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शीतला अष्टमी (बसोड़ा) 2027: तारीख, पूजा मुहूर्त, विधि, बसोड़ा भोग, कथा और नियम

शीतला अष्टमी, जिसे बसोड़ा या बसौड़ा भी कहते हैं, माता शीतला की पूजा का पर्व है। होली के आठवें दिन चैत्र कृष्ण अष्टमी को मनाए जाने वाले इस पर्व पर घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता और माता को एक दिन पहले बना ठंडा भोजन अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि माता शीतला की कृपा से परिवार चेचक, खसरा, बुखार और गर्मी के रोगों से सुरक्षित रहता है। इस पेज पर 2027 की तिथि, सप्तमी की तैयारी, पूजा विधि, भोग, कथा और नियम विस्तार से दिए गए हैं।

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तारीख 30 मार्च 2027, मंगलवार
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हिंदू तिथि चैत्र कृष्ण अष्टमी (होली के आठवें दिन)
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शुभ मुहूर्त 30 मार्च, सूर्योदय से सूर्यास्त (दिल्ली लगभग 06:13 AM से 06:38 PM) | सुबह जल्दी पूजा उत्तम
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पूज्य देवता माता शीतला
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परिचय

शीतला अष्टमी की पूजा दो दिन में पूरी होती है। सप्तमी की शाम या रात को घर की साफ़-सफ़ाई करके अगले दिन का सारा भोजन — मीठे चावल, पुए, पूरी, राबड़ी, दही, बाजरे की रोटी आदि बना लिया जाता है। अष्टमी की सुबह ठंडे पानी से स्नान करके माता शीतला को यही ठंडा भोग लगाया जाता है और पूरे दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता।

नीचे सप्तमी की तैयारी, अष्टमी की पूजा विधि, भोग की पूरी सूची और ज़रूरी नियम क्रम से दिए गए हैं।

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शीतला अष्टमी (बसोड़ा) का महत्व

शीतला अष्टमी (बसोड़ा) 2027 कब है?

वर्ष 2027 में शीतला अष्टमी (बसोड़ा) मंगलवार, 30 मार्च 2027 को मनाई जाएगी। यह चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी है, जो होली के आठवें दिन आती है। इससे एक दिन पहले सोमवार, 29 मार्च 2027 को शीतला सप्तमी है, जिस दिन अगले दिन का सारा भोजन बनाया जाता है।

  • शीतला सप्तमी (भोजन बनाने का दिन): 29 मार्च 2027, सोमवार
  • शीतला अष्टमी / बसोड़ा (पूजा का दिन): 30 मार्च 2027, मंगलवार
  • अष्टमी तिथि प्रारंभ: 29 मार्च 2027, शाम लगभग 05:10 बजे
  • अष्टमी तिथि समाप्त: 30 मार्च 2027, शाम लगभग 07:39 बजे
  • पूजा मुहूर्त: 30 मार्च को सूर्योदय से सूर्यास्त तक (दिल्ली में लगभग सुबह 06:13 से शाम 06:38 तक)। परंपरा के अनुसार पूजा सुबह जल्दी, सूर्योदय के आसपास करना सबसे उत्तम माना जाता है।

कुछ परिवारों और क्षेत्रों में माता की पूजा सप्तमी (29 मार्च) को ही की जाती है — ऐसे में भोजन एक दिन पहले (28 मार्च) बनाया जाता है। अपने घर की परंपरा के अनुसार दिन चुनें।

शीतला माता कौन हैं?

माता शीतला को आरोग्य और शीतलता देने वाली देवी माना जाता है। "शीतला" का अर्थ ही है — ठंडक देने वाली। स्कंद पुराण में माता शीतला की महिमा और शीतलाष्टक स्तोत्र का वर्णन मिलता है। माता का स्वरूप इस प्रकार बताया गया है:

  • गधे (रासभ) की सवारी
  • एक हाथ में झाड़ू (मार्जनी) — स्वच्छता का प्रतीक
  • दूसरे हाथ में कलश — जिसमें शीतल जल और आरोग्य का अमृत है
  • सिर पर सूप (छाज) और साथ में नीम के पत्ते — रोग नाशक

शीतलाष्टक का यह ध्यान श्लोक प्रसिद्ध है:

वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालंकृतमस्तकाम्॥

अर्थ: गधे पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू और कलश धारण करने वाली तथा सूप से सुशोभित मस्तक वाली माता शीतला की मैं वंदना करता हूँ।

शीतला अष्टमी का महत्व

  • रोगों से रक्षा: मान्यता है कि माता शीतला की पूजा से चेचक (शीतला), खसरा, फोड़े-फुंसी, बुखार और आँखों के रोग नहीं होते। विशेषकर माताएं अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह पूजा करती हैं।
  • ऋतु परिवर्तन का संदेश: यह पर्व सर्दी के जाने और गर्मी के शुरू होने के समय आता है। परंपरा है कि बसोड़ा के बाद से बासी भोजन बंद कर दिया जाता है और गर्मियों में ताज़ा, हल्का भोजन किया जाता है। यह मौसम बदलने पर स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहने की सीख है।
  • स्वच्छता का संदेश: माता के हाथ की झाड़ू और नीम के पत्ते साफ़-सफ़ाई और रोगों से बचाव का प्रतीक हैं।
  • अग्नि को विश्राम: साल में एक दिन चूल्हा न जलाकर अग्नि देव को विश्राम देने की भी मान्यता है।

कहां-कहां मनाया जाता है

  • राजस्थान: सबसे बड़े स्तर पर। जयपुर के पास चाकसू (शील की डूंगरी) में शीतला माता का विशाल मेला लगता है।
  • हरियाणा: गुरुग्राम का शीतला माता मंदिर बहुत प्रसिद्ध है, जहां चैत्र में भारी भीड़ होती है।
  • उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, पंजाब और गुजरात में भी यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है।
  • गुजरात में "शीतला सातम" मुख्य रूप से श्रावण कृष्ण सप्तमी (जन्माष्टमी से एक दिन पहले) को मनाई जाती है।

शीतला माता की कथा

कथा 1: बुढ़िया माई और कुम्हारिन

एक बार माता शीतला ने सोचा कि चलूं, धरती पर देखूं कि कौन मेरी पूजा करता है। वे एक बुढ़िया का रूप धरकर एक गांव में आईं। गांव में चलते हुए किसी ने ऊपर से चावल का गर्म मांड (उबला पानी) फेंक दिया, जो माता पर गिर गया। उनके पूरे शरीर पर फफोले पड़ गए और जलन होने लगी। माता पूरे गांव में मदद के लिए पुकारती रहीं, पर किसी ने उनकी सहायता नहीं की।

तभी एक कुम्हारिन ने उन्हें देखा। उसने बुढ़िया को आदर से बिठाया, उन पर ठंडा जल डाला और खाने को रात की बनी ठंडी राबड़ी और दही दिया। इससे माता के शरीर को ठंडक मिली। कुम्हारिन ने उनके बिखरे बाल संवारे तो देखा कि सिर के बालों में एक आँख छिपी है। वह डर गई। तब माता ने अपना असली रूप दिखाया — गधे पर सवार, हाथ में झाड़ू और कलश लिए माता शीतला।

माता ने कहा — "जिस गांव ने मुझ पर गर्म पानी डाला, वहां सबके घर जल गए, पर तेरा घर सुरक्षित रहेगा।" कुम्हारिन ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि माता इसी गांव में निवास करें और जो भी चैत्र कृष्ण अष्टमी को ठंडा भोजन अर्पित करके उनकी पूजा करे, उसके घर में रोग और दरिद्रता न आए। माता ने वरदान दिया। तभी से बसोड़ा पर ठंडा भोग लगाने और गर्म भोजन न करने की परंपरा चली आ रही है।

कथा 2: बुढ़िया की दो बहुएं

एक गांव में एक बुढ़िया अपनी दो बहुओं के साथ रहती थी। दोनों बहुओं के छोटे-छोटे बच्चे थे। शीतला अष्टमी के दिन सास ने बहुओं से कहा कि आज ठंडा (बासी) भोजन ही करना है। पर बहुओं ने सोचा कि बासी खाने से बच्चे बीमार हो जाएंगे, इसलिए उन्होंने चुपके से ताज़ा भोजन बनाकर खा लिया। माता के नियम तोड़ने का फल यह हुआ कि दोनों बच्चों की मृत्यु हो गई। सास ने क्रोध में दोनों बहुओं को घर से निकाल दिया।

रास्ते में दोनों बहुओं को ओरी और शीतला नाम की दो बहनें मिलीं, जिनके सिर में बहुत जुएं थीं। बहुओं ने दया करके उनके सिर साफ़ किए। प्रसन्न होकर बहनों ने आशीर्वाद दिया — "तुम्हारी गोद हरी हो।" बहुओं ने रोते हुए अपने मृत बच्चे दिखाए। तब शीतला माता ने बताया कि यह उनकी भूल का परिणाम है। बहुओं ने क्षमा मांगी तो माता ने बच्चों को जीवित कर दिया। गांव लौटकर बहुओं ने सबको यह बात बताई और तभी से पूरे गांव में श्रद्धा से बसोड़ा का व्रत होने लगा।

शिक्षा: माता शीतला के नियमों का श्रद्धा से पालन करने और सेवा-भाव रखने से परिवार रोगों से सुरक्षित और सुखी रहता है।

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पूजा सामग्री

पूजा की थाली

  • शुद्ध ठंडे जल का कलश / लोटा
  • रोली, हल्दी, अक्षत (साबुत चावल)
  • मेहंदी और मौली (कलावा)
  • वस्त्र या लाल चुनरी (माता के लिए)
  • फूल और फूलों की माला
  • नीम के पत्ते
  • बड़कुल्ले (गोबर की गूलरियां) की माला — होली के समय बनी, जहां परंपरा हो
  • दक्षिणा के लिए सिक्के
  • दीपक (रुई की बत्ती और घी) — कई परिवार अष्टमी को अग्नि न जलाने के कारण दीपक नहीं जलाते, अपनी परंपरा के अनुसार चलें

बसोड़ा का ठंडा भोग (सप्तमी को बनाएं)

  • मीठे चावल (ओलिया / गुड़ वाले चावल)
  • गुलगुले / पुए (गुड़ और आटे के)
  • राबड़ी (राजस्थान में बाजरे या मक्के की छाछ वाली राबड़ी)
  • पूरी, कचौरी या बेसन की पकौड़ी
  • बाजरे की रोटी, मीठी रोटी / मीठी पूड़ी
  • दही और छाछ
  • हलवा, गेहूं की लापसी
  • लसोड़े (गूंदे) की सब्ज़ी या अचार, दाल की पकौड़ी, ठंडी आलू की सब्ज़ी
  • भिगोई हुई चना दाल या मूंग दाल
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पूजा विधि

चरण 1: सप्तमी की तैयारी (29 मार्च)

  • सप्तमी के दिन पूरे घर, विशेषकर रसोई की अच्छी तरह सफ़ाई करें।
  • शाम को सूर्यास्त के बाद या रात में अगले दिन के लिए सारा भोग और भोजन बना लें — मीठे चावल, पुए, राबड़ी, पूरी, बाजरे की रोटी आदि।
  • भोजन बनाने के बाद रसोई साफ़ करें और चूल्हे की पूजा करके उस पर रोली-हल्दी से स्वस्तिक बनाएं। अष्टमी को चूल्हा नहीं जलाया जाता।
  • भोजन को ढककर साफ़ और ठंडी जगह पर रखें।

चरण 2: अष्टमी की सुबह स्नान (30 मार्च)

  • सूर्योदय से पहले उठें और ठंडे पानी से स्नान करें — इस दिन गर्म पानी का प्रयोग नहीं किया जाता।
  • साफ़ वस्त्र पहनकर हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें — "मैं (अपना नाम) अपने परिवार और बच्चों के आरोग्य, रोगों से रक्षा और सुख-समृद्धि के लिए माता शीतला की पूजा कर रही/रहा हूँ।"

चरण 3: शीतला माता की पूजा

  • सुबह-सुबह पूजा की थाली और ठंडा भोग लेकर शीतला माता के मंदिर जाएं, या घर में माता की तस्वीर के सामने पूजा करें।
  • सबसे पहले माता को ठंडा जल अर्पित करें।
  • रोली, हल्दी और अक्षत से तिलक करें, फिर मेहंदी, मौली और वस्त्र/चुनरी अर्पित करें।
  • फूल, नीम के पत्ते और बड़कुल्ले की माला चढ़ाएं।
  • सप्तमी को बनाया हुआ ठंडा भोग — मीठे चावल, पुए, राबड़ी, दही आदि अर्पित करें।
  • माता का मंत्र जपें — ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः (11 या 108 बार)।
  • शीतलाष्टक का पाठ करें या शीतला माता की कथा (ऊपर दी गई है) पढ़ें या सुनें।
  • शीतला माता की आरती करें। जहां अग्नि वर्जित हो, वहां मन में आरती करें या कपूर के बिना आरती गाएं।

चरण 4: कलश के जल का छिड़काव

  • पूजा के बाद लोटे में बचा हुआ जल घर लाएं।
  • इस जल को घर के सभी कोनों और मुख्य द्वार पर छिड़कें — मान्यता है कि इससे घर में रोग नहीं आते।
  • थोड़ा जल परिवार के सदस्यों, विशेषकर बच्चों की आँखों पर लगाया जाता है।

चरण 5: होलिका दहन स्थल / कुम्हार को भोग

  • कई क्षेत्रों में भोग का एक भाग होलिका दहन वाले स्थान पर भी अर्पित किया जाता है।
  • कथा की कुम्हारिन की याद में कुम्हार परिवार या ज़रूरतमंदों को भोग और दक्षिणा दी जाती है। गधे को भी भोजन कराने की परंपरा है।

चरण 6: बसोड़ा प्रसाद ग्रहण करें

  • माता को भोग लगाने के बाद पूरा परिवार वही ठंडा भोजन प्रसाद के रूप में ग्रहण करता है।
  • दिन भर घर में चूल्हा न जलाएं और गर्म भोजन न बनाएं।
  • बसोड़ा के बाद से गर्मियों में बासी भोजन करना बंद कर दें।
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व्रत के नियम

✅ शीतला अष्टमी पर क्या करें

  • सप्तमी को ही अगले दिन का पूरा भोजन बना लें और रसोई साफ़ कर दें।
  • अष्टमी को सूर्योदय से पहले ठंडे पानी से स्नान करें।
  • माता को केवल ठंडा (एक दिन पहले बना) भोग लगाएं और वही प्रसाद ग्रहण करें।
  • पूजा का बचा जल पूरे घर में छिड़कें।
  • घर और आस-पास साफ़-सफ़ाई रखें — यही माता की सच्ची सेवा है।
  • ज़रूरतमंदों, कुम्हार परिवार और पशुओं को भोजन दें।

❌ शीतला अष्टमी पर क्या न करें

  • अष्टमी के दिन चूल्हा, गैस या आग न जलाएं और ताज़ा गर्म भोजन न बनाएं।
  • गर्म पानी से स्नान न करें और गर्म पेय (चाय आदि) से बचें — परंपरा अनुसार।
  • माता को गर्म या ताज़ा बना भोजन अर्पित न करें।
  • इस दिन मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज़ से दूर रहें।
  • कई क्षेत्रों में इस दिन सिलाई-कढ़ाई, बाल धोना और झाड़ू-पोछा न करने की लोक मान्यता है — अपने घर की परंपरा के अनुसार चलें।
  • किसी का अपमान या क्रोध न करें — कथा में माता का अपमान करने वालों को कष्ट मिला था।

⚕️ स्वास्थ्य से जुड़ी सावधानी

  • बसोड़ा का भोजन सप्तमी की शाम या रात को ही बनाएं, सुबह-सुबह नहीं — ताकि भोजन ज़्यादा देर न रखा रहे।
  • भोजन को ढककर ठंडी जगह रखें। गर्मी ज़्यादा हो तो दूध-दही वाली चीज़ें फ्रिज में रखें।
  • भोजन में खट्टी गंध, झाग या फफूंद दिखे तो उसे बिल्कुल न खाएं।
  • छोटे बच्चे, बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएं और बीमार व्यक्ति डॉक्टर की सलाह के अनुसार चलें। माता की भावना आरोग्य की है — स्वास्थ्य को खतरे में डालकर नियम न निभाएं।
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शीतला अष्टमी (बसोड़ा) — आरती

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शीतला अष्टमी (बसोड़ा) — चालीसा

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Hinglish

Sheetala Ashtami (Basoda) 2027 kab hai? Mangalvar, 30 March 2027. Sheetala Saptami Somvar, 29 March ko hai, jis din agle din ka saara bhojan banaya jaata hai. Ashtami tithi 29 March shaam lagbhag 05:10 se 30 March shaam lagbhag 07:39 tak.

Puja vidhi: Saptami ki raat meethe chawal, pue, raabdi, poori aur bajre ki roti bana lein. Ashtami ki subah thande paani se snaan karein, Mata Sheetala ko thanda jal, roli, haldi, mehendi, mauli, chunri aur neem ke patte chadhayein, phir thanda bhog lagayein. Mantra: "Om Hreem Shreem Sheetalaayai Namah". Bacha hua jal ghar ke kono mein chhidkein.

Niyam: Is din chulha nahi jalta, garam paani se naha nahi jaata aur garam khana nahi banta. Bimar, bujurg aur garbhvati mahilayein doctor ki salah ke anusaar chalein.

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शीतला अष्टमी (बसोड़ा) 2027 कब है?

शीतला अष्टमी (बसोड़ा) 2027 में मंगलवार, 30 मार्च को है।

शीतला सप्तमी 2027 कब है?

शीतला सप्तमी सोमवार, 29 मार्च 2027 को है। इसी दिन अगले दिन का भोजन बनाया जाता है।

अष्टमी तिथि कब से कब तक है?

चैत्र कृष्ण अष्टमी 29 मार्च 2027 शाम लगभग 05:10 से 30 मार्च शाम लगभग 07:39 तक है।

शीतला अष्टमी पूजा का मुहूर्त क्या है?

30 मार्च को सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा की जा सकती है, पर सुबह जल्दी सूर्योदय के आसपास पूजा करना सबसे उत्तम माना जाता है।

बसोड़ा क्यों कहते हैं?

बसोड़ा या बसौड़ा शब्द "बासी" से बना है, क्योंकि इस दिन एक दिन पहले बना बासी (ठंडा) भोजन माता को अर्पित करके ग्रहण किया जाता है।

शीतला अष्टमी पर चूल्हा क्यों नहीं जलाते?

माता शीतला शीतलता की देवी हैं, इसलिए उन्हें ठंडा भोग प्रिय है। कथा के अनुसार गर्म पानी से माता को कष्ट हुआ था, इसलिए इस दिन अग्नि नहीं जलाई जाती।

शीतला माता को क्या भोग लगाते हैं?

मीठे चावल (ओलिया), गुलगुले या पुए, राबड़ी, दही, पूरी, बाजरे की रोटी और लसोड़े की सब्ज़ी जैसे एक दिन पहले बने ठंडे पकवान।

शीतला माता का वाहन क्या है?

शीतला माता का वाहन गधा (रासभ) है। उनके हाथों में झाड़ू और कलश होता है तथा सिर पर सूप होता है।

शीतला माता का मंत्र क्या है?

ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः। साथ में शीतलाष्टक का पाठ भी किया जाता है।

शीतला माता की पूजा क्यों की जाती है?

मान्यता है कि माता शीतला की पूजा से परिवार और विशेषकर बच्चे चेचक, खसरा, बुखार, फोड़े-फुंसी और आँखों के रोगों से सुरक्षित रहते हैं।

क्या शीतला सप्तमी को भी पूजा कर सकते हैं?

हां, कुछ परिवारों और क्षेत्रों में माता की पूजा सप्तमी को की जाती है। ऐसे में भोजन उससे एक दिन पहले बनाया जाता है।

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