बिन्दायक जी की कहानी (Bindaayak Ji ki kahani)
एक मेंढक और मेंढकी थे। मेंढकी रोज़ गणेश जी की कहानी कहती थी। एक दिन मेंढक बोला कि तू पराये पुरुष का नाम क्यों लेती है ?अगर तू लेगी तो मैं तुझे मारूंगा।
राजा की दासी आयी तो पतीले में डालकर अंगीठी पर चढ़ा दिया। जब दोनों सिकने लगे तो मेंढक बोला ,”मेंढकी बहुत कष्ट हो रहा है। तू गणेशजी को याद कर ,नहीं तो हम दोनों मर जायेंगे। “तब मेंढकी ने सात बार “विन्दायक जी -विन्दायक जी ” कहा ।
तभी दो सांड वहाँ लड़ते हुए आये और पानी के पतीले को गिरा दिया। मेंढक और मेंढकी तालाब में चले गए।
हे बिन्दायक जी !जैसे मेंढक – मेंढकी का कष्ट दूर किया ,वैसे सबका करना।
बोलो बिन्दायक जी महाराज की जय !!!
Hinglish
Rājā kī dāsī āyī to patīle meṇḍhak neṇḍākar aṅgūṭhī par chaṛhā diyā. Jab donoṇ sikne lage to meṇḍhak bolā, "Meṇḍhakī bahut kaṣṭ ho rahā hai. Tū Gaṇeshjī ko yād kar, nahīn to ham donoṇ mar jāyeṇge." Tab meṇḍhakī ne sāt bār "Vindāyak jī - Vindāyak jī" kahā.
Tabhī do sāṇḍ vahāṁ laṛte hue āye aur pānī ke patīle ko gira diyā. Meṇḍhak aur meṇḍhakī tālab meṁ chale gaye.
Hey Vindāyak jī! Jaise meṇḍhak-meṇḍhakī kā kaṣṭ door kiyā, vaise sabkā karna.
Bolo Vindāyak jī mahārāj kī jai!