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पीपल पथवारी की कहानी (Peepal Pathwari ki Katha)

Hindu Calendar Vrat Katha कार्तिक (Kartika)
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परिचय

यह कथा पीपल पथवारी की श्रद्धा और भक्ति का फल बताती है। कहानी सिखाती है कि निष्ठा और प्रेम से किया गया काम फलदायी होता है, जबकि लालच और स्वार्थ से किया गया कार्य नकारात्मक फल ला सकता है।

Yeh katha Peepal Pathwari ki shraddha aur bhakti ka phal batati hai. Katha sikhati hai ki nishtha aur prem se kiya gaya kaam phaldayi hota hai, jabki laalach aur swarth se kiya gaya kaam nakaratmak phal la sakta hai.

पीपल पथवारी की कहानी (Peepal Pathwari ki Katha)

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एक गूज़री थी । उसने अपनी बहू से कहा कि तू दूध – दही बेच आ । तो वह दूध – दही बेचने गई । कार्तिक महीना था । वहां पर सब औरतें पीपल सींचने आती थीं तो वह भी बैठ गई और औरतों से पूछने लगी कि तुम क्या कर रही हो ? तो औरतें बोलीं कि हम तो पीपल की पथवारी सींच रही हैं । तो उसने पूछा- इससे क्या होता है ? औरतों ने जवाब दिया कि इसके करने से अन्न धन मिलता है , वर्षों का बिछड़ा हुआ पति मिलता है ।

उस गूजरी ने कहा कि तुम तो पानी सींच रही हो , मैं दूध – दही से सींचूगी । उसकी सास रोज कहती कि तू दूध – दही बेच कर पैसे लाकर दे , तो उसने कहा जब कार्तिक का महीना पूरा हो जाएगा तब ला दूंगी । और कार्तिक का महीना पूरा हो गया । पूनम् के दिन गूजरी पीपल पथवारी के पास धरणा लेकर बैठ गई । पीपल ने पूछा- कि तू यहां क्यों बैठी है ?

उसने कहा मेरी सास दूध – दही के पैसे मांगेगी । तो पीपल ने कहा- मेरे पास पैसे नहीं हैं । यह पत्थर , डंडे , पान , पत्ते पड़े हैं वह ले जा और गुल्लक में रख देना । जब सास ने पूछा- पैसे लाई है ? तो गूजरी ने कहा मैंने पैसे गुल्लक में रखे हैं । तब सास ने गुल्लक खोल कर देखी तो सास देखती रह गई कि उसमें हीरे मोती जगमगा रहे हैं , पत्थर, डंडे और पत्तों का धन हो गया ।

सास बोली कि बहू इतना पैसा कहां से लाई । तो बहू ने आकर देखा तो बहुत धन पड़ा है । तब गूजरी ने कहा – सासू जी मैंने तो एक महीना दूध – दही से पीपल की पथवारी में सींचा था और मैंने उससे धन मांगा था तो उसने मुझे पत्थर , डंडे , पत्ते दिए थे जो मैंने गुल्लक में रख दिये थे और वह हीरे मोती हो गए । तब सासू जी ने कहा कि अबकी बार मैं भी पथवारी सींचूगी ।

सासू दूध दही तो बेच आती और हाण्डी धोकर पीपल पथवारी में रख आती और बहू से कहती कि तू मेरे से पैसे मांग तो बहू ने कहा कि कभी बहू भी सास से पैसे मांगती है । तो सास बोली कि तू मेरे से पैसे मांग । तो बहू ने सास से दूध – दही के पैसे मांगे । तो सासुजी पीपल पथवारी पर जाकर धरणा लेकर बैठ गई तो डण्डे , पत्ते , पान , भाटे उसे भी दिये और कहा गुल्लक में जाकर रख दे ।

फिर बहू ने खोलकर देखा तो उसमें कीड़े , मकोड़े चल रहे थे । गूजरी ने सास से कहा यह क्या है तो सास देखकर बोली कि पीपल पथवारी ने तेरे को तो अन्न धन दिया और मुझे कीड़े – मकोड़े दिये । तब सब बोले कि बहू तो सत से सींचती थी और सासूजी धन की भूख से सींचती थीं । इसलिए हे पथवारी माता ! जैसे बहू को दिया वैसा सबको देना और, सासूजी को दिया वैसा किसी को मत देना।

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Hinglish

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Ek guzarī thi. Usne apni bahu se kaha, "Tu doodh-dahi bech aa." Bahu doodh-dahi bechne gayi. Kartik ka mahina tha. Wahan par sab auratein peepal seenchne aati thin, to wah bhi baith gayi aur auraton se puchhne lagi, "Tum log kya kar rahi ho?" Auraton ne kaha, "Hum Peepal ki Pathwari seench rahi hain." Usne pucha, "Iske karne se kya hota hai?" Auraton ne jawab diya, "Iske karne se ann-dhan milta hai aur varshon se bichhda pati bhi mil jaata hai."

Guzari ne kaha, "Tum to paani se seench rahi ho, main doodh-dahi se seenchoongi." Uski saas roj kehti thi ki doodh-dahi bechkar paise laakar de, to bahu ne kaha, "Jab Kartik ka mahina poora ho jaayega tab laaoongi." Jab Kartik ka mahina poora hua aur Purnima aayi, to guzarī Peepal Pathwari ke paas dharna lekar baith gayi. Peepal ne pucha, "Tu yahan kyon baithi hai?" Usne kaha, "Meri saas doodh-dahi ke paise maangegi."

Peepal ne kaha, "Mere paas paise nahin hain. Ye patthar, dande, paan-patte le ja aur gullak mein rakh de." Jab saas ne pucha, "Paise lai hai?" to guzarī ne kaha, "Maine paise gullak mein rakhe hain." Saas ne gullak khola to usme heere-moti jagmaga rahe the — jo patthar-dande-patte the ve dhan ban chuke the.

Saas ne pucha, "Bahu itna dhan kahan se laayi?" Guzari ne kaha, "Saasuji, maine ek mahina doodh-dahi se Peepal ki Pathwari mein seencha aur Pathwari se dhan maanga; usne mujhe patthar-dande-patte diye jinhen maine gullak mein rakha — ve heere-moti ban gaye." Saasuji ne kaha, "Agli baar main bhi Pathwari seenchoongi."

Saasuji ne doodh-dahi bechkar handi dhokar Peepal Pathwari ke paas rakh di aur bahu se kaha ki woh unse paise maange. Saas Peepal Pathwari par dharna lekar baithi. Pathwari ne saas ko bhi dande, patte, paan-patte aur bhaate diye aur kaha, "Gullak mein rakh de." Par jab saas ne gullak khola to usme keede-makode the.

Guzari ne hairani se pucha, "Yeh kya hai?" Saas ne kaha, "Peepal Pathwari ne tumhein ann-dhan diya, mujhe keede-makode diye." Tab sabne kaha, "Bahu to sacchi shraddha se seenchti thi, lekin Saasuji dhan ki laalsa se gai. Isliye he Peepal Pathwari mata! Jaise bahu ko diya waisa sabko dena, aur Saasuji ko diya waisa kisi ko mat dena."

Moral: Sacchi bhakti aur nishtha se hi phal milta hai; laalach se kiye gaye karm ka phal accha nahin hota.