पूर्णिमा वर्ष की एकमात्र रात है जब चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से पूर्ण होकर पृथ्वी पर अमृत बरसाता है। इसी रात माँ लक्ष्मी "को जागर्ति?" — "कौन जाग रहा है?" — पूछते हुए पृथ्वी पर विचरण करती हैं और भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था। इस पेज पर चाँदनी में खीर रखने की सही विधि, कोजागरी लक्ष्मी पूजा, चंद्र अर्घ्य, व्रत कथा और इस रात से जुड़ी हर परंपरा विस्तार से दी गई है।

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तारीख 25 अक्टूबर 2026, रविवार
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हिंदू तिथि आश्विन शुक्ल पूर्णिमा
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शुभ मुहूर्त चंद्रोदय शाम लगभग 05:00 | खीर रात 8 बजे के बाद | कोजागरी निशीथ पूजा रात 11:41 से 12:29 (नई दिल्ली)
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पूज्य देवता माँ लक्ष्मी, भगवान विष्णु, चंद्र देव, श्रीकृष्ण
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परिचय

शरद पूर्णिमा की रात को "अमृत की रात" कहा जाता है। इस दिन माँ लक्ष्मी, भगवान विष्णु, चंद्र देव और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। दिन में व्रत रखकर शाम को चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है, चाँदनी में खीर रखी जाती है और रात को जागकर माँ लक्ष्मी की आराधना की जाती है।

नीचे दी गई विधि में खीर बनाने से लेकर उसे चाँदनी में रखने, कोजागरी लक्ष्मी पूजा और अगली सुबह प्रसाद ग्रहण करने तक की हर बात क्रम से बताई गई है।

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शरद पूर्णिमा (कोजागरी पूर्णिमा) का महत्व

शरद पूर्णिमा 2026 कब है?

वर्ष 2026 में शरद पूर्णिमा रविवार, 25 अक्टूबर 2026 की रात को मनाई जाएगी। यह आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है, जो शारदीय नवरात्रि और दशहरे के बाद आती है। इसे कोजागरी पूर्णिमा, कौमुदी व्रत, कुमार पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 25 अक्टूबर 2026, सुबह 11:55 बजे
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 26 अक्टूबर 2026, सुबह 09:41 बजे
  • चंद्रोदय (नई दिल्ली): 25 अक्टूबर, शाम लगभग 05:00 बजे
  • कोजागरी लक्ष्मी पूजा — निशीथ काल मुहूर्त: रात लगभग 11:41 से 12:29 तक (नई दिल्ली)
  • खीर रखने का उत्तम समय: रात 8 बजे के बाद, जब चाँद अच्छी तरह ऊपर आ जाए और आसमान पूरी तरह अंधेरा हो
  • खीर का प्रसाद ग्रहण करें: 26 अक्टूबर की सुबह

शरद पूर्णिमा उसी रात मनाई जाती है जब चंद्रोदय के समय पूर्णिमा तिथि हो — 2026 में यह संयोग 25 अक्टूबर की रात बन रहा है। कुछ पंचांगों में उदया तिथि के अनुसार पूर्णिमा का स्नान-दान 26 अक्टूबर की सुबह बताया गया है। चंद्रोदय और निशीथ काल का समय हर शहर में अलग होता है — उदाहरण के लिए कोलकाता में चंद्रोदय लगभग 04:21 PM और निशीथ काल लगभग 10:56 से 11:44 PM है।

शरद पूर्णिमा का महत्व

शास्त्रों के अनुसार पूरे वर्ष में केवल शरद पूर्णिमा की रात को ही चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से संपूर्ण होता है। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा की किरणों में अमृत का अंश होता है, जो औषधीय गुणों से भरपूर होता है। इसीलिए इस रात खुले आसमान के नीचे चाँदनी में खीर रखने और सुबह उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा है।

इस रात को "कोजागरी" कहा जाता है। "को जागर्ति" का अर्थ है "कौन जाग रहा है?"। मान्यता है कि माँ लक्ष्मी इस रात उल्लू पर सवार होकर पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और देखती हैं कि कौन जागकर उनकी आराधना कर रहा है। जो भक्त रात भर जागकर भजन-कीर्तन और लक्ष्मी पूजा करता है, उसके घर में धन-धान्य की कभी कमी नहीं होती।

शरद पूर्णिमा से कार्तिक मास के स्नान की शुरुआत भी होती है, और यह वर्षा ऋतु के समाप्त होने तथा शरद ऋतु के आगमन का प्रतीक है।

इसी दिन मनाए जाते हैं ये पर्व

  • महर्षि वाल्मीकि जयंती: रामायण के रचयिता आदिकवि महर्षि वाल्मीकि का जन्म आश्विन पूर्णिमा को माना जाता है।
  • कोजागरी लक्ष्मी पूजा (बंगाल, असम, ओडिशा): दुर्गा पूजा के बाद आने वाली इस पूर्णिमा पर घर-घर माँ लक्ष्मी की पूजा होती है, जिसे "लोक्खी पूजा" कहते हैं।
  • कुमार पूर्णिमा (ओडिशा): अविवाहित कन्याएं अच्छे वर की कामना से सूर्य और चंद्रमा की पूजा करती हैं।
  • कोजागिरी पूर्णिमा (महाराष्ट्र): रात को केसर-इलायची वाला मसाला दूध बनाकर पहले चाँद को अर्पित किया जाता है और फिर सब मिलकर पीते हैं। घर के बड़े बेटे की आरती करने की परंपरा भी है।
  • रास पूर्णिमा (ब्रज): वृंदावन, मथुरा और बरसाना में भगवान श्रीकृष्ण के महारास का उत्सव मनाया जाता है।
  • गुजरात: रात को गरबा और दूध-पोहा का प्रसाद।

भगवान श्रीकृष्ण का महारास

श्रीमद्भागवत के रास पंचाध्यायी में वर्णन है कि शरद पूर्णिमा की धवल चाँदनी रात में भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना तट पर बांसुरी बजाई। बांसुरी की मधुर ध्वनि सुनकर ब्रज की गोपियां अपना सब कुछ छोड़कर उनके पास पहुंच गईं। तब भगवान ने अपनी योगमाया से हर गोपी के साथ एक-एक कृष्ण का रूप धारण कर महारास रचाया। मान्यता है कि उस रात को भगवान ने इतना लंबा कर दिया कि वह ब्रह्मा की एक रात के बराबर हो गई। महारास जीव (गोपी) और परमात्मा (कृष्ण) के दिव्य, निष्काम प्रेम और मिलन का प्रतीक है।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा — साहूकार की दो बेटियां

एक नगर में एक साहूकार रहता था, जिसकी दो बेटियां थीं। दोनों बेटियां पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। बड़ी बेटी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से पूरा व्रत करती थी, जबकि छोटी बेटी व्रत अधूरा छोड़ देती थी और नियमों का पालन नहीं करती थी।

विवाह के बाद बड़ी बेटी के घर सुंदर और स्वस्थ संतान हुई, लेकिन छोटी बेटी की संतान जन्म लेते ही मर जाती थी। दुखी होकर छोटी बेटी ने पंडितों से इसका कारण पूछा। पंडितों ने बताया — "तुमने पूर्णिमा का व्रत अधूरा किया है, इसीलिए तुम्हारी संतान जीवित नहीं रहती। अब तुम शरद पूर्णिमा का व्रत पूरे विधि-विधान से करो, तो तुम्हारी संतान जीवित रह सकती है।"

छोटी बेटी ने पंडितों के कहे अनुसार शरद पूर्णिमा का व्रत किया। कुछ समय बाद उसके घर पुत्र हुआ, पर कुछ ही दिनों में वह भी मर गया। उसने मृत बालक को एक पीढ़े पर लिटाकर ऊपर से कपड़ा ढक दिया और अपनी बड़ी बहन को बुला लाई। उसने बड़ी बहन को उसी पीढ़े पर बैठने के लिए कहा।

जैसे ही बड़ी बहन बैठने लगी, उसके लहंगे का स्पर्श बालक से हुआ और बालक रोने लगा। बड़ी बहन चौंककर बोली — "तू मुझ पर कलंक लगाना चाहती थी! अगर मैं बैठ जाती तो बच्चा मर जाता।" तब छोटी बहन ने कहा — "दीदी, यह तो पहले से ही मरा हुआ था। तेरे पुण्य और तेरे पूर्ण व्रत के प्रभाव से ही यह जीवित हुआ है।"

उस दिन के बाद छोटी बहन ने हमेशा पूर्णिमा का व्रत पूरे नियम से किया और पूरे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सभी लोग पूर्णिमा का पूरा व्रत करें।

हे चंद्र देव और माँ लक्ष्मी! जैसे बड़ी बहन के पुण्य से बालक को जीवनदान मिला, वैसे ही सबकी मनोकामना पूर्ण करना और सबके घर में सुख-समृद्धि बनाए रखना।

चाँदनी में खीर रखने के पीछे की मान्यता

आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु में शरीर में पित्त बढ़ जाता है। दूध, चावल और मिश्री से बनी खीर पित्त को शांत करने वाली मानी जाती है। लोक मान्यता है कि रात भर चंद्रमा की शीतल किरणें खीर पर पड़ने से उसमें औषधीय गुण आ जाते हैं, जिससे शरीर स्वस्थ रहता है। इसी रात खुली चाँदनी में बैठने और चाँद को निहारने की भी परंपरा है, जिसे आँखों के लिए अच्छा माना जाता है।

नोट: ये पारंपरिक और धार्मिक मान्यताएं हैं। किसी बीमारी में खीर को दवा का विकल्प न मानें — इलाज के लिए डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

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पूजा सामग्री

खीर के लिए

  • गाय का शुद्ध दूध — लगभग 1 लीटर
  • चावल (बासमती या पुराना चावल) — लगभग 50 ग्राम (मुट्ठी भर)
  • मिश्री या चीनी — स्वाद अनुसार (मिश्री को ज़्यादा शुभ माना जाता है)
  • इलायची, केसर, थोड़े सूखे मेवे (बादाम, काजू, किशमिश, चिरौंजी)
  • थोड़ा देसी घी
  • खीर रखने के लिए चांदी, मिट्टी, कांच या स्टील का खुला बर्तन (प्लास्टिक या एल्युमिनियम का नहीं)
  • बर्तन ढकने के लिए पतला सूती / मलमल का कपड़ा या जाली

लक्ष्मी-विष्णु पूजा के लिए

  • लकड़ी की चौकी और लाल या पीला कपड़ा
  • माँ लक्ष्मी और भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र
  • रोली, हल्दी, चंदन, अक्षत, मौली
  • लाल फूल, कमल का फूल (यदि मिल सके), फूलमाला
  • घी का दीपक और कम से कम 11 या 21 मिट्टी के दीये
  • धूप-अगरबत्ती, कपूर
  • सुपारी, पान के पत्ते, लौंग, इलायची
  • मिठाई, ऋतुफल, नारियल
  • लक्ष्मी जी के लिए सुहाग सामग्री (चुनरी, बिंदी, सिंदूर) — वैकल्पिक
  • तुलसी दल (केवल भगवान विष्णु के लिए)

चंद्र अर्घ्य के लिए

  • तांबे या चांदी का लोटा
  • जल में मिलाने के लिए कच्चा दूध, अक्षत और सफेद फूल
  • सफेद मिठाई या खीर (भोग के लिए)

अन्य

  • सत्यनारायण कथा की पुस्तक (वैकल्पिक — कई घरों में पूर्णिमा पर कथा होती है)
  • दान के लिए अन्न, सफेद वस्त्र, दूध, चावल या चांदी
  • भजन-कीर्तन के लिए आरती की पुस्तक
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पूजा विधि

चरण 1: सुबह — स्नान और संकल्प

  • सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान करें, या नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें।
  • साफ़ सफेद या पीले वस्त्र पहनें।
  • सूर्य देव को जल अर्पित करें।
  • हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर व्रत का संकल्प लें — "मैं (अपना नाम) माँ लक्ष्मी, भगवान विष्णु और चंद्र देव की कृपा पाने, परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य के लिए आज शरद पूर्णिमा का व्रत रख रहा/रही हूँ।"
  • दिन भर फलाहार करें। जो लोग पूरा व्रत नहीं रख सकते, वे एक समय सात्विक भोजन कर सकते हैं।

चरण 2: दिन में लक्ष्मी-विष्णु पूजा

  • पूजा स्थान पर चौकी रखकर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और माँ लक्ष्मी व भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  • सबसे पहले श्री गणेश का स्मरण करें — ॐ गं गणपतये नमः
  • भगवान विष्णु को पीले फूल, चंदन, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें — ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
  • माँ लक्ष्मी को लाल फूल, कमल, रोली, अक्षत और सुहाग सामग्री अर्पित करें — ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः (लक्ष्मी जी को तुलसी न चढ़ाएं)
  • धूप-दीप दिखाएं, मिठाई और फल का भोग लगाएं।
  • इच्छा हो तो सत्यनारायण भगवान की कथा सुनें या पढ़ें।

चरण 3: शाम — खीर बनाना

  • शाम को साफ़-सफाई के साथ, स्नान करके खीर बनाएं।
  • चावल को धोकर 20–30 मिनट भिगो दें।
  • भारी तले के बर्तन में गाय का दूध उबालें। उबाल आने पर भीगे चावल डालें और धीमी आंच पर लगातार चलाते हुए पकाएं।
  • चावल पूरी तरह गल जाएं और खीर गाढ़ी होने लगे, तब मिश्री या चीनी, इलायची, केसर और सूखे मेवे डालें।
  • खीर को बहुत गाढ़ा न करें, थोड़ी पतली रखें — रात भर में यह अपने आप गाढ़ी हो जाती है।
  • खीर को थोड़ा ठंडा होने दें और फिर चांदी, मिट्टी, कांच या स्टील के खुले बर्तन में निकाल लें।

चरण 4: चंद्रोदय पर चंद्र देव को अर्घ्य

  • चंद्रोदय के बाद (दिल्ली में शाम लगभग 05:00 बजे के बाद, जब चाँद साफ़ दिखने लगे) छत या खुली जगह पर जाएं।
  • तांबे या चांदी के लोटे में जल लेकर उसमें थोड़ा कच्चा दूध, अक्षत और सफेद फूल डालें।
  • चंद्रमा की ओर मुख करके धीरे-धीरे अर्घ्य दें और यह मंत्र बोलें:
    ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः
    या सरल मंत्र: ॐ सों सोमाय नमः
  • चंद्र देव को सफेद मिठाई या थोड़ी खीर का भोग लगाएं और आरोग्य व मानसिक शांति की प्रार्थना करें।
  • व्रत रखने वाले चंद्र अर्घ्य के बाद फलाहार या हल्का भोजन कर सकते हैं।

चरण 5: खीर को चाँदनी में रखना (रात 8 बजे के बाद)

  • रात 8 बजे के बाद, जब आसमान पूरी तरह अंधेरा हो जाए और चाँद ऊपर आ जाए, खीर के बर्तन को छत, आंगन या बालकनी में ऐसी जगह रखें जहाँ चाँद की रोशनी सीधे खीर पर पड़े।
  • बर्तन को पतले सूती या मलमल के कपड़े या जाली से ढकें, ताकि चाँदनी अंदर पहुंचे लेकिन धूल, कीड़े और पक्षी खीर में न गिरें। ढक्कन से पूरी तरह बंद न करें।
  • बर्तन को किसी ऊंची और सुरक्षित जगह (स्टूल या चौकी) पर रखें, ताकि बिल्ली, कुत्ते या बंदर न पहुंच सकें।
  • खीर रखते समय माँ लक्ष्मी से प्रार्थना करें कि वे इस प्रसाद को अमृतमय बनाएं।
  • परंपरा के अनुसार खीर को रात भर चाँदनी में रहने दिया जाता है। कुछ परिवार मध्यरात्रि के बाद खीर अंदर ले आते हैं — अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार करें।

चरण 6: कोजागरी लक्ष्मी पूजा और रात्रि जागरण (निशीथ काल — रात लगभग 11:41 से 12:29)

  • रात को घर के मुख्य द्वार, आंगन, तुलसी और छत पर घी या तेल के दीये जलाएं — माँ लक्ष्मी प्रकाश वाले घर में आती हैं।
  • निशीथ काल में पूजा स्थान पर माँ लक्ष्मी के सामने घी का दीपक जलाएं।
  • माँ को रोली, अक्षत, लाल फूल, खील-बताशे, नारियल और मिठाई अर्पित करें।
  • लक्ष्मी मंत्र का 108 बार जाप करें:
    ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥
  • श्री सूक्त, कनकधारा स्तोत्र या लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें।
  • माँ लक्ष्मी की आरती ("ॐ जय लक्ष्मी माता") करें।
  • संभव हो तो रात भर जागकर भजन-कीर्तन करें। कोजागरी का अर्थ ही है जागरण — जो जागता है, उस पर लक्ष्मी कृपा करती हैं।
  • ब्रज परंपरा के अनुसार इस रात श्रीकृष्ण की पूजा कर "राधे-राधे" या "हरे कृष्ण" महामंत्र का कीर्तन भी किया जाता है।

चरण 7: अगली सुबह (26 अक्टूबर) — खीर का प्रसाद

  • सुबह सूर्योदय से पहले उठकर खीर का बर्तन अंदर ले आएं।
  • स्नान करके सबसे पहले थोड़ी खीर माँ लक्ष्मी और भगवान विष्णु को भोग लगाएं।
  • फिर परिवार के सभी सदस्य खाली पेट थोड़ी-थोड़ी खीर प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।
  • खीर का प्रसाद पड़ोसियों, रिश्तेदारों और ज़रूरतमंदों में भी बांटें।
  • उदया तिथि में पूर्णिमा होने के कारण 26 अक्टूबर की सुबह (09:41 से पहले) स्नान-दान करना भी पुण्यदायी है — अन्न, सफेद वस्त्र, दूध, चावल या चांदी का दान करें।
  • खीर को देखकर ही खाएं — अगर उसमें कुछ गिरा हो, गंध बदल गई हो या खराब लगे तो उसे न खाएं, पक्षियों या पौधों में डाल दें।
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व्रत के नियम

✅ शरद पूर्णिमा पर क्या करें

  • सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें और माँ लक्ष्मी व भगवान विष्णु की पूजा करें।
  • चंद्रोदय के बाद चंद्र देव को दूध मिले जल से अर्घ्य अवश्य दें।
  • खीर गाय के दूध से, साफ़-सफाई के साथ बनाएं और उसे चाँदनी में जाली या पतले कपड़े से ढककर रखें।
  • रात को घर में दीये जलाएं और कुछ समय जागकर माँ लक्ष्मी की आराधना करें।
  • सफेद या हल्के रंग के वस्त्र पहनें — सफेद रंग चंद्रमा को प्रिय है।
  • कुछ समय खुली चाँदनी में बैठें और मन को शांत रखें।
  • अगली सुबह खीर पहले भगवान को भोग लगाएं, फिर प्रसाद के रूप में बांटें।
  • ज़रूरतमंदों को सफेद वस्तुओं — दूध, चावल, शक्कर, सफेद वस्त्र — का दान करें।

❌ शरद पूर्णिमा पर क्या न करें

  • खीर को प्लास्टिक या एल्युमिनियम के बर्तन में न रखें।
  • खीर को पूरी तरह ढक्कन से बंद न करें — चाँदनी उस तक पहुंचनी चाहिए।
  • खीर को ऐसी जगह न रखें जहाँ धूल, कीड़े या जानवर पहुंच सकें।
  • माँ लक्ष्मी को तुलसी दल अर्पित न करें (तुलसी केवल विष्णु जी को चढ़ाएं)।
  • इस दिन मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज़ और तामसिक भोजन से दूर रहें।
  • घर में झगड़ा, कलह या अपशब्द न बोलें।
  • रात को घर को अंधेरा न छोड़ें।
  • खराब या बासी लगने वाली खीर प्रसाद के नाम पर न खाएं।
  • मधुमेह (डायबिटीज़) वाले लोग खीर बहुत कम मात्रा में लें, या मिश्री की जगह कम मीठा रखें।
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Hinglish

Sharad Purnima 2026 kab hai? Ravivar, 25 October 2026 ki raat. Purnima tithi 25 October subah 11:55 se 26 October subah 09:41 tak. Chandroday shaam lagbhag 05:00 baje aur Kojagari Lakshmi puja ka nishita muhurat raat 11:41 se 12:29 tak (New Delhi).

Kheer kab rakhein? Raat 8 baje ke baad, jab aasmaan poora andhera ho jaaye aur chand upar aa jaaye. Kheer ko chandi, mitti, kaanch ya steel ke khule bartan mein rakhein aur patle kapde ya jaali se dhakein. Agli subah pehle Lakshmi ji ko bhog lagayein, phir prasad lein.

Kheer kaise banayein: Gaay ke doodh mein bhige chawal dheemi aanch par pakayein, phir mishri, elaichi, kesar aur dry fruits daalein. Kheer thodi patli rakhein.

Chand ko arghya: Taambe ke lote mein jal, kachcha doodh, akshat aur safed phool daalkar chandrama ko arghya dein aur "Om Som Somaya Namah" bolein.

Kojagari puja: Raat ko ghar mein diye jalayein, nishita kaal mein Maa Lakshmi ki puja karein, Lakshmi mantra ka jaap karein, aarti karein aur ho sake to raat bhar jaagran karein.

Dhyan rakhein: Plastic ke bartan mein kheer na rakhein, Lakshmi ji ko tulsi na chadhayein aur kharab lagne wali kheer na khayein.

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शरद पूर्णिमा 2026 कब है?

शरद पूर्णिमा 2026 में रविवार, 25 अक्टूबर की रात को मनाई जाएगी।

शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर को है या 26 अक्टूबर को?

शरद पूर्णिमा की पूजा और खीर रखने की रस्म 25 अक्टूबर की रात को होगी, क्योंकि उसी रात चंद्रोदय के समय पूर्णिमा तिथि है। कुछ पंचांगों में उदया तिथि के अनुसार पूर्णिमा का स्नान-दान 26 अक्टूबर की सुबह बताया गया है।

पूर्णिमा तिथि कब से कब तक है?

पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर 2026 को सुबह 11:55 बजे से 26 अक्टूबर को सुबह 09:41 बजे तक रहेगी।

शरद पूर्णिमा 2026 में चाँद कितने बजे निकलेगा?

नई दिल्ली में 25 अक्टूबर को चंद्रोदय शाम लगभग 05:00 बजे होगा। कोलकाता में लगभग 04:21 PM पर चाँद निकलेगा। अन्य शहरों में समय कुछ मिनट अलग हो सकता है।

शरद पूर्णिमा पर खीर कितने बजे रखनी चाहिए?

खीर रात 8 बजे के बाद रखें, जब आसमान पूरी तरह अंधेरा हो जाए और चाँद ऊपर आ जाए। परंपरा के अनुसार खीर रात भर चाँदनी में रहती है और सुबह प्रसाद के रूप में खाई जाती है।

कोजागरी लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त क्या है?

नई दिल्ली में कोजागरी लक्ष्मी पूजा का निशीथ काल मुहूर्त रात लगभग 11:41 से 12:29 तक है।

शरद पूर्णिमा पर खीर क्यों रखी जाती है?

मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणों में अमृत तत्व होता है। चाँदनी में रखी खीर को अमृतमय और स्वास्थ्यवर्धक प्रसाद माना जाता है।

खीर किस बर्तन में रखनी चाहिए?

खीर चांदी, मिट्टी, कांच या स्टील के खुले बर्तन में रखें और पतले सूती कपड़े या जाली से ढकें। प्लास्टिक और एल्युमिनियम के बर्तन का प्रयोग न करें।

कोजागरी पूर्णिमा का क्या अर्थ है?

"को जागर्ति" का अर्थ है "कौन जाग रहा है?"। मान्यता है कि इस रात माँ लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागकर आराधना करने वाले भक्तों पर धन-धान्य की कृपा करती हैं।

शरद पूर्णिमा पर किसकी पूजा की जाती है?

इस दिन माँ लक्ष्मी, भगवान विष्णु, चंद्र देव और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है।

क्या शरद पूर्णिमा और वाल्मीकि जयंती एक ही दिन है?

हाँ, आदिकवि महर्षि वाल्मीकि की जयंती आश्विन पूर्णिमा यानी शरद पूर्णिमा के दिन ही मनाई जाती है।

शरद पूर्णिमा पर क्या दान करें?

इस दिन सफेद वस्तुओं जैसे दूध, चावल, शक्कर, खीर, सफेद वस्त्र और चांदी का दान करना शुभ माना जाता है।

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