परिचय
छठ महापर्व को सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। व्रती (जिन्हें "परवैतिन" भी कहते हैं) खरना की शाम प्रसाद ग्रहण करने के बाद लगभग 36 घंटे तक बिना अन्न और जल के रहते हैं और उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलते हैं। पूरे चार दिन घर में पूर्ण शुद्धता और सात्विकता का पालन किया जाता है।
नीचे चारों दिनों की विधि अलग-अलग, क्रम से दी गई है। पहली बार व्रत करने वाले घर की किसी अनुभवी महिला या व्रती से भी मार्गदर्शन अवश्य लें, क्योंकि हर परिवार की परंपरा में थोड़ा अंतर होता है।
छठ पूजा (छठ महापर्व) का महत्व
छठ पूजा 2026 कब है? — चारों दिन की तारीख
वर्ष 2026 में छठ महापर्व शुक्रवार, 13 नवंबर से सोमवार, 16 नवंबर 2026 तक मनाया जाएगा। मुख्य छठ पूजा (संध्या अर्घ्य) कार्तिक शुक्ल षष्ठी, रविवार 15 नवंबर को होगी।
- पहला दिन — नहाय-खाय: शुक्रवार, 13 नवंबर 2026 (कार्तिक शुक्ल चतुर्थी)
- दूसरा दिन — खरना (लोहंडा): शनिवार, 14 नवंबर 2026 (कार्तिक शुक्ल पंचमी)
- तीसरा दिन — संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य को): रविवार, 15 नवंबर 2026 (कार्तिक शुक्ल षष्ठी)
- चौथा दिन — उषा अर्घ्य (उगते सूर्य को) और पारण: सोमवार, 16 नवंबर 2026 (कार्तिक शुक्ल सप्तमी)
- षष्ठी तिथि प्रारंभ: 14 नवंबर 2026, रात लगभग 11:23 बजे
- षष्ठी तिथि समाप्त: 16 नवंबर 2026, रात लगभग 02:00 बजे (15-16 की मध्यरात्रि के बाद)
शहरवार अर्घ्य का समय
छठ में अर्घ्य का समय आपके शहर के सूर्यास्त (संध्या अर्घ्य) और सूर्योदय (उषा अर्घ्य) के अनुसार होता है।
- पटना: संध्या अर्घ्य (15 नवंबर) शाम लगभग 05:00 | उषा अर्घ्य (16 नवंबर) सुबह लगभग 06:07
- गया: संध्या अर्घ्य शाम लगभग 05:02 | उषा अर्घ्य सुबह लगभग 06:06
- रांची: संध्या अर्घ्य शाम लगभग 05:03 | उषा अर्घ्य सुबह लगभग 06:03
- वाराणसी: संध्या अर्घ्य शाम लगभग 05:09 | उषा अर्घ्य सुबह लगभग 06:15
- कोलकाता: संध्या अर्घ्य शाम लगभग 04:52 | उषा अर्घ्य सुबह लगभग 05:49
- दिल्ली: संध्या अर्घ्य शाम लगभग 05:27 | उषा अर्घ्य सुबह लगभग 06:44
- मुंबई: संध्या अर्घ्य शाम लगभग 05:59 | उषा अर्घ्य सुबह लगभग 06:46
घाट पर सूर्यास्त और सूर्योदय से कम से कम 30–45 मिनट पहले पहुंच जाएं। सटीक समय के लिए अपने शहर का पंचांग या स्थानीय छठ घाट समिति की सूचना देखें।
छठ पूजा का महत्व
छठ पूजा में सूर्य देव और उनकी बहन मानी जाने वाली छठी मैया (षष्ठी देवी) की उपासना की जाती है। षष्ठी देवी को संतान की रक्षा करने वाली और उसे दीर्घायु देने वाली देवी माना जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार वे प्रकृति का छठा अंश हैं, इसलिए उन्हें "षष्ठी" कहा जाता है।
यह संसार का एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें डूबते हुए सूर्य को भी अर्घ्य दिया जाता है। संध्या अर्घ्य सूर्य की पत्नी प्रत्यूषा (सूर्य की अंतिम किरण) को और उषा अर्घ्य सूर्य की पत्नी उषा (सूर्य की पहली किरण) को समर्पित माना जाता है। यह संदेश देता है कि जो डूबता है, वही फिर उगता है — जीवन के हर उतार-चढ़ाव का सम्मान करें।
छठ व्रत संतान की प्राप्ति, संतान के सुख-स्वास्थ्य, परिवार की समृद्धि और मनोकामना पूर्ति के लिए किया जाता है। इसमें किसी पुरोहित की आवश्यकता नहीं होती — व्रती स्वयं प्रकृति के तत्वों (जल, सूर्य, अन्न, फल) के माध्यम से सीधे ईश्वर की उपासना करते हैं। स्वच्छता, शुद्धता, अनुशासन और सामूहिकता इस पर्व की आत्मा है।
छठ पूजा से जुड़ी पौराणिक कथाएं
1. राजा प्रियव्रत और षष्ठी देवी
पुराणों के अनुसार स्वायंभुव मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने उनके लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराया और यज्ञ की खीर रानी मालिनी को दी। रानी को पुत्र तो हुआ, लेकिन वह मृत पैदा हुआ। दुखी राजा पुत्र के शव को लेकर श्मशान पहुंचे और स्वयं भी प्राण त्यागने लगे। तभी आकाश से एक दिव्य विमान उतरा, जिसमें देवी षष्ठी विराजमान थीं। देवी ने अपने स्पर्श से बालक को जीवित कर दिया और कहा — "मैं सृष्टि की मूल प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हूँ, इसलिए षष्ठी कहलाती हूँ। जो मेरी पूजा करेगा, उसकी संतान की मैं रक्षा करूंगी।" तभी से कार्तिक शुक्ल षष्ठी को छठी मैया की पूजा की जाने लगी।
2. भगवान श्रीराम और माता सीता
मान्यता है कि लंका विजय के बाद अयोध्या लौटकर राम राज्य की स्थापना के समय भगवान श्रीराम और माता सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उपवास रखकर सूर्य देव की आराधना की थी और सप्तमी को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण किया था। बिहार के मुंगेर में सीता चरण मंदिर इसी कथा से जुड़ा माना जाता है।
3. महाभारत — कर्ण और द्रौपदी
सूर्यपुत्र कर्ण प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वे महान योद्धा बने। जल में खड़े होकर अर्घ्य देने की छठ की परंपरा इसी से जुड़ी मानी जाती है। एक अन्य कथा के अनुसार जब पांडव अपना राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत किया, जिससे उनकी मनोकामना पूरी हुई और पांडवों को उनका राज्य वापस मिला।
छठ का प्रसाद — ठेकुआ
ठेकुआ छठ पूजा का सबसे प्रमुख प्रसाद है, जो व्रती पूरी शुद्धता के साथ घर पर बनाते हैं।
- सामग्री: गेहूँ का आटा (500 ग्राम), गुड़ (250 ग्राम), घी (4-5 बड़े चम्मच मोयन के लिए), कद्दूकस किया सूखा नारियल, इलायची पाउडर, सौंफ, तलने के लिए घी।
- गुड़ को थोड़े पानी में घोलकर छान लें।
- आटे में घी का मोयन, नारियल, इलायची और सौंफ मिलाएं। गुड़ के पानी से सख्त आटा गूंथ लें।
- छोटी लोई लेकर उसे ठेकुआ के सांचे पर दबाकर डिज़ाइन बनाएं।
- धीमी-मध्यम आंच पर घी में सुनहरा-भूरा होने तक तलें।
- ठेकुआ बनाने से पहले रसोई और बर्तनों को अच्छी तरह साफ़ करें। प्रसाद बनाते समय कुछ भी चखें नहीं।
छठ पूजा कहाँ मनाई जाती है?
छठ मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र का महापर्व है, लेकिन आज दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, सूरत, पंजाब और विदेशों में भी बड़ी संख्या में लोग इसे धूमधाम से मनाते हैं। पटना के गंगा घाट, वाराणसी के घाट, देव (औरंगाबाद) का सूर्य मंदिर, बड़गांव (नालंदा) और दिल्ली में यमुना के घाट छठ के लिए प्रसिद्ध हैं।
छठ वर्ष में दो बार आता है — चैत्र मास में (चैती छठ) और कार्तिक मास में। कार्तिक की छठ अधिक प्रसिद्ध और बड़े स्तर पर मनाई जाती है।
पूजा सामग्री
सूप और दउरा
- बांस का सूप — परिवार के सदस्यों की संख्या या मन्नत के अनुसार (कम से कम 2–5)
- बांस की टोकरी (दउरा / डाला) — सारा प्रसाद घाट तक ले जाने के लिए
- पीतल का सूप (कई परिवार बांस की जगह पीतल का सूप भी लेते हैं)
- सूप और दउरा पर लगाने के लिए सिंदूर, पीला कपड़ा
प्रसाद
- ठेकुआ (गेहूँ के आटे, गुड़ और घी से बना)
- कसार / लड्डू (चावल के आटे और गुड़ से बना)
- खरना के लिए: गुड़ की खीर (रसियाव), गेहूँ के आटे की रोटी या पूरी
फल और प्रकृति की वस्तुएं
- गन्ना — पत्तों सहित (5 या अधिक)
- केले का पूरा घौद (गुच्छा)
- पानी वाला नारियल (जटा सहित)
- डाभ नींबू (बड़ा नींबू / चकोतरा), संतरा, मौसमी, सेब, शरीफा, अमरूद
- सिंघाड़ा, सुथनी, शकरकंद, मूली
- अदरक और हल्दी के पत्तों सहित पौधे
- अनानास, अनार (उपलब्धता अनुसार)
- मखाना, सूखे मेवे, मिठाई
पूजन सामग्री
- मिट्टी के दीये और घी, रुई की बत्तियाँ
- सिंदूर, रोली, चंदन, अक्षत (साबुत चावल)
- फूल और फूलमाला
- पान के पत्ते, सुपारी, लौंग, इलायची
- धूप-अगरबत्ती, कपूर
- अर्घ्य के लिए कच्चा दूध और गंगाजल
- लोटा (तांबे या पीतल का) या ग्लास (अर्घ्य देने के लिए)
- शहद, गुड़
व्रती के लिए
- नए वस्त्र — महिलाओं के लिए बिना सिली सूती साड़ी (पीली या नारंगी शुभ), पुरुषों के लिए धोती
- नई चूड़ियाँ, सिंदूर (महिला व्रतियों के लिए नाक से माथे तक लंबा सिंदूर लगाने की परंपरा)
- सोने के लिए ज़मीन पर बिछाने का साफ़ बिस्तर / चटाई
कोसी भरने के लिए (मन्नत वाले परिवारों में)
- 5 या 7 गन्ने (छत्र जैसा मंडप बनाने के लिए)
- मिट्टी का हाथी, कलश और 12/24 दीये
- लाल या पीला कपड़ा, प्रसाद और फल
रसोई के लिए
- नया या अच्छी तरह साफ़ किया हुआ मिट्टी का चूल्हा (या पूरी तरह साफ़ गैस चूल्हा)
- आम की लकड़ी (मिट्टी के चूल्हे के लिए)
- नए या केवल छठ के लिए रखे बर्तन
- सेंधा नमक (नहाय-खाय के भोजन के लिए)
पूजा विधि
पहला दिन — नहाय-खाय (शुक्रवार, 13 नवंबर)
- व्रत शुरू करने से पहले पूरे घर, विशेषकर रसोई की अच्छी तरह सफाई करें। इस दिन से घर में लहसुन, प्याज़, मांस-मदिरा पूरी तरह बंद हो जाते हैं।
- व्रती सुबह किसी पवित्र नदी, तालाब या घर पर गंगाजल मिले पानी से स्नान करें और नए या साफ़ वस्त्र पहनें।
- सूर्य देव को जल अर्पित करें और छठी मैया का ध्यान करके व्रत का संकल्प लें।
- इस दिन व्रती केवल एक बार भोजन करते हैं — कद्दू (लौकी) की सब्ज़ी, चने की दाल और चावल (अरवा चावल), जो घी में और सेंधा नमक डालकर बनाया जाता है। इसीलिए इस दिन को "कद्दू-भात" भी कहते हैं।
- भोजन मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से या पूरी तरह शुद्ध रसोई में बनाया जाता है।
- व्रती के भोजन करने के बाद ही परिवार के अन्य सदस्य यह प्रसाद ग्रहण करते हैं।
- व्रती इस दिन से ज़मीन पर बिस्तर बिछाकर सोते हैं।
दूसरा दिन — खरना / लोहंडा (शनिवार, 14 नवंबर)
- इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं।
- शाम को स्नान करके नए मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से गुड़ की खीर (रसियाव) और गेहूँ के आटे की रोटी (या पूरी) बनाई जाती है। इसमें नमक का प्रयोग बिल्कुल नहीं होता।
- सूर्यास्त के बाद छठी मैया और सूर्य देव की पूजा करके केले के पत्ते पर खीर, रोटी और केला का भोग लगाया जाता है।
- व्रती एकांत में बैठकर यह प्रसाद ग्रहण करते हैं। प्रसाद खाते समय घर में पूरी शांति रखी जाती है — मान्यता है कि उस समय कोई आवाज़ या शोर हो जाए तो व्रती वहीं खाना छोड़ देते हैं।
- इसके बाद यह प्रसाद परिवार, रिश्तेदारों और पड़ोसियों में बांटा जाता है।
- खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद से व्रती का 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है, जो चौथे दिन उषा अर्घ्य के बाद पारण से ही टूटता है।
तीसरा दिन — संध्या अर्घ्य (रविवार, 15 नवंबर)
- सुबह से घर में ठेकुआ और कसार का प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद बनाते समय पूरी शुद्धता रखें और कुछ भी चखें नहीं।
- दोपहर में बांस के दउरा और सूप सजाए जाते हैं। हर सूप में ठेकुआ, कसार, फल (केला, नारियल, डाभ नींबू, सिंघाड़ा, सुथनी, गन्ने के टुकड़े), अदरक-हल्दी के पौधे, पान-सुपारी और दीपक रखा जाता है। सूप पर सिंदूर लगाया जाता है।
- सभी सूप दउरा में रखकर घर के पुरुष सदस्य उसे सिर पर उठाकर नंगे पैर घाट तक ले जाते हैं। रास्ते भर छठ के पारंपरिक गीत ("कांच ही बांस के बहंगिया", "केलवा के पात पर") गाए जाते हैं।
- घाट पर पहुंचकर एक स्थान पर गन्ने खड़े करके या मिट्टी की वेदी बनाकर पूजा स्थान तैयार करें, जिसे "सुशोभित" करके दीये जलाए जाते हैं।
- सूर्यास्त से कुछ समय पहले व्रती स्नान करके पानी में कमर तक खड़े होते हैं, हाथ में सूप लेकर सूर्य देव की ओर मुख करते हैं।
- डूबते सूर्य को अर्घ्य (पटना में लगभग 05:00 PM, दिल्ली में लगभग 05:27 PM): परिवार के सदस्य लोटे से कच्चा दूध और जल व्रती के सूप पर धीरे-धीरे गिराते हैं, और व्रती सूप को सूर्य की ओर उठाकर अर्घ्य देते हैं।
- अर्घ्य देते समय यह मंत्र बोलें:
ॐ एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
या सरल मंत्र: ॐ सूर्याय नमः / ॐ घृणि सूर्याय नमः - हर सूप से अलग-अलग अर्घ्य दिया जाता है और व्रती जल में ही सूर्य देव की परिक्रमा करते हैं।
- अर्घ्य के बाद परिवार घाट पर कुछ देर पूजा-भजन करता है और फिर दउरा लेकर घर लौटता है।
- कोसी भरना: जिन परिवारों ने मन्नत मांगी हो, वे रात को घर के आंगन या छत पर 5 या 7 गन्नों से छत्र बनाकर उसके नीचे मिट्टी का हाथी, कलश, दीये और प्रसाद रखकर कोसी भरते हैं और रात भर छठ के गीत गाते हैं। अगली सुबह यही कोसी घाट पर भी भरी जाती है।
चौथा दिन — उषा अर्घ्य और पारण (सोमवार, 16 नवंबर)
- सुबह सूर्योदय से काफ़ी पहले (ब्रह्म मुहूर्त में) व्रती और परिवार दउरा लेकर फिर से घाट पर पहुंचते हैं। पिछली शाम वाले सूप में नए फल और प्रसाद रखे जाते हैं।
- व्रती स्नान करके पानी में खड़े होकर सूर्य देव के उगने की प्रतीक्षा करते हैं और भजन करते हैं।
- उगते सूर्य को अर्घ्य (पटना में लगभग 06:07 AM, दिल्ली में लगभग 06:44 AM): जैसे ही सूर्य की पहली किरण दिखाई दे, उसी विधि से कच्चे दूध और जल से अर्घ्य दें।
- अर्घ्य के बाद व्रती घाट पर ही छठी मैया की पूजा करते हैं, प्रसाद अर्पित करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि व संतान की लंबी आयु की प्रार्थना करते हैं।
- घाट पर उपस्थित लोग व्रतियों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं और व्रती सबको प्रसाद देते हैं।
- पारण: घर लौटकर व्रती सबसे पहले कच्चा दूध, शरबत, अदरक या प्रसाद (ठेकुआ) ग्रहण करके 36 घंटे का व्रत खोलते हैं। इसके बाद ही सामान्य भोजन किया जाता है।
- छठ का प्रसाद (ठेकुआ, फल) रिश्तेदारों, पड़ोसियों और मित्रों में बांटा जाता है। छठ का प्रसाद मांगकर खाना भी शुभ माना जाता है।
दंडवत / दंडी (मन्नत वाले भक्तों के लिए)
- मन्नत पूरी होने पर कुछ भक्त घर से घाट तक दंडवत प्रणाम करते हुए जाते हैं — ज़मीन पर लेटकर प्रणाम करना, फिर उठकर उसी स्थान से अगला प्रणाम। यह अत्यंत कठिन साधना है और केवल स्वस्थ व्यक्ति को ही करनी चाहिए।
व्रत के नियम
✅ छठ पूजा में क्या करें
- नहाय-खाय से उषा अर्घ्य तक पूरे घर में पूर्ण शुद्धता और सात्विकता का पालन करें।
- प्रसाद बनाने से पहले रसोई और बर्तनों को अच्छी तरह धोएं। संभव हो तो नए बर्तन और मिट्टी के चूल्हे का प्रयोग करें।
- प्रसाद हमेशा स्नान करके, साफ़ वस्त्र पहनकर बनाएं।
- व्रती ज़मीन पर साफ़ बिस्तर बिछाकर सोएं।
- अर्घ्य के लिए घाट पर समय से पहले पहुंचें।
- व्रतियों का सम्मान करें, उनकी सेवा करें और उनसे आशीर्वाद लें।
- घाट और नदी की सफाई का ध्यान रखें — पूजा के बाद प्लास्टिक और कचरा वहीं न छोड़ें।
- बच्चों और बुज़ुर्गों का घाट पर विशेष ध्यान रखें; गहरे पानी में न जाएं।
❌ छठ पूजा में क्या न करें
- चारों दिन घर में लहसुन, प्याज़, मांस, मछली, अंडा और मदिरा का प्रयोग बिल्कुल न करें।
- खरना और प्रसाद में साधारण नमक का प्रयोग न करें।
- प्रसाद बनाते समय उसे चखें नहीं और जूठे हाथों से प्रसाद को न छुएं।
- व्रती पलंग या गद्दे पर न सोएं।
- पूजा के सूप, दउरा और प्रसाद को पैर न लगाएं और उन्हें ज़मीन पर सीधे न रखें।
- प्लास्टिक या स्टील के सूप का प्रयोग न करें — बांस या पीतल का सूप ही लें।
- घर में झगड़ा, अपशब्द और किसी का अपमान न करें।
- खरना का प्रसाद खाते समय व्रती के पास शोर न करें।
- गर्भवती महिलाएं, बीमार, बुज़ुर्ग और दवा लेने वाले लोग डॉक्टर की सलाह के बिना 36 घंटे का निर्जला व्रत न रखें — परिवार के किसी अन्य सदस्य द्वारा व्रत करवाया जा सकता है।
छठ पूजा (छठ महापर्व) — आरती
छठ पूजा (छठ महापर्व) — चालीसा
Hinglish
Chhath Puja 2026 kab hai? Nahay-Khay 13 November (Shukravar), Kharna 14 November (Shanivar), Sandhya Arghya 15 November (Ravivar) aur Usha Arghya 16 November (Somvar).
Arghya ka samay: Patna mein Sandhya Arghya shaam lagbhag 05:00 aur Usha Arghya subah lagbhag 06:07. Delhi mein shaam 05:27 aur subah 06:44. Kolkata mein 04:52 aur 05:49.
Nahay-Khay: Snaan karke vrat ka sankalp lein aur ek baar kaddu ki sabzi, chane ki daal aur chawal sendha namak mein bana kar khayein.
Kharna: Din bhar nirjala vrat, shaam ko mitti ke chulhe par gud ki kheer aur roti bina namak ke banayein, puja karke prasad lein. Iske baad 36 ghante ka nirjala vrat shuru hota hai.
Sandhya Arghya: Thekua aur kasar banayein, soop aur daura mein phal aur prasad sajayein, ghaat par paani mein khade hokar doobte suraj ko kachche doodh aur jal se arghya dein.
Usha Arghya: Subah ghaat par ugte suraj ko arghya dein, Chhathi Maiya ki puja karein aur ghar aakar kachcha doodh ya prasad lekar vrat kholein (paaran).
Dhyan rakhein: Chaaron din lehsun-pyaaz band, prasad chakhein nahi, aur bimaar ya garbhvati log doctor ki salah ke bina nirjala vrat na rakhein.
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
छठ पूजा 2026 कब है?
छठ महापर्व 2026 में 13 नवंबर से 16 नवंबर तक मनाया जाएगा। मुख्य छठ पूजा यानी संध्या अर्घ्य रविवार, 15 नवंबर को है।
नहाय-खाय 2026 कब है?
नहाय-खाय शुक्रवार, 13 नवंबर 2026 को है।
खरना 2026 कब है?
खरना शनिवार, 14 नवंबर 2026 को है।
छठ पूजा 2026 में संध्या अर्घ्य का समय क्या है?
संध्या अर्घ्य 15 नवंबर को सूर्यास्त के समय दिया जाएगा — पटना में लगभग 05:00 PM, दिल्ली में लगभग 05:27 PM और कोलकाता में लगभग 04:52 PM।
उषा अर्घ्य 2026 का समय क्या है?
उषा अर्घ्य 16 नवंबर को सूर्योदय के समय दिया जाएगा — पटना में लगभग 06:07 AM, दिल्ली में लगभग 06:44 AM और कोलकाता में लगभग 05:49 AM।
षष्ठी तिथि कब से कब तक है?
षष्ठी तिथि 14 नवंबर 2026 को रात लगभग 11:23 बजे से 16 नवंबर को रात लगभग 02:00 बजे तक रहेगी।
छठ में कितने घंटे का निर्जला व्रत होता है?
खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रती लगभग 36 घंटे तक बिना अन्न-जल के रहते हैं और उषा अर्घ्य के बाद पारण करके व्रत खोलते हैं।
छठ पूजा में किसकी पूजा होती है?
छठ में सूर्य देव और छठी मैया (षष्ठी देवी) की पूजा होती है। संध्या अर्घ्य सूर्य की पत्नी प्रत्यूषा और उषा अर्घ्य सूर्य की पत्नी उषा को समर्पित माना जाता है।
छठ पूजा में डूबते सूर्य को अर्घ्य क्यों देते हैं?
छठ संसार का एकमात्र पर्व है जिसमें डूबते सूर्य की भी पूजा होती है। यह संदेश देता है कि जो डूबता है वह फिर उगता है, और जीवन के हर पड़ाव का सम्मान करना चाहिए।
छठ पूजा का मुख्य प्रसाद क्या है?
छठ का मुख्य प्रसाद ठेकुआ है, जो गेहूँ के आटे, गुड़ और घी से बनता है। इसके अलावा कसार (चावल के आटे के लड्डू), गन्ना, केला, नारियल, डाभ नींबू, सिंघाड़ा और सुथनी चढ़ाए जाते हैं।
खरना में क्या बनता है?
खरना में मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ की खीर (रसियाव) और गेहूँ के आटे की रोटी बिना नमक के बनाई जाती है।
क्या पुरुष भी छठ का व्रत रख सकते हैं?
हाँ, छठ का व्रत महिला और पुरुष दोनों रख सकते हैं। बड़ी संख्या में पुरुष भी पूरे विधि-विधान से यह व्रत करते हैं।