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होलिका दहन 2027: तारीख, शुभ मुहूर्त, भद्रा का समय, पूजा विधि, कथा और नियम

होलिका दहन बुराई पर अच्छाई और अहंकार पर भक्ति की जीत का पर्व है। फाल्गुन पूर्णिमा की रात भक्त प्रह्लाद की रक्षा और होलिका के अंत की याद में होलिका जलाई जाती है, और अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। इस पेज पर 2027 की तिथि, प्रदोष काल का मुहूर्त, भद्रा का पूरा समय, होलिका पूजन की विधि और सामग्री, परिक्रमा, मंत्र, प्रह्लाद की कथा और ज़रूरी नियम विस्तार से दिए गए हैं।

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तारीख 21 मार्च 2027, रविवार
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हिंदू तिथि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा
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शुभ मुहूर्त प्रदोष काल (दिल्ली) शाम 06:33 से 08:55 | भद्रा पूंछ रात 01:26 से 02:31 | भद्रा मुख में दहन न करें
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पूज्य देवता भगवान विष्णु (नरसिंह), भक्त प्रह्लाद, अग्नि देव
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परिचय

होलिका दहन के दिन सुबह से ही गांव या मोहल्ले के चौराहे पर लकड़ियों, उपलों और गोबर की गूलरियों (बड़कुल्ले) से होलिका सजाई जाती है। शाम को शुभ मुहूर्त में परिवार के लोग होलिका का पूजन करते हैं — कच्चा सूत लपेटते हैं, जल चढ़ाते हैं, रोली-अक्षत-फूल अर्पित करते हैं और परिक्रमा करते हैं। फिर होलिका जलाई जाती है और उसमें गेहूं-जौ की नई बालियां भूनकर प्रसाद के रूप में बांटी जाती हैं।

नीचे होलिका पूजन की पूरी सामग्री, क्रमवार विधि, मंत्र, परिक्रमा के नियम और ज़रूरी सावधानियां दी गई हैं।

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होलिका दहन का महत्व

होलिका दहन 2027 कब है?

वर्ष 2027 में होलिका दहन रविवार, 21 मार्च 2027 को फाल्गुन पूर्णिमा की रात होगा और रंगवाली होली (धुलेंडी) सोमवार, 22 मार्च 2027 को खेली जाएगी।

  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 21 मार्च 2027, शाम लगभग 06:21 बजे
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 22 मार्च 2027, शाम लगभग 04:13 बजे
  • होलिका दहन मुहूर्त (प्रदोष काल, नई दिल्ली): 21 मार्च, शाम 06:33 से रात 08:55 तक (लगभग 2 घंटे 22 मिनट)
  • भद्रा काल: 21 मार्च शाम लगभग 06:21 से 22 मार्च सुबह लगभग 05:15 तक
  • भद्रा पूंछ: 22 मार्च, रात लगभग 01:26 से 02:31 तक
  • भद्रा मुख: 22 मार्च, रात लगभग 02:31 से 04:20 तक (इस समय दहन बिल्कुल न करें)
  • भद्रा-रहित वैकल्पिक समय: 22 मार्च, भोर लगभग 05:15 से सूर्योदय (लगभग 06:23) तक
  • होलाष्टक: 16 मार्च 2027 (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी) से होलिका दहन तक

2027 में भद्रा को लेकर ज़रूरी बात

इस वर्ष पूर्णिमा तिथि 21 मार्च को सूर्यास्त के आसपास शुरू हो रही है, और उसी के साथ भद्रा भी शुरू होकर पूरी रात (22 मार्च की भोर लगभग 05:15 तक) रहेगी। शास्त्रों में भद्रा में होलिका दहन वर्जित बताया गया है, लेकिन जब भद्रा मध्यरात्रि के बाद तक चले तो प्रदोष काल में दहन करने की परंपरा है। इसी आधार पर अधिकतर पंचांग (जैसे द्रिक पंचांग पर आधारित गणना) 21 मार्च की शाम 06:33 से 08:55 का मुहूर्त दे रहे हैं।

जो परिवार भद्रा का पूरी तरह त्याग करना चाहते हैं, वे 22 मार्च की भोर 05:15 से सूर्योदय तक भद्रा-रहित समय में दहन कर सकते हैं। कुछ पंचांग (जैसे Prokerala, उज्जैन) 22 मार्च की शाम को भी मुहूर्त बता रहे हैं, इसलिए अपने क्षेत्र, मंदिर या कुल पुरोहित की परंपरा के अनुसार ही समय तय करें। जो भी समय चुनें, भद्रा मुख (रात 02:31 से 04:20) में दहन बिल्कुल न करें।

मुहूर्त का समय हर शहर के सूर्यास्त के अनुसार कुछ मिनट बदल जाता है — जैसे मथुरा में लगभग 06:31 से 08:53। सटीक समय के लिए स्थानीय पंचांग देखें।

होलिका दहन का महत्व

  • बुराई पर अच्छाई की जीत: होलिका दहन भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति की जीत और अहंकारी हिरण्यकशिपु तथा होलिका के अंत का प्रतीक है।
  • नकारात्मकता का दहन: मान्यता है कि होलिका की अग्नि में घर-परिवार की नकारात्मक ऊर्जा, रोग, दोष और बाधाएं जलकर नष्ट हो जाती हैं।
  • नई फसल का उत्सव: यह पर्व रबी की नई फसल के आने का भी उत्सव है। लोग गेहूं और जौ की नई बालियां होलिका की अग्नि में भूनकर प्रसाद के रूप में बांटते हैं। संस्कृत में आधे भुने अन्न को "होलक" कहते हैं, और कई विद्वान "होली" नाम का संबंध इसी से जोड़ते हैं।
  • ऋतु परिवर्तन: सर्दी के जाने और वसंत के आने के समय जलने वाली यह बड़ी अग्नि वातावरण को शुद्ध करने वाली भी मानी जाती है।
  • होलाष्टक की समाप्ति: होली से पहले के आठ दिन (होलाष्टक) शुभ कार्यों के लिए वर्जित माने जाते हैं। होलिका दहन के साथ यह समय समाप्त होता है।

होलिका दहन की कथा — भक्त प्रह्लाद और होलिका

विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक शक्तिशाली असुर राजा था। उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान पाया कि उसे न कोई मनुष्य मार सके न पशु, न दिन में न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न धरती पर न आकाश में, और न किसी अस्त्र से न शस्त्र से। इस वरदान के अहंकार में उसने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया और प्रजा को अपनी पूजा करने का आदेश दिया।

लेकिन उसका अपना पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। हिरण्यकशिपु ने उसे विष्णु भक्ति छोड़ने के लिए बहुत समझाया, फिर डराया-धमकाया। जब प्रह्लाद नहीं माना तो उसे मारने के अनेक प्रयास किए — पहाड़ से गिरवाया, हाथियों के पैरों तले कुचलवाने की कोशिश की, विषैले सांपों के बीच छोड़ा — पर हर बार भगवान की कृपा से प्रह्लाद बच गया।

अंत में हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका की मदद ली। होलिका को वरदान में एक ऐसी चादर (या वरदान) मिली थी जिससे अग्नि उसे जला नहीं सकती थी। योजना के अनुसार होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर जलती हुई चिता पर बैठ गई। प्रह्लाद पूरे समय "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप करता रहा। भगवान की लीला से वह चादर उड़कर प्रह्लाद पर आ गई — होलिका जलकर भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया। होलिका का वरदान इसलिए निष्फल हो गया क्योंकि उसने उसका प्रयोग एक निर्दोष भक्त को मारने के लिए किया था।

इसी घटना की याद में हर वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है। बाद में भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार (आधा मनुष्य, आधा सिंह) लेकर संध्या के समय (न दिन न रात), महल की देहली पर (न अंदर न बाहर), अपनी जांघों पर रखकर (न धरती न आकाश) और अपने नाखूनों से (न अस्त्र न शस्त्र) हिरण्यकशिपु का वध किया।

शिक्षा: सच्ची भक्ति और सत्य की रक्षा भगवान स्वयं करते हैं, और अहंकार तथा अधर्म का अंत निश्चित है — चाहे उसके पास कितने भी वरदान हों।

अन्य परंपराएं

  • कामदहन (दक्षिण भारत): दक्षिण भारत के कई हिस्सों में इस दिन को कामदेव के दहन की याद में मनाया जाता है, जब भगवान शिव ने तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया था।
  • ढुंढा राक्षसी: भविष्य पुराण में ढुंढा नाम की राक्षसी की कथा आती है, जो बच्चों को सताती थी और होली के शोर-गुल और अग्नि से भाग गई थी।
  • ब्रज की होली: मथुरा-वृंदावन, बरसाना और नंदगांव में होली का उत्सव कई दिन पहले शुरू हो जाता है — लड्डू होली, लट्ठमार होली, फूलों की होली और रंगभरी एकादशी के साथ।
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पूजा सामग्री

होलिका पूजन के लिए

  • एक लोटा जल (तांबे या पीतल का)
  • कच्चा सूत (मौली या सफेद कच्चा धागा) — होलिका पर लपेटने के लिए
  • रोली, हल्दी, अक्षत (साबुत चावल), गुलाल
  • फूल और फूलों की माला
  • साबुत मूंग, बताशे, गुड़
  • साबुत नारियल (पानी वाला)
  • धूप-अगरबत्ती और घी का दीपक
  • सुपारी, पान, लौंग, इलायची

होलिका में अर्पित करने के लिए

  • गोबर की गूलरियां / बड़कुल्ले (भरभोलिए) की माला — परंपरा के अनुसार
  • गेहूं और जौ की नई बालियां, हरे चने (होले)
  • कपूर, हवन सामग्री (थोड़ी)
  • सूखा नारियल (गोला)

होलिका सजाने के लिए

  • सूखी लकड़ियां और गाय के गोबर के उपले
  • होलिका के बीच में गाड़ने के लिए एक डंडा (प्रह्लाद का प्रतीक) — परंपरा अनुसार
  • हरे पेड़ न काटें, केवल सूखी लकड़ी और उपलों का प्रयोग करें

पूजा के बाद

  • होलिका की राख (भस्म) रखने के लिए एक छोटा पात्र
  • भुनी हुई बालियां और प्रसाद बांटने के लिए थाली
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पूजा विधि

चरण 1: सुबह की तैयारी (21 मार्च)

  • सुबह स्नान करके भगवान विष्णु और भगवान नरसिंह का स्मरण करें।
  • घर में भी गोबर या आटे से छोटी होलिका बनाने की परंपरा हो तो उसकी तैयारी कर लें।
  • पूजा की थाली में ऊपर दी गई सारी सामग्री सजा लें।

चरण 2: होलिका पूजन (मुहूर्त में, सूर्यास्त के बाद)

  • शुभ मुहूर्त में परिवार के साथ होलिका के स्थान पर जाएं। पूजा करते समय मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
  • सबसे पहले श्री गणेश का स्मरण करें — ॐ गं गणपतये नमः
  • हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें — "मैं (अपना नाम) अपने परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य और सभी दोषों के नाश के लिए होलिका का पूजन कर रहा/रही हूँ।"
  • होलिका पर जल अर्पित करें, फिर रोली, हल्दी, अक्षत और फूल चढ़ाएं।
  • गुलाल, साबुत मूंग, बताशे, गुड़ और नारियल अर्पित करें।
  • गोबर की गूलरियों की माला (बड़कुल्ले) होलिका पर चढ़ाएं।
  • भगवान नरसिंह और भक्त प्रह्लाद का ध्यान करते हुए धूप-दीप दिखाएं।

चरण 3: कच्चा सूत लपेटें और परिक्रमा करें

  • कच्चे सूत को होलिका के चारों ओर लपेटते हुए 3, 5 या 7 बार परिक्रमा करें (परिवार की परंपरा अनुसार)।
  • परिक्रमा करते हुए लोटे से धीरे-धीरे जल की धारा गिराते रहें।
  • परिक्रमा के समय अपनी मनोकामना मन में दोहराएं और भगवान का नाम जपते रहें।

चरण 4: होलिका पूजन मंत्र

पूजन के समय यह प्रसिद्ध मंत्र बोला जाता है:

अहकूटा भयत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव॥

साथ में इन मंत्रों का जाप भी कर सकते हैं:

  • भक्त प्रह्लाद के लिए — ॐ प्रह्लादाय नमः
  • भगवान नरसिंह के लिए — ॐ नृसिंहाय नमः
  • भगवान विष्णु के लिए — ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

चरण 5: होलिका दहन

  • मुहूर्त में होलिका में अग्नि प्रज्वलित की जाती है। सामूहिक होलिका में आम तौर पर मोहल्ले के बड़े या पुरोहित अग्नि देते हैं।
  • अग्नि जलने के बाद गेहूं-जौ की नई बालियां और हरे चने अग्नि में भूनें।
  • सूखा नारियल और थोड़ी हवन सामग्री अग्नि में अर्पित करें।
  • जलती होलिका की परिक्रमा दूर से और सावधानी से करें।
  • भुनी हुई बालियां प्रसाद के रूप में घर लाएं और सबको बांटें — इसे आरोग्य और समृद्धि देने वाला माना जाता है।

चरण 6: अगली सुबह — राख का तिलक (22 मार्च)

  • होलिका ठंडी होने पर उसकी थोड़ी राख (भस्म) घर लाएं।
  • सुबह स्नान के बाद इस भस्म का माथे पर तिलक लगाएं — मान्यता है कि इससे रोग-दोष दूर होते हैं।
  • कई परिवार इस राख को घर के कोनों में छिड़कते हैं या ताबीज़ में रखते हैं।
  • फिर सबसे पहले भगवान को गुलाल अर्पित करके रंगवाली होली की शुरुआत करें।
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व्रत के नियम

✅ होलिका दहन पर क्या करें

  • होलिका पूजन और दहन केवल शुभ मुहूर्त में करें, भद्रा मुख में बिल्कुल नहीं।
  • होलिका में केवल सूखी लकड़ी और गोबर के उपले प्रयोग करें।
  • पूजा के समय कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करें और जल अर्पित करें।
  • नई फसल की बालियां अग्नि में भूनकर प्रसाद बांटें।
  • होलिका की राख का अगली सुबह तिलक लगाएं।
  • इस दिन भगवान नरसिंह और भक्त प्रह्लाद की कथा पढ़ें या सुनें।
  • ज़रूरतमंदों को अन्न और वस्त्र का दान करें।

❌ होलिका दहन पर क्या न करें

  • भद्रा मुख (2027 में 22 मार्च रात 02:31 से 04:20) में दहन न करें।
  • होलिका के लिए हरे पेड़ न काटें। पीपल, बरगद, आम, शमी जैसे पवित्र पेड़ों की लकड़ी बिल्कुल न जलाएं।
  • होलिका में प्लास्टिक, टायर, रबर या कचरा न डालें — यह प्रदूषण फैलाता है और अशुभ माना जाता है।
  • मान्यता है कि नवविवाहिता को अपनी ससुराल की पहली होलिका जलते हुए नहीं देखनी चाहिए (यह क्षेत्रीय परंपरा है, अपने परिवार की मान्यता के अनुसार चलें)।
  • गर्भवती महिलाएं जलती होलिका की परिक्रमा न करें और आग से दूर रहें।
  • होलिका दहन के दिन किसी को उधार न दें और किसी से विवाद न करें — ऐसी लोक मान्यता है।
  • होलिका की अग्नि के बहुत पास न जाएं, बच्चों को आग से दूर रखें और ढीले-सिंथेटिक कपड़े पहनकर परिक्रमा न करें।
  • होलाष्टक (16 से 21 मार्च 2027) में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे शुभ कार्य शुरू न करें।
  • नशे में या मांस-मदिरा का सेवन करके पूजा न करें।
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होलिका दहन — आरती

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Hinglish

Holika Dahan 2027 kab hai? Ravivar, 21 March 2027. Rangwali Holi Somvar, 22 March 2027 ko. Purnima tithi 21 March shaam 06:21 se 22 March shaam 04:13 tak.

Muhurat: Pradosh kaal (New Delhi) shaam 06:33 se raat 08:55 tak. Bhadra 21 March shaam se 22 March subah lagbhag 05:15 tak rahegi. Bhadra poonchh raat 01:26 se 02:31, bhadra mukh 02:31 se 04:20 — bhadra mukh mein dahan bilkul na karein. Bhadra-rahit samay 22 March bhor 05:15 se suryoday tak.

Puja vidhi: Holika par jal, roli, haldi, akshat, phool, gulal, moong, batashe aur nariyal chadhayein. Kachcha soot lapet-te hue 3 ya 7 baar parikrama karein. Gehu aur jau ki nayi baliyan aag mein bhoonkar prasad baantein.

Mantra: "Ahakoota bhayatrastaih krita tvam holi baalishaih, atastvaam poojayishyaami bhoote bhootiprada bhava."

Agle din: Holika ki raakh ka tilak lagayein, phir rang khelein.

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

होलिका दहन 2027 कब है?

होलिका दहन 2027 में रविवार, 21 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा की रात है।

होली 2027 (रंगवाली होली) कब है?

रंगवाली होली या धुलेंडी सोमवार, 22 मार्च 2027 को है।

होलिका दहन 2027 का शुभ मुहूर्त क्या है?

नई दिल्ली में प्रदोष काल मुहूर्त 21 मार्च शाम 06:33 से रात 08:55 तक है। भद्रा-रहित समय चाहने वालों के लिए 22 मार्च भोर लगभग 05:15 से सूर्योदय तक का समय है।

पूर्णिमा तिथि कब से कब तक है?

फाल्गुन पूर्णिमा 21 मार्च 2027 शाम लगभग 06:21 से 22 मार्च शाम लगभग 04:13 तक रहेगी।

होलिका दहन 2027 पर भद्रा कब है?

भद्रा 21 मार्च शाम लगभग 06:21 से 22 मार्च सुबह लगभग 05:15 तक है। भद्रा पूंछ रात 01:26 से 02:31 और भद्रा मुख रात 02:31 से 04:20 तक है।

भद्रा में होलिका दहन क्यों नहीं करते?

शास्त्रों में भद्रा (विष्टि करण) को शुभ कार्यों के लिए अशुभ माना गया है। विशेष रूप से भद्रा मुख में होलिका दहन पूरी तरह वर्जित है। भद्रा मध्यरात्रि के बाद तक रहे तो प्रदोष काल में दहन करने की परंपरा है।

होलाष्टक 2027 कब से है?

होलाष्टक 16 मार्च 2027 (फाल्गुन शुक्ल अष्टमी) से शुरू होकर होलिका दहन के साथ समाप्त होगा। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते।

होलिका की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए?

कच्चा सूत लपेटते हुए होलिका की 3, 5 या 7 परिक्रमा की जाती है। परिवार की परंपरा के अनुसार संख्या चुनें।

होलिका दहन क्यों मनाया जाता है?

भक्त प्रह्लाद की रक्षा और होलिका के अग्नि में जलकर भस्म होने की याद में होलिका दहन किया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

होलिका दहन में गेहूं की बालियां क्यों भूनते हैं?

होली नई रबी फसल का उत्सव भी है। नई फसल का पहला अंश अग्नि देव को अर्पित करके भुनी बालियां प्रसाद के रूप में बांटी जाती हैं।

होलिका की राख का क्या करें?

अगली सुबह होलिका की ठंडी राख का माथे पर तिलक लगाया जाता है। मान्यता है कि इससे रोग और नकारात्मकता दूर होती है।

होलिका पूजन का मंत्र क्या है?

अहकूटा भयत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः। अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव॥

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