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संतोषी माता व्रत कथा | शुक्रवार व्रत विधि और पूजा

संतोषी माता व्रत की यह पावन कथा शुक्रवार को किए जाने वाले सबसे प्रभावशाली व्रतों में से एक है। यह कथा एक निर्धन और उपेक्षित स्त्री की है जिसने संतोषी माता का व्रत रखकर अपने जीवन को पूरी तरह बदल दिया। उसका पति परदेश में था और घर में सभी उसे कष्ट देते थे। जब उसने श्रद्धा और भक्ति से संतोषी माता का व्रत करना शुरू किया, तो माता की कृपा से उसके पति घर लौट आए, घर में धन-संपत्ति आई और उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह कथा सिखाती है कि सच्ची निष्ठा और संतोष से संतोषी माता सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। जो भी स्त्री-पुरुष शुक्रवार को व्रत रखकर इस कथा को सुनते हैं, उनके जीवन में सुख-समृद्धि, संतान सुख, पति की प्राप्ति और सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है।

Vrat Katha धार्मिक कथाएँ (Religious Stories) पूजा विधि (Puja Vidhi) व्रत एवं उपवास (Fasting & Vrat)
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परिचय

संतोषी माता व्रत की यह दिव्य कथा शुक्रवार के दिन विशेष रूप से सुनी जाती है। यह कथा एक साधारण स्त्री की है जो अपने परिवार में उपेक्षित थी और जिसका पति परदेश में रहता था। संतोषी माता के व्रत को रखने से उसके जीवन में अद्भुत परिवर्तन आया। माता की असीम कृपा से उसके पति घर लौटे, घर में धन-वैभव आया और उसे संतान सुख भी प्राप्त हुआ। यह व्रत अत्यंत सरल है - गुड़ और चने का प्रसाद, श्रद्धापूर्वक व्रत और कथा श्रवण। जो भी इस व्रत को विधि-विधान से करता है, संतोषी माता उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। यह व्रत विशेष रूप से निर्धनता दूर करने, पति की प्राप्ति, संतान सुख, मन की शांति और घर में सुख-समृद्धि लाने के लिए किया जाता है।

This divine story of Santoshi Mata Vrat is specially listened to on Fridays. This tale is about an ordinary woman who was neglected by her family and whose husband lived in a foreign land. By observing Santoshi Mata's fast, miraculous changes came in her life. With Mother's infinite grace, her husband returned home, wealth came to the house, and she was blessed with a child. This fast is very simple - offering of jaggery and gram, devotional fasting, and listening to the story. Whoever observes this fast with proper rituals, Santoshi Mata fulfills all their wishes. This fast is especially done to remove poverty, obtain a husband, get blessed with children, attain peace of mind, and bring happiness and prosperity to the home.

संतोषी माता व्रत कथा | शुक्रवार व्रत विधि और पूजा

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🙏 संतोषी माता व्रत कथा 🙏

**कथा का आरंभ:**

प्राचीन समय की बात है। एक गांव में एक वृद्ध महिला रहती थी जिसके सात पुत्र थे। छः पुत्र कमाने वाले थे और एक पुत्र निकम्मा था। माता छहों पुत्रों का जूठा सातवें पुत्र को देती थी।

एक दिन सातवां पुत्र अपनी पत्नी से बोला - "देखो, मेरी माता का मुझ पर कितना प्रेम है।" पत्नी बोली - "क्यों नहीं, सबका बचा हुआ जूठा तुम्हें खिलाती है।" वह बोला - "जब तक आंखों से न देखूं, मान नहीं सकता।" पत्नी हंसकर बोली - "देख लोगे तब मानोगे?"

कुछ समय बाद एक बड़ा त्योहार आया। घर में सात प्रकार के भोजन और चूरमा के लड्डू बने। वह पत्नी की बात को परखने के लिए सिरदर्द का बहाना बनाकर पतला कपड़ा ओढ़कर रसोई में सो गया और सब देखता रहा।

छहों भाई भोजन करने आए। उसने देखा, माता ने उनके लिए सुंदर आसन बिछाए, सात प्रकार की रसोई परोसी और आग्रह करके उन्हें भोजन कराती रही। छहों भाई भोजन करके उठ गए। तब माता ने उनकी थालियों से लड्डुओं के टुकड़े उठाए और एक लड्डू बनाया। जूठन साफ कर माता ने उसे पुकारा - "उठ बेटा! तेरे भाइयों ने भोजन कर लिया, तू भी भोजन कर ले।"

उसने कहा - "माँ! मुझे भोजन नहीं करना। मैं परदेश जा रहा हूं।" माता ने कहा - "कल जाना हो तो आज ही जा।" वह घर से निकल गया।

**पत्नी से विदाई:**

चलते समय उसे पत्नी की याद आई। वह गौशाला में कंडे थाप रही थी। वहां जाकर वह बोला - "मेरे पास तो कुछ नहीं है। यह अंगूठी है, ले लो और अपनी कोई निशानी मुझे दे दो।" वह बोली - "मेरे पास क्या है? यह गोबर भरा हाथ है।" यह कहकर पत्नी ने उसकी पीठ पर गोबर के हाथ की छाप लगा दी।

वह चल दिया। चलते-चलते दूर देश पहुंचा। वहां एक साहूकार की दुकान थी। उसने नौकरी मांगी। साहूकार को नौकर की जरूरत थी। उसने कहा - "काम देखकर तनख्वाह मिलेगी।"

उसे नौकरी मिल गई। वह दिन-रात मेहनत करने लगा। कुछ समय में दुकान का सारा काम करने लगा। उसकी लगन, परिश्रम और ईमानदारी से साहूकार प्रभावित हुआ। तीन महीने में ही साहूकार ने उसे मुनाफे में साझीदार बना लिया। बारह वर्ष में वह नगर का नामी सेठ बन गया।

**पत्नी का कष्ट:**

इधर उसकी पत्नी पर बहुत कष्ट आया। सास-ससुर उसे दुख देने लगे। गृहस्थी का काम करवाकर उसे लकड़ी लेने जंगल भेजते। घर की रोटियों के आटे से जो भूसी निकलती, उसकी रोटी बनाकर दी जाती और फूटे नारियल के खोल में पानी दिया जाता।

एक दिन वह जंगल में लकड़ी लेने जा रही थी तो उसे बहुत सी स्त्रियां संतोषी माता का व्रत करती दिखाईं। वह खड़ी होकर पूछने लगी - "बहनों, यह तुम किस देवी का व्रत करती हो? इसके करने से क्या फल होता है? इसकी विधि क्या है?"

एक स्त्री बोली - "सुनो, यह संतोषी माता का व्रत है। इसके करने से निर्धनता का नाश होता है, लक्ष्मी आती है, मन की चिंताएं दूर होती हैं। मन को शांति मिलती है, निःसंतान को पुत्र मिलता है, परदेश गया पति शीघ्र लौटता है, कुंवारी कन्या को मनपसंद वर मिलता है, चलता मुकदमा समाप्त होता है, कलह-क्लेश की निवृत्ति होती है, घर में धन आता है। संतोषी माता की कृपा से सब कुछ पूरा होता है।"

**व्रत की विधि:**

वह पूछने लगी - "यह व्रत कैसे किया जाता है?" स्त्री बोली - "श्रद्धा और प्रेम से जितना भी बन सके प्रसाद लेना। गुड़ और चना लें। हर शुक्रवार को निराहार रहकर कथा कहना-सुनना। बीच में व्रत न टूटे। लगातार नियम पालन करना। सुनने वाला कोई न मिले तो घी का दीपक जलाकर उसके आगे जल रखकर कथा कहना। जब तक कार्य सिद्ध न हो, नियम पालन करना और कार्य सिद्ध होने पर व्रत का उद्यापन करना।"

"उद्यापन में अढ़ाई सेर आटे का खाजा, खीर और चने का साग बनाना। आठ बच्चों को भोजन कराना। यथाशक्ति दक्षिणा देना। ध्यान रखना, उस दिन घर में कोई खटाई न खाए।"

**व्रत का प्रभाव:**

यह सुनकर वह चल दी। रास्ते में लकड़ी बेचकर उन पैसों से गुड़-चना लेकर माता के व्रत की तैयारी की। संतोषी माता के मंदिर में जाकर विनती करने लगी - "माँ! मैं दीन हूं, मूर्ख हूं। व्रत के नियम नहीं जानती। मैं बहुत दुखी हूं। मेरा दुख दूर करो। मैं तेरी शरण में हूं।"

माता को दया आई। एक शुक्रवार बीता तो दूसरे शुक्रवार को उसके पति का पत्र आया और तीसरे शुक्रवार को पैसा आ पहुंचा।

यह देखकर जेठानी मुंह सिकोड़ने लगी। लड़के ताने देने लगे। बेचारी सरलता से कहती - "भैया, पत्र आए, रुपया आए तो सबके लिए अच्छा है।"

ऐसा कहकर आंखों में आंसू भरकर संतोषी माता के मंदिर में जाकर रोने लगी - "माँ, मैंने तुमसे पैसा नहीं मांगा। मुझे पैसे से क्या काम? मुझे तो अपने सुहाग से काम है। मैं अपने स्वामी के दर्शन मांगती हूं।"

माता ने प्रसन्न होकर कहा - "जा बेटी! तेरा स्वामी जल्दी ही आएगा।"

**पति की वापसी:**

संतोषी माता ने उस पुरुष को स्वप्न में समझाया - "पुत्र! तेरी पत्नी कष्ट उठा रही है।" वह बोला - "हां माता! यह मुझे भी पता है, परंतु कैसे जाऊं? लेन-देन का हिसाब है।"

माता बोलीं - "सवेरे नहा-धोकर संतोषी माता का नाम ले, घी का दीपक जला, दंडवत कर और दुकान पर जा बैठ। तेरा लेन-देन चुक जाएगा, माल बिक जाएगा, शाम तक धन का ढेर लग जाएगा।"

अगले दिन उसने वैसा ही किया। संतोषी माता को प्रणाम किया, घी का दीपक जलाकर दुकान पर बैठा। शाम तक धन का ढेर लग गया।

मन में संतोषी माता का नाम लेकर प्रसन्न हो, घर जाने के लिए गहना, कपड़ा व सामान खरीदकर अपने घर को रवाना हुआ।

**माता का चमत्कार:**

उधर पत्नी जंगल से लौटते समय थककर संतोषी माता के मंदिर पर विश्राम करने बैठी। उसने माता से पूछा - "हे माता! यह धूल कैसी उड़ रही है?"

माता ने कहा - "पुत्री, तेरा पति आ रहा है। अब तू लकड़ियों के तीन बोझ बना। एक नदी के किनारे रख, दूसरा मेरे मंदिर पर और तीसरा अपने सिर पर रख। तेरे पति को लकड़ी देखकर रुकने का मन होगा। तू लकड़ी का बोझ उठाकर जाना और बीच चौक में गड्डा डालकर तीन आवाजें लगाना - 'लो सासूजी, लकड़ी का गट्ठा लो, भूसी की रोटी दो, नारियल के खोपरे में पानी दो! आज कौन मेहमान आया है?'"

वह प्रसन्न मन से लकड़ियों के तीन बोझ बनाकर लाई। एक नदी के तट पर, दूसरा माता के मंदिर पर रखा। मुसाफिर वहां आकर रुका। लकड़ी देखकर उसने वहीं विश्राम किया और भोजन बनाकर खाया।

फिर वह अपने गांव आ गया। उसी समय पत्नी सिर पर लकड़ी का गड्डा लिए आई और जोर से तीन आवाजें दीं - "लो सासूजी, लकड़ी का गड्डा लो, भूसी की रोटी दो, नारियल के खोपरे में पानी दो। आज कौन मेहमान आया है?"

सास ने कहा - "बहू, तू ऐसा क्यों कहती है? तेरा मालिक ही तो आया है।"

पति ने पत्नी की आवाज सुनी और उसके हाथ में अंगूठी देखकर पहचान लिया। उसने माता से पूछा - "माँ, यह कौन है?" माता बोली - "बेटा, तेरी पत्नी है।"

उसने दूसरे घर में रहने का निर्णय लिया। दूसरे घर को खोलकर सारा सामान जमाया। एक ही दिन में वहां राजा के महल जैसा ठाट-बाट बन गया।

**व्रत का उद्यापन:**

अगला शुक्रवार आया। पत्नी ने कहा - "मुझे संतोषी माता का उद्यापन करना है।" पति बोला - "बहुत अच्छा, करो।"

वह उद्यापन की तैयारी करने लगी। जेठ के लड़कों को भोजन के लिए बुलाया। परंतु जेठानी ने उन्हें सिखाया - "भोजन के समय खटाई मांगना।"

लड़के भोजन करने आए। खीर पेट भरकर खाई। फिर कहने लगे - "हमें खटाई खाने को दो।" लड़के उठ खड़े हुए। बोले - "पैसे दो।"

भोली पत्नी ने उन्हें पैसे दे दिए। लड़कों ने बाजार जाकर इमली खरीदी और खाई।

यह देखकर माता ने कोप किया। राजा के सिपाही उसके पति को पकड़कर ले गए।

पत्नी संतोषी माता के मंदिर में गई और कहने लगी - "माता! तुमने यह क्या किया?" माता बोली - "पुत्री! तूने मेरा व्रत भंग किया है।" वह बोली - "माता, मुझसे भूल हो गई। क्षमा करो।"

माता बोली - "जा, तेरा पति रास्ते में ही आता मिलेगा।" वह बाहर आई तो पति आता हुआ मिला। उसने पूछा - "कहां गए थे?" वह बोला - "धन का कर राजा को भरने गया था।"

**दूसरा उद्यापन:**

फिर अगला शुक्रवार आया। पत्नी ने फिर उद्यापन की तैयारी की। जेठ के लड़कों ने फिर खटाई मांगी। पत्नी बोली - "खटाई नहीं मिलेगी। खाना हो तो खाओ।"

उनके चले जाने पर उसने ब्राह्मणों के लड़के बुलाकर भोजन कराया। दक्षिणा की जगह उन्हें एक-एक फल दिया।

संतोषी माता प्रसन्न हो गईं। माता की कृपा से नौ माह बाद उसे चंद्रमा के समान एक सुंदर पुत्र प्राप्त हुआ।

पुत्र को लेकर वह प्रतिदिन संतोषी माता के मंदिर जाने लगी। माता ने सोचा - "यह रोज आती है, आज मैं ही इसके घर चलूं।"

माता ने भयानक रूप बनाया। गुड़ और चने से सना मुख, ऊपर से मुंड के समान होंठ, उस पर मक्खियां भिनभिना रहीं।

दहलीज में पैर रखते ही सास चिल्लाई - "देखो! कोई चुड़ैल आ रही है। इसे भगाओ।"

पत्नी प्रसन्न हो उठी - "आज मेरी माता आई हैं।" यह कहकर बच्चे को गोद से उतार दिया।

माता के प्रताप से जहां देखो वहां लड़के ही लड़के नजर आने लगे। पत्नी बोली - "माँ जी, यह वही संतोषी माता हैं जिनका मैं व्रत करती हूं।"

उसने घर के सारे दरवाजे खोल दिए। सबने माता के चरण पकड़ लिए और विनती की - "हे माता! हम मूर्ख हैं। तुम्हारे व्रत की विधि नहीं जानते। हमसे अपराध हुआ। क्षमा करो।"

संतोषी माता प्रसन्न हुईं। सास कहने लगी - "हे संतोषी माता! आपने जैसा फल दिया, वैसा सबको देना। जो यह कथा सुने या पढ़े, उसका मनोरथ पूर्ण हो।"

**व्रत का महत्व:**

जो स्त्री-पुरुष श्रद्धापूर्वक संतोषी माता का व्रत करते हैं और कथा सुनते हैं, संतोषी माता उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।

🙏 जय संतोषी माता 🙏

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📌 PUJA VIDHI (व्रत विधि):

**संतोषी माता व्रत कैसे करें:**

1. **समय:** शुक्रवार को व्रत रखें।

2. **निराहार:** पूरे दिन निराहार रहें (कुछ न खाएं)।

3. **प्रसाद सामग्री:** गुड़ और चना (भुना हुआ)।

4. **पूजा विधि:**
   - सुबह स्नान करके संतोषी माता की पूजा करें
   - घी का दीपक जलाएं
   - गुड़ और चने का प्रसाद चढ़ाएं
   - संतोषी माता की कथा पढ़ें या सुनें
   - यदि सुनने वाला कोई न हो तो घी का दीपक और जल का पात्र रखकर कथा पढ़ें

5. **नियम:**
   - लगातार व्रत रखें, बीच में न टूटे
   - कार्य सिद्ध होने तक व्रत जारी रखें
   - व्रत के दिन खटाई बिल्कुल न खाएं

6. **उद्यापन:**
   - कार्य सिद्ध होने पर उद्यापन करें
   - अढ़ाई सेर आटे का खाजा बनाएं
   - खीर बनाएं
   - चने का साग बनाएं
   - आठ बच्चों को भोजन कराएं
   - यथाशक्ति दक्षिणा दें
   - उद्यापन के दिन घर में कोई खटाई न खाए

**व्रत के लाभ:**
- निर्धनता का नाश
- धन-संपत्ति की प्राप्ति
- परदेश गए पति की वापसी
- संतान सुख
- कन्याओं को मनपसंद वर
- मुकदमे का समाधान
- कलह-क्लेश की समाप्ति
- मन की शांति और संतोष