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सोमवार प्रदोष व्रत कथा | सौम्य प्रदोष पूजा विधि

सोमवार प्रदोष व्रत की यह पावन कथा ऋण मुक्ति और ग्रह दशा निवारण के लिए अत्यंत प्रभावशाली है। त्रयोदशी तिथि पर सोमवार के दिन यह व्रत करने से भगवान शिव-पार्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस कथा में एक विधवा ब्राह्मणी और राजकुमार के जीवन परिवर्तन का वर्णन है। प्रदोष व्रत के प्रभाव से राजकुमार ने अपना खोया राज्य पुनः प्राप्त किया। जो भी श्रद्धापूर्वक सौम्य प्रदोष व्रत करता है, उसके सभी कष्ट दूर होते हैं और ग्रह दशा का प्रभाव समाप्त होता है।

Vrat Katha धार्मिक कथाएँ (Religious Stories) पूजा विधि (Puja Vidhi) प्रदोष व्रत कथा व्रत एवं उपवास (Fasting & Vrat)
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परिचय

सोमवार प्रदोष व्रत की यह दिव्य कथा ऋण मुक्ति, ग्रह दशा निवारण और जीवन के कष्टों से छुटकारा पाने का सरल मार्ग बताती है। जब त्रयोदशी तिथि पर सोमवार का दिन आता है, उस दिन भगवान शिव-पार्वती की पूजा करने से विशेष फल प्राप्त होता है। यह व्रत करने से ग्रहों की खराब दशा समाप्त होती है, ऋण से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-शांति आती है। जो भी व्यक्ति विधि-विधान से इस व्रत को करता है, भगवान शंकर उसके सभी संकट दूर करते हैं।

This divine Monday Pradosh Vrat Katha shows a simple path to freedom from debt, planetary afflictions, and life's troubles. When Monday falls on Trayodashi tithi, worshipping Lord Shiva-Parvati brings special benefits. This fast removes bad planetary periods, provides freedom from debt, and brings peace in life. Whoever observes this fast with proper rituals, Lord Shankar removes all their difficulties.

सोमवार प्रदोष व्रत कथा | सौम्य प्रदोष पूजा विधि

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🙏 सोमवार प्रदोष व्रत कथा 🙏

सूत जी बोले - "हे ऋषिवरों! अब मैं सोम त्रयोदशी व्रत का महात्म्य वर्णन करता हूं। इस व्रत के करने से शिव-पार्वती प्रसन्न होते हैं।"

**व्रत विधि:**

"प्रातः स्नान कर शुद्ध-पवित्र हो शिव-पार्वती का ध्यान करके पूजन करें और अर्घ्य दें। 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का १०८ बार जाप करें। फिर स्तुति करें - 'हे प्रभो! मैं इस दुःख सागर में गोते खाता हुआ ऋण भार से दबा, ग्रह दशा से ग्रसित हूं। हे दयालु! मेरी रक्षा कीजिए।'"

**कथा:**

शौनकादि ऋषि बोले - "हे महामते! यह व्रत किसने किया और क्या फल पाया?"

सूत जी बोले - "एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। कोई भी उसका सहारा नहीं था। इसलिए वह सुबह होते ही अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल जाती। जो भिक्षा मिलती उसी से अपना और पुत्र का पेट भरती थी।"

"एक दिन ब्राह्मणी भीख मांगकर लौट रही थी तो उसे एक लड़का मिला। उसकी दशा बहुत खराब थी। ब्राह्मणी को दया आई। वह उसे अपने साथ घर ले आई।"

"वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था। पड़ोसी राजा ने उसके पिता पर आक्रमण करके राज्य पर कब्जा कर लिया था। इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था। ब्राह्मणी के घर पर वह ब्राह्मण कुमार के साथ रहकर पलने लगा।"

"एक दिन ब्राह्मण कुमार और राजकुमार खेल रहे थे। उन्हें वहां गंधर्व कन्याओं ने देख लिया। वे राजकुमार पर मोहित हो गईं। ब्राह्मण कुमार तो घर लौट आया लेकिन राजकुमार अंशुमति नामक गंधर्व कन्या से बात करता रह गया।"

"दूसरे दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने ले आई। उन्हें भी राजकुमार पसंद आया। कुछ दिनों बाद भगवान शंकर ने स्वप्न में आदेश दिया कि वे अपनी कन्या का विवाह राजकुमार से कर दें। उन्होंने अंशुमति का विवाह राजकुमार से कर दिया।"

"ब्राह्मणी को ऋषियों ने आज्ञा दी थी कि वह सदा प्रदोष व्रत करे। उसके व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेनाओं की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को मार भगाया। उसने अपने पिता के राज्य को पुनः प्राप्त कर वहां आनंदपूर्वक रहने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मण कुमार को अपना प्रधानमंत्री बनाया।"

**निष्कर्ष:**

"राजकुमार और ब्राह्मण कुमार के दिन जिस प्रकार ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत की कृपा से फिरे, उसी प्रकार भगवान शंकर अपने दूसरे भक्तों के दिन भी फेरते हैं। तभी से प्रदोष व्रत का संसार में बड़ा महत्व है।"

🙏 ॐ नमः शिवाय 🙏

📌 PUJA VIDHI:
- प्रातः स्नान करें
- शिव-पार्वती का ध्यान करें
- ॐ नमः शिवाय १०८ बार जप करें
- अर्घ्य दें
- एक समय भोजन करें

📌 व्रत के लाभ:
- ऋण मुक्ति
- ग्रह दशा निवारण
- कष्टों से छुटकारा
- राज्य प्राप्ति

 

**प्रदोष का अर्थ:**

'प्रदोष' शब्द का अर्थ है सूर्यास्त के उपरांत और रात्रि प्रारंभ होने से पूर्व का समय। शास्त्रों में कहा गया है कि यह समय भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत उत्तम है। इसी काल में भगवान शंकर का पूजन करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

**व्रत की विधि:**

त्रयोदशी तिथि के दिन व्रती को संपूर्ण दिन निराहार रहना चाहिए। सायंकाल जब सूर्यास्त में तीन घड़ी का समय शेष हो, तब स्नान आदि से निवृत्त होकर श्वेत वस्त्र धारण करें। तत्पश्चात संध्यावंदन करने के उपरांत शिवजी की पूजा आरंभ करें।

पूजा स्थल को स्वच्छ जल से धोकर वहां मंडप बनाएं। पांच रंगों के पुष्पों से कमल की आकृति बनाकर कुश का आसन बिछाएं। आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। इसके पश्चात भगवान महादेव का ध्यान करें।

**ध्यान स्वरूप:**

करोड़ों चंद्रमाओं के समान कांतियुक्त, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्र धारण करने वाले, पिंगल वर्ण की जटाएं धारण किए हुए, नीलकंठ, अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, वरद हस्त, त्रिशूलधारी, सर्पों के कुंडल पहने हुए, व्याघ्र चर्म धारण किए हुए, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए।

**उद्यापन की विधि:**

प्रातःकाल स्नान आदि कार्यों से निवृत्त होकर रंगीन वस्त्रों से मंडप सजाएं। फिर उस मंडप में शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करके विधिपूर्वक पूजन करें। तदुपरांत शिव-पार्वती के निमित्त खीर से अग्नि में हवन करना चाहिए।

हवन के समय 'ॐ उमा सहित शिवाय नमः' मंत्र से १०८ बार आहुति दें। इसी प्रकार 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र के उच्चारण से भगवान शंकर के निमित्त आहुति प्रदान करें। हवन समाप्ति पर किसी धार्मिक व्यक्ति को सामर्थ्य अनुसार दान दें।

तदुपरांत ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा से संतुष्ट करें। व्रत पूर्ण हुआ, ऐसा वाक्य ब्राह्मणों से कहलवाएं। ब्राह्मणों की अनुमति प्राप्त कर अपने परिजनों के साथ भगवान शंकर का स्मरण करते हुए भोजन ग्रहण करें।

इस प्रकार उद्यापन करने से व्रती को पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति होती है तथा आरोग्य लाभ होता है। इसके अतिरिक्त शत्रुओं पर विजय मिलती है एवं समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। यह स्कंद पुराण में वर्णित है।

**त्रयोदशी व्रत का महत्व:**

त्रयोदशी अर्थात प्रदोष व्रत करने वाला मनुष्य सदैव सुखी रहता है। इस व्रत के प्रभाव से समस्त पापों का नाश हो जाता है। इस व्रत को करने से विधवा स्त्रियों को अधर्म से विरक्ति होती है और सुहागिन स्त्रियों का सुहाग सदा अटल रहता है। बंदी को कारागार से मुक्ति मिलती है।

जो स्त्री-पुरुष जिस कामना से यह व्रत करते हैं, उनकी समस्त कामनाएं कैलाशपति भगवान शंकर पूर्ण करते हैं। सूत जी कहते हैं कि त्रयोदशी व्रत करने वाले को सौ गायों के दान का फल प्राप्त होता है।

इस व्रत को जो विधि-विधान और तन-मन-धन से करता है, उसके समस्त दुख दूर हो जाते हैं। सभी स्त्रियों को ग्यारह त्रयोदशी या संपूर्ण वर्ष की २६ त्रयोदशी पूर्ण करने के उपरांत उद्यापन करना चाहिए।

**प्रदोष व्रत में वार का महत्व:**

त्रयोदशी तिथि पर जो भी वार पड़ता है, उसी दिन के अनुसार व्रत करना चाहिए तथा उसी दिन की कथा पढ़नी या सुननी चाहिए। विशेष रूप से रवि, सोम और शनि प्रदोष व्रत अवश्य करने चाहिए। इन सभी से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।

**विभिन्न वारों के प्रदोष व्रत:**

१. **रविवार प्रदोष व्रत** - दीर्घायु और आरोग्यता प्राप्ति के लिए रवि प्रदोष व्रत करना चाहिए।

२. **सोमवार प्रदोष व्रत** - ग्रह दशा निवारण की कामना हेतु सोम प्रदोष व्रत करें।

३. **मंगलवार प्रदोष व्रत** - रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य प्राप्ति हेतु मंगल प्रदोष व्रत करें।

४. **बुधवार प्रदोष व्रत** - सर्व कामना सिद्धि के लिए बुध प्रदोष व्रत करें।

५. **बृहस्पतिवार प्रदोष व्रत** - शत्रु विनाश के लिए गुरु प्रदोष व्रत करें।

६. **शुक्रवार प्रदोष व्रत** - सौभाग्य और स्त्री समृद्धि के लिए शुक्र प्रदोष व्रत करें।

७. **शनिवार प्रदोष व्रत** - खोया हुआ राज्य एवं पद प्राप्ति की कामना हेतु शनि प्रदोष व्रत करें।

**व्रत का फल:**

प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

• सभी पापों से मुक्ति
• धन-संपत्ति की प्राप्ति
• संतान सुख
• आरोग्य लाभ
• शत्रुओं पर विजय
• मनोकामना पूर्ति
• कारागार से मुक्ति
• सुहाग की स्थिरता
• राज्य और पद की प्राप्ति

**महत्वपूर्ण निर्देश:**

- व्रत के दिन निराहार रहें
- प्रदोष काल में पूजा करें
- श्वेत वस्त्र धारण करें
- बेल पत्र अवश्य चढ़ाएं
- ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करें
- ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा दें
- कथा का श्रवण अवश्य करें