होम / Chalisa / श्री विष्णु चालीसा (Shri Vishnu Chalisa)

श्री विष्णु चालीसा – पालनकर्ता भगवान विष्णु की महिमा

श्री विष्णु चालीसा सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु के करुणामय और रक्षक स्वरूप का गुणगान करती है। इसके नियमित पाठ से भय, कष्ट और पापों का नाश होता है तथा जीवन में शांति, धर्म और संतुलन बना रहता है।

📅 21 Oct, 2025 📖 Chalisa 👁️ Views: 3887
📖

परिचय

यह श्री विष्णु चालीसा भगवान विष्णु की महिमा और अवतार‑लीलाओं का संगीतमय स्तुति‑पाठ है। इसमें विष्णु के विविध रूपों (राम, कृष्ण, वाराह, मत्स्य, कूर्म आदि), उनकी रक्षा‑शक्ति और भक्तों पर कृपा का वर्णन है। श्रद्धा‑भाव से पाठ करने पर कहा जाता है कि यह भक्त के कष्ट हरकर सुख, समृद्धि और मोक्ष प्रदान करता है। नीचे आपकी दी हुई रचना को दोहा‑चौपाई (चालीसा‑शैली) में व्यवस्थित कर प्रस्तुत कर रहा/रही हूँ।

श्री विष्णु चालीसा (Shri Vishnu Chalisa)

PDF

॥ दोहा ॥
विष्णु सुनिए विनय, सेवक की चितलाय।
कीरत कुछ वर्णन करूँ, दीजै ज्ञान बताय॥

॥ चौपाई / चालीसा ॥
नमो विष्णु भगवान खरारी — कष्ट नशावन अखिल बिहारी।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी — त्रिभुवन फैल रही उजियारी।

सुंदर रूप मनोहर सूरत — सरल स्वभाव मोहनी मूर्त।
तन पर पीताम्बर अति सोहत — वैजन्ती माला मन मोहत।

शंख चक्र कर गदा बिराजे — देखत दैत्य असुर दल भाजे।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे — काम क्रोध मद लोभ न छाजे।

संत‑भक्त सज्जन मनरंजन — दनुज असुर दुष्टन दल गंजन।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन — दोष मिटाय करत जन सज्जन।

पाप काट भवसिंधु उतारण — कष्ट नाशकर भक्त उबारण।
करत अनेक रूप प्रभु धारण — केवल आप भक्ति के कारण।

धरणि धेनु बन तुमहि पुकारा — तब तुम रूप राम का धारा।
भार उतार असुर दल मारा — रावण आदिक को संहारा।

आप वाराह रूप बनाया — हिरण्याक्ष को मार गिराया।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया — चौदह रत्नन को निकलाया।

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया — रूप मोहनी आप दिखाया।
देवन को अमृत पान कराया — असुरन को छबि से बहलाया।

कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया — मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया — भस्मासुर को रूप दिखाया।

वेदन को जब असुर डुबाया — कर प्रबन्ध उन्हें ढूँढवाया।
मोहित बनकर खलहि नचाया — उसही कर से भस्म कराया।

असुर जलंधर अति बलदाई — शंकर से उन कीन्ह लड़ाई।
हार पार शिव सकल बनाई — कीन सती से छल खल जाई।

सुमिरन् कीन तुम्हें शिवरानी — बतलाई सब विपत कहानी।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी — वृन्दा की सब सुरति भुलानी।

देखत तीन दनुज शैतानी — वृन्दा आय तुम्हें लपटानी।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी — हना असुर उर शिव शैतानी।

तुमने धुरू प्रहलाद उबारे — हिरणाकुश आदिक खल मारे।
गणिका और अजामिल तारे — बहुत भक्त भवसिंधु उतारे।

हरहु सकल संताप हमारे — कृपा करहु हरि सृजन हारे।
देखहुँ मैं निज दरश तुम्हारे — दीन बन्धु भक्तन हितकारे।

चहत आपका सेवक दर्शन — करहु दया अपनी मधुसूदन।
जानूं नहीं योग्य जप पूजन — होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन।

शील‑दया, संतोष, सुलक्षण — विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण।
करहुँ आपका किस विधि पूजन — कुमति विलोक होत दुख भीषण।

करहुँ प्रणाम कौन विधि सुमिरण — कौन भाँति मैं करहुँ समर्पण।
सुर मुनि करत सदा सेवकाई — हर्षित रहत परम गति पाई।

दीन दुखिन पर सदा सहाई — निज जन जान लेव अपनाई।
पाप दोष संताप नशाओ — भवबंधन से मुक्त कराओ।

सुत‑सम्पति दे सुख उपजाओ — निज चरणन का दास बनाओ।
निगम सदा ये विनय सुनावै — पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै।

📢 शेयर करें