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मंगलवार प्रदोष व्रत कथा | मंगल प्रदोष पूजा विधि

मंगलवार प्रदोष व्रत की यह पावन कथा रोग निवारण और स्वास्थ्य लाभ के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। त्रयोदशी तिथि पर मंगलवार के दिन यह व्रत करने से सभी व्याधियों का नाश होता है और निरोगी जीवन प्राप्त होता है। इस कथा में एक वृद्धा और उसके पुत्र मंगलिया की कहानी है जिसने हनुमान जी के व्रत के साथ प्रदोष व्रत का पालन किया। भगवान की कृपा से मंगलिया को जीवनदान मिला और वृद्धा को मोक्ष प्राप्त हुआ। जो भी श्रद्धापूर्वक मंगल प्रदोष व्रत करता है, वह सभी रोगों से मुक्त हो जाता है।

Vrat Katha धार्मिक कथाएँ (Religious Stories) पूजा विधि (Puja Vidhi) प्रदोष व्रत कथा व्रत एवं उपवास (Fasting & Vrat)
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परिचय

मंगलवार प्रदोष व्रत की यह दिव्य कथा रोग निवारण और स्वास्थ्य प्राप्ति का सरल मार्ग बताती है। जब त्रयोदशी तिथि पर मंगलवार का दिन आता है, उस दिन भगवान शिव की पूजा करने से सभी व्याधियां नष्ट हो जाती हैं। इस व्रत में लाल रंग के फूल चढ़ाना और लाल वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। गेहूं और गुड़ का भोजन करना चाहिए। जो भी व्यक्ति विधि-विधान से इस व्रत को करता है, वह सभी पापों और रोगों से मुक्त हो जाता है।

This divine Tuesday Pradosh Vrat Katha shows a simple path to disease removal and health attainment. When Tuesday falls on Trayodashi tithi, worshipping Lord Shiva destroys all diseases. In this fast, offering red flowers and wearing red clothes is auspicious. One should eat wheat and jaggery. Whoever observes this fast with proper rituals becomes free from all sins and diseases.

मंगलवार प्रदोष व्रत कथा | मंगल प्रदोष पूजा विधि

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🙏 मंगलवार प्रदोष व्रत कथा 🙏

सूत जी बोले - "अब मैं मंगल त्रयोदशी प्रदोष व्रत का विधि-विधान कहता हूं। मंगलवार का दिन व्याधियों का नाशक है।"

**व्रत विधि:**

"इस व्रत में एक समय व्रती को गेहूं और गुड़ का भोजन करना चाहिए। देव प्रतिमा पर लाल रंग का फूल चढ़ाना और स्वयं लाल वस्त्र धारण करना चाहिए। इस व्रत के करने से मनुष्य सभी पापों और रोगों से मुक्त हो जाता है।"

**कथा:**

"अब मैं आपको उस वृद्धा की कथा सुनाता हूं जिसने यह व्रत किया और मोक्ष प्राप्त हुआ।"

"अत्यंत प्राचीन काल की घटना है। एक नगर में एक वृद्धा रहती थी। उसके मंगलिया नाम का एक पुत्र था। वृद्धा को हनुमान जी पर बड़ी श्रद्धा थी। वह प्रत्येक मंगलवार को हनुमान जी का व्रत रखकर यथाविधि उनका भोग लगाती थी। इसके अलावा मंगलवार को न तो घर लीपती थी और न ही मिट्टी खोदती थी।"

"इसी प्रकार व्रत रखते हुए जब काफी दिन बीत गए तो हनुमान जी ने सोचा कि चलो आज इस वृद्धा की श्रद्धा की परीक्षा करें। वे साधु का वेश बनाकर उसके द्वार पर पहुंचे और पुकारा - 'है कोई हनुमान का भक्त जो हमारी इच्छा पूरी करे।'"

"वृद्धा ने पुकार सुनी तो बाहर आई और पूछा - 'महाराज, क्या आज्ञा है?' साधु वेशधारी हनुमान जी बोले - 'मैं बहुत भूखा हूं, भोजन करूंगा। तू थोड़ी सी जमीन लीप दे।'"

"वृद्धा बड़ी दुविधा में पड़ गई। अंत में हाथ जोड़कर प्रार्थना की - 'हे महाराज! लीपने और मिट्टी खोदने के अतिरिक्त जो काम आप कहें वह मैं करने को तैयार हूं।'"

"साधु ने तीन बार परीक्षा के बाद कहा - 'तू अपने बेटे को बुला, मैं उसे औंधा लिटाकर उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन बनाऊंगा।'"

"वृद्धा ने सुना तो स्तब्ध रह गई, मगर वह वचन हार चुकी थी। उसने मंगलिया को पुकारकर साधु महाराज के हवाले कर दिया। साधु ने वृद्धा के हाथों से ही मंगलिया को औंधा लिटाकर उसकी पीठ पर आग जलवाई।"

"आग जलाकर दुखी मन से वृद्धा अपने घर अंदर चली गई। साधु जब भोजन बना चुका तो उसने वृद्धा को बुलाकर कहा कि वह मंगलिया को पुकारे ताकि वह भी आकर भोग लगा ले।"

"वृद्धा आंखों में आंसू भरकर बोली - 'अब उसका नाम लेकर मेरे हृदय को और न दुखाओ।' लेकिन साधु महाराज न माने तो वृद्धा को मंगलिया को पुकारना पड़ा।"

"पुकारने की देर थी कि मंगलिया बाहर से हंसता हुआ घर में दौड़ा आया। मंगलिया को जीवित देखकर वृद्धा को सुखद आश्चर्य हुआ। वह साधु महाराज के चरणों में गिर पड़ी।"

"साधु महाराज ने उसे अपने असली रूप के दर्शन दिए। हनुमान जी को अपने आंगन में देखकर वृद्धा को लगा कि जीवन सफल हो गया।"

🙏 जय हनुमान 🙏
🙏 ॐ नमः शिवाय 🙏

📌 PUJA VIDHI:
- प्रातः स्नान करें
- लाल वस्त्र धारण करें
- लाल फूल चढ़ाएं
- गेहूं और गुड़ का भोजन करें
- एक समय भोजन करें

📌 व्रत के लाभ:
- रोग निवारण
- स्वास्थ्य लाभ
- सभी पापों से मुक्ति
- मोक्ष प्राप्ति
 

 

**प्रदोष का अर्थ:**

'प्रदोष' शब्द का अर्थ है सूर्यास्त के उपरांत और रात्रि प्रारंभ होने से पूर्व का समय। शास्त्रों में कहा गया है कि यह समय भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत उत्तम है। इसी काल में भगवान शंकर का पूजन करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

**व्रत की विधि:**

त्रयोदशी तिथि के दिन व्रती को संपूर्ण दिन निराहार रहना चाहिए। सायंकाल जब सूर्यास्त में तीन घड़ी का समय शेष हो, तब स्नान आदि से निवृत्त होकर श्वेत वस्त्र धारण करें। तत्पश्चात संध्यावंदन करने के उपरांत शिवजी की पूजा आरंभ करें।

पूजा स्थल को स्वच्छ जल से धोकर वहां मंडप बनाएं। पांच रंगों के पुष्पों से कमल की आकृति बनाकर कुश का आसन बिछाएं। आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। इसके पश्चात भगवान महादेव का ध्यान करें।

**ध्यान स्वरूप:**

करोड़ों चंद्रमाओं के समान कांतियुक्त, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्र धारण करने वाले, पिंगल वर्ण की जटाएं धारण किए हुए, नीलकंठ, अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, वरद हस्त, त्रिशूलधारी, सर्पों के कुंडल पहने हुए, व्याघ्र चर्म धारण किए हुए, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए।

**उद्यापन की विधि:**

प्रातःकाल स्नान आदि कार्यों से निवृत्त होकर रंगीन वस्त्रों से मंडप सजाएं। फिर उस मंडप में शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करके विधिपूर्वक पूजन करें। तदुपरांत शिव-पार्वती के निमित्त खीर से अग्नि में हवन करना चाहिए।

हवन के समय 'ॐ उमा सहित शिवाय नमः' मंत्र से १०८ बार आहुति दें। इसी प्रकार 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र के उच्चारण से भगवान शंकर के निमित्त आहुति प्रदान करें। हवन समाप्ति पर किसी धार्मिक व्यक्ति को सामर्थ्य अनुसार दान दें।

तदुपरांत ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा से संतुष्ट करें। व्रत पूर्ण हुआ, ऐसा वाक्य ब्राह्मणों से कहलवाएं। ब्राह्मणों की अनुमति प्राप्त कर अपने परिजनों के साथ भगवान शंकर का स्मरण करते हुए भोजन ग्रहण करें।

इस प्रकार उद्यापन करने से व्रती को पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति होती है तथा आरोग्य लाभ होता है। इसके अतिरिक्त शत्रुओं पर विजय मिलती है एवं समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। यह स्कंद पुराण में वर्णित है।

**त्रयोदशी व्रत का महत्व:**

त्रयोदशी अर्थात प्रदोष व्रत करने वाला मनुष्य सदैव सुखी रहता है। इस व्रत के प्रभाव से समस्त पापों का नाश हो जाता है। इस व्रत को करने से विधवा स्त्रियों को अधर्म से विरक्ति होती है और सुहागिन स्त्रियों का सुहाग सदा अटल रहता है। बंदी को कारागार से मुक्ति मिलती है।

जो स्त्री-पुरुष जिस कामना से यह व्रत करते हैं, उनकी समस्त कामनाएं कैलाशपति भगवान शंकर पूर्ण करते हैं। सूत जी कहते हैं कि त्रयोदशी व्रत करने वाले को सौ गायों के दान का फल प्राप्त होता है।

इस व्रत को जो विधि-विधान और तन-मन-धन से करता है, उसके समस्त दुख दूर हो जाते हैं। सभी स्त्रियों को ग्यारह त्रयोदशी या संपूर्ण वर्ष की २६ त्रयोदशी पूर्ण करने के उपरांत उद्यापन करना चाहिए।

**प्रदोष व्रत में वार का महत्व:**

त्रयोदशी तिथि पर जो भी वार पड़ता है, उसी दिन के अनुसार व्रत करना चाहिए तथा उसी दिन की कथा पढ़नी या सुननी चाहिए। विशेष रूप से रवि, सोम और शनि प्रदोष व्रत अवश्य करने चाहिए। इन सभी से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।

**विभिन्न वारों के प्रदोष व्रत:**

१. **रविवार प्रदोष व्रत** - दीर्घायु और आरोग्यता प्राप्ति के लिए रवि प्रदोष व्रत करना चाहिए।

२. **सोमवार प्रदोष व्रत** - ग्रह दशा निवारण की कामना हेतु सोम प्रदोष व्रत करें।

३. **मंगलवार प्रदोष व्रत** - रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य प्राप्ति हेतु मंगल प्रदोष व्रत करें।

४. **बुधवार प्रदोष व्रत** - सर्व कामना सिद्धि के लिए बुध प्रदोष व्रत करें।

५. **बृहस्पतिवार प्रदोष व्रत** - शत्रु विनाश के लिए गुरु प्रदोष व्रत करें।

६. **शुक्रवार प्रदोष व्रत** - सौभाग्य और स्त्री समृद्धि के लिए शुक्र प्रदोष व्रत करें।

७. **शनिवार प्रदोष व्रत** - खोया हुआ राज्य एवं पद प्राप्ति की कामना हेतु शनि प्रदोष व्रत करें।

**व्रत का फल:**

प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

• सभी पापों से मुक्ति
• धन-संपत्ति की प्राप्ति
• संतान सुख
• आरोग्य लाभ
• शत्रुओं पर विजय
• मनोकामना पूर्ति
• कारागार से मुक्ति
• सुहाग की स्थिरता
• राज्य और पद की प्राप्ति

**महत्वपूर्ण निर्देश:**

- व्रत के दिन निराहार रहें
- प्रदोष काल में पूजा करें
- श्वेत वस्त्र धारण करें
- बेल पत्र अवश्य चढ़ाएं
- ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करें
- ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा दें
- कथा का श्रवण अवश्य करें