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रविवार प्रदोष व्रत कथा | रवि प्रदोष पूजा विधि

रविवार प्रदोष व्रत की यह पवित्र कथा भगवान शिव की कृपा से दीर्घायु और स्वास्थ्य प्राप्ति का मार्ग बताती है। त्रयोदशी तिथि पर रविवार के दिन यह व्रत करने से आयु में वृद्धि होती है, रोग दूर होते हैं और संतान सुख प्राप्त होता है। इस कथा में एक निर्धन ब्राह्मण के पुत्र की कहानी है जो प्रदोष व्रत के प्रभाव से कारावास से मुक्त हुआ और धन-संपत्ति प्राप्त की। जो भी श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करता है, भगवान शंकर उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

Vrat Katha धार्मिक कथाएँ (Religious Stories) पूजा विधि (Puja Vidhi) प्रदोष व्रत कथा व्रत एवं उपवास (Fasting & Vrat)
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परिचय

रविवार प्रदोष व्रत की यह दिव्य कथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के सबसे प्रभावशाली व्रतों में से एक है। त्रयोदशी तिथि पर जब रविवार का दिन आता है, उस दिन यह व्रत करने से दीर्घायु, आरोग्यता और संतान सुख की प्राप्ति होती है। प्रदोष का अर्थ है सूर्यास्त के बाद और रात्रि से पूर्व का समय। इसी समय भगवान शिव की पूजा करने से विशेष फल मिलता है। जो भी व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से इस व्रत को करता है, भगवान शंकर उसके सभी कष्ट दूर करते हैं और मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

This divine Sunday Pradosh Vrat Katha is one of the most effective fasts to please Lord Shiva. When Sunday falls on Trayodashi tithi, observing this fast brings longevity, good health, and children's happiness. Pradosh means the time after sunset and before night. Worshipping Lord Shiva during this time brings special benefits. Whoever observes this fast with devotion, Lord Shankar removes all their troubles and grants desired fruits.

रविवार प्रदोष व्रत कथा | रवि प्रदोष पूजा विधि

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🙏 रविवार प्रदोष व्रत कथा 🙏

**कथा का आरंभ:**

प्राचीन समय की बात है। एक समय सर्व प्राणियों के कल्याणार्थ परम पावन गंगा के तट पर ऋषि समाज द्वारा विशाल गोष्ठी आयोजित की गई। विद्वान महर्षियों की सभा में व्यास जी के परम शिष्य सूत जी महाराज हरि कीर्तन करते हुए पधारे।

सूत जी को देखते ही शौनकादि अट्ठासी हजार ऋषि-मुनियों ने खड़े होकर प्रणाम किया। महाज्ञानी सूत जी ने भक्तिभाव से ऋषियों को आशीर्वाद दिया। सभी आसनों पर विराजमान हो गए।

मुनिगण विनीत भाव से पूछने लगे - "हे परम दयालु! कलिकाल में शंकर की भक्ति किस आराधना द्वारा प्राप्त होगी? कृपया हमें बताएं। कलियुग के प्राणी पाप कर्म में रत रहकर वेद-शास्त्रों से विमुख रहेंगे। दीनजन अनेक संकटों से पीड़ित रहेंगे।"

"हे मुनिश्रेष्ठ! कलिकाल में सत्कर्म की ओर किसी की रुचि नहीं होगी। जब पुण्य क्षीण होंगे तो मनुष्य की बुद्धि असत्कर्मों की ओर प्रेरित होगी। ऐसा कौन सा उत्तम व्रत है जिससे मनवांछित फल की प्राप्ति हो? कृपया बताएं।"

दयालु हृदय सूत जी बोले - "हे श्रेष्ठ मुनियों! आप धन्यवाद के पात्र हैं। आपके विचार सराहनीय हैं। आपके हृदय में सदा परहित की भावना रहती है। सुनो, मैं उस व्रत को कहता हूं जिससे सब पाप नष्ट हो जाते हैं।"

"धन वृद्धिकारक, दुःख विनाशक, सुख प्रदान करने वाला, संतान देने वाला, मनवांछित फल देने वाला यह व्रत मैं सुनाता हूं। यह व्रत भगवान शंकर ने सती जी को सुनाया था और मेरे गुरु जी ने मुझे सुनाया था।"

**व्रत की विधि:**

सूत जी बोले - "आयु वृद्धि और स्वास्थ्य लाभ हेतु त्रयोदशी का व्रत करें। विधि इस प्रकार है - प्रातः स्नान कर निराहार रहकर शिव ध्यान में मग्न हों। शिव मंदिर जाकर शंकर की पूजा करें।"

"पूजा के बाद अर्ध पुण्ड या त्रिपुण्ड तिलक धारण करें। बेल पत्र चढ़ाएं। धूप, दीप, अक्षत से पूजा करें। ऋतु फल चढ़ाएं। 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का रुद्राक्ष माला से जप करें। ब्राह्मण को भोजन कराएं और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा दें।"

"मौन व्रत धारण करें। व्रती को सत्य भाषण आवश्यक है। हवन आहुति भी देनी चाहिए। मंत्र 'ॐ ह्रीं क्लीं नमः शिवाय स्वाहा' से आहुति दें। व्रती पृथ्वी पर शयन करें, एक बार भोजन करें। श्रावण मास में इसका विशेष महत्व है।"

**कथा:**

शौनकादि ऋषि बोले - "हे पूज्यवर! आपने यह व्रत परम मंगलप्रद बताया। कृपया बताएं कि यह व्रत किसने किया और क्या फल प्राप्त हुआ?"

सूत जी बोले - "एक गांव में अत्यंत दीन ब्राह्मण निवास करता था। उसकी साध्वी स्त्री प्रदोष व्रत किया करती थी। उनके घर एक पुत्र रत्न था।"

"एक समय वह पुत्र गंगा स्नान करने गया। दुर्भाग्यवश मार्ग में चोरों ने उसे घेर लिया और कहा - 'हम तुझे मारेंगे, नहीं तो अपने पिता का गुप्त धन बता दे।'"

"बालक दीनभाव से बोला - 'हे बंधुओं! हम अत्यंत दुखी-दीन हैं। हमारे पास धन कहां है?' चोर फिर बोले - 'तेरी पोटली में क्या है?' बालक ने निःसंकोच उत्तर दिया - 'मेरी माता ने रोटी बनाकर बांध दी है।'"

"दूसरा चोर बोला - 'यह तो अति दीन है, इसे छोड़ दो।' बालक वहां से चल दिया और एक नगर में पहुंचा। नगर के पास बरगद का पेड़ था। बालक थककर वहां बैठ गया और वृक्ष की छाया में सो गया।"

"उस नगर के सिपाही चोरों की खोज कर रहे थे। खोजते-खोजते उस बालक के पास आ गए। सिपाही बालक को भी चोर समझकर राजा के पास ले गए। राजा ने कारावास की आज्ञा दे दी।"

"उधर बालक की माता भगवान शंकर जी का प्रदोष व्रत कर रही थी। उसी रात्रि राजा को स्वप्न हुआ कि यह बालक चोर नहीं है। प्रातःकाल छोड़ दो, नहीं तो आपका राज्य-वैभव शीघ्र नष्ट हो जाएगा।"

"रात्रि समाप्त होने पर राजा ने बालक से सारा वृत्तांत पूछा। बालक ने सब कह सुनाया। वृत्तांत सुनकर राजा ने सिपाही भेजकर बालक के माता-पिता को बुला लिया।"

"राजा ने जब उन्हें भयभीत देखा तो कहा - 'तुम भय मत करो। तुम्हारा बालक निर्दोष है। हम तुम्हारी दरिद्रता देखकर पांच गांव दान में देते हैं।' शिव की दया से ब्राह्मण परिवार आनंद से रहने लगा।"

**निष्कर्ष:**

इस प्रकार जो कोई इस व्रत को करता है, उसे आनंद प्राप्त होता है।

🙏 ॐ नमः शिवाय 🙏

📌 PUJA VIDHI:
- प्रातः स्नान करें
- निराहार रहें
- शिव मंदिर जाएं
- बेल पत्र, धूप, दीप से पूजा करें
- ॐ नमः शिवाय मंत्र जप करें
- ब्राह्मण भोजन और दक्षिणा दें
- एक समय भोजन करें

📌 व्रत के लाभ:
- दीर्घायु प्राप्ति
- आरोग्यता
- संतान सुख
- सभी कष्टों से मुक्ति

 

 

**प्रदोष का अर्थ:**

'प्रदोष' शब्द का अर्थ है सूर्यास्त के उपरांत और रात्रि प्रारंभ होने से पूर्व का समय। शास्त्रों में कहा गया है कि यह समय भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत उत्तम है। इसी काल में भगवान शंकर का पूजन करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

**व्रत की विधि:**

त्रयोदशी तिथि के दिन व्रती को संपूर्ण दिन निराहार रहना चाहिए। सायंकाल जब सूर्यास्त में तीन घड़ी का समय शेष हो, तब स्नान आदि से निवृत्त होकर श्वेत वस्त्र धारण करें। तत्पश्चात संध्यावंदन करने के उपरांत शिवजी की पूजा आरंभ करें।

पूजा स्थल को स्वच्छ जल से धोकर वहां मंडप बनाएं। पांच रंगों के पुष्पों से कमल की आकृति बनाकर कुश का आसन बिछाएं। आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। इसके पश्चात भगवान महादेव का ध्यान करें।

**ध्यान स्वरूप:**

करोड़ों चंद्रमाओं के समान कांतियुक्त, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्र धारण करने वाले, पिंगल वर्ण की जटाएं धारण किए हुए, नीलकंठ, अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, वरद हस्त, त्रिशूलधारी, सर्पों के कुंडल पहने हुए, व्याघ्र चर्म धारण किए हुए, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए।

**उद्यापन की विधि:**

प्रातःकाल स्नान आदि कार्यों से निवृत्त होकर रंगीन वस्त्रों से मंडप सजाएं। फिर उस मंडप में शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करके विधिपूर्वक पूजन करें। तदुपरांत शिव-पार्वती के निमित्त खीर से अग्नि में हवन करना चाहिए।

हवन के समय 'ॐ उमा सहित शिवाय नमः' मंत्र से १०८ बार आहुति दें। इसी प्रकार 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र के उच्चारण से भगवान शंकर के निमित्त आहुति प्रदान करें। हवन समाप्ति पर किसी धार्मिक व्यक्ति को सामर्थ्य अनुसार दान दें।

तदुपरांत ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा से संतुष्ट करें। व्रत पूर्ण हुआ, ऐसा वाक्य ब्राह्मणों से कहलवाएं। ब्राह्मणों की अनुमति प्राप्त कर अपने परिजनों के साथ भगवान शंकर का स्मरण करते हुए भोजन ग्रहण करें।

इस प्रकार उद्यापन करने से व्रती को पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति होती है तथा आरोग्य लाभ होता है। इसके अतिरिक्त शत्रुओं पर विजय मिलती है एवं समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। यह स्कंद पुराण में वर्णित है।

**त्रयोदशी व्रत का महत्व:**

त्रयोदशी अर्थात प्रदोष व्रत करने वाला मनुष्य सदैव सुखी रहता है। इस व्रत के प्रभाव से समस्त पापों का नाश हो जाता है। इस व्रत को करने से विधवा स्त्रियों को अधर्म से विरक्ति होती है और सुहागिन स्त्रियों का सुहाग सदा अटल रहता है। बंदी को कारागार से मुक्ति मिलती है।

जो स्त्री-पुरुष जिस कामना से यह व्रत करते हैं, उनकी समस्त कामनाएं कैलाशपति भगवान शंकर पूर्ण करते हैं। सूत जी कहते हैं कि त्रयोदशी व्रत करने वाले को सौ गायों के दान का फल प्राप्त होता है।

इस व्रत को जो विधि-विधान और तन-मन-धन से करता है, उसके समस्त दुख दूर हो जाते हैं। सभी स्त्रियों को ग्यारह त्रयोदशी या संपूर्ण वर्ष की २६ त्रयोदशी पूर्ण करने के उपरांत उद्यापन करना चाहिए।

**प्रदोष व्रत में वार का महत्व:**

त्रयोदशी तिथि पर जो भी वार पड़ता है, उसी दिन के अनुसार व्रत करना चाहिए तथा उसी दिन की कथा पढ़नी या सुननी चाहिए। विशेष रूप से रवि, सोम और शनि प्रदोष व्रत अवश्य करने चाहिए। इन सभी से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।

**विभिन्न वारों के प्रदोष व्रत:**

१. **रविवार प्रदोष व्रत** - दीर्घायु और आरोग्यता प्राप्ति के लिए रवि प्रदोष व्रत करना चाहिए।

२. **सोमवार प्रदोष व्रत** - ग्रह दशा निवारण की कामना हेतु सोम प्रदोष व्रत करें।

३. **मंगलवार प्रदोष व्रत** - रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य प्राप्ति हेतु मंगल प्रदोष व्रत करें।

४. **बुधवार प्रदोष व्रत** - सर्व कामना सिद्धि के लिए बुध प्रदोष व्रत करें।

५. **बृहस्पतिवार प्रदोष व्रत** - शत्रु विनाश के लिए गुरु प्रदोष व्रत करें।

६. **शुक्रवार प्रदोष व्रत** - सौभाग्य और स्त्री समृद्धि के लिए शुक्र प्रदोष व्रत करें।

७. **शनिवार प्रदोष व्रत** - खोया हुआ राज्य एवं पद प्राप्ति की कामना हेतु शनि प्रदोष व्रत करें।

**व्रत का फल:**

प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

• सभी पापों से मुक्ति
• धन-संपत्ति की प्राप्ति
• संतान सुख
• आरोग्य लाभ
• शत्रुओं पर विजय
• मनोकामना पूर्ति
• कारागार से मुक्ति
• सुहाग की स्थिरता
• राज्य और पद की प्राप्ति

**महत्वपूर्ण निर्देश:**

- व्रत के दिन निराहार रहें
- प्रदोष काल में पूजा करें
- श्वेत वस्त्र धारण करें
- बेल पत्र अवश्य चढ़ाएं
- ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करें
- ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा दें
- कथा का श्रवण अवश्य करें