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श्री गिरिराज आरती (Shree Grahiraj Aarti)

गोवर्धन पर्वत की आरती प्रकृति और ईश्वर के अटूट संबंध को दर्शाती है। गिरिराज महाराज की स्तुति करने से घर में अन्न-धन की कभी कमी नहीं होती। आराधना पर उपलब्ध यह आरती भक्तों को ब्रज की दिव्य अनुभूति कराती है। श्रद्धापूर्वक इस आरती का पाठ करने से भगवान कृष्ण का आशीर्वाद और सुख-शांति प्राप्त होती है।

Aarti Gods Aarti
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परिचय

श्री गिरिराज (गिरिवर / गोवर्धन) की आराधना भक्तों में सुरक्षा, मोक्ष और पृथ्वी‑प्रेम का आभास कराती है। पारंपरिक रूप से गिरिराज की आरती श्रद्धा‑भाव से की जाती है — दीप, पुष्प और नैवेद्य चढ़ाकर तथा मानसिक रूप से उपस्थित रहकर पढ़ें। नीचे आरती को सहज‑पठनीय छंदों में प्रस्तुत कर रहा/रही हूँ — श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ें या गायें।

श्री गिरिराज आरती (Shree Grahiraj Aarti)

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॥ श्री गिरिराज आरती ॥

ॐ जय जय जय गिरिराज, स्वामी जय जय जय गिरिराज।
संकट में तुम राखौ, निज भक्तन की लाज॥
ॐ जय जय जय गिरिराज...॥

इन्द्रादिक सब सुर मिलतुम्हरौं ध्यान धरैं।
ऋषि मुनिजन यश गावें, ते भवसिन्धु तरैं॥
ॐ जय जय जय गिरिराज...॥

सुन्दर रूप तुम्हारौ, श्याम सिला सोहें।
वन उपवन लखि‑लखि के, भक्तन मन मोहें॥
ॐ जय जय जय गिरिराज...॥

मध्य मानसी गङ्गा, कलि के मल हरनी।
तापै दीप जलावें, उतरें वैतरनी॥
ॐ जय जय जय गिरिराज...॥

नवल अप्सरा कुण्डसुहावन‑पावन सुखकारी।
बायें राधा‑कुण्ड नहावें, महा पापहारी॥
ॐ जय जय जय गिरिराज...॥

तुम्ही मुक्ति के दाता, कलियुग के स्वामी।
दीनन के हो रक्षक, प्रभु अन्तर्यामी॥
ॐ जय जय जय गिरिराज...॥

हम हैं शरण तुम्हारी, गिरिवर गिरधारी।
देवकी नंदन कृपा करो, हे भक्तन हितकारी॥
ॐ जय जय जय गिरिराज...॥

जो नर दे परिकर्म, पूजा पाठ करें।
गावें नित्य आरती, पुनि नहिं जनम धरें॥
ॐ जय जय जय गिरिराज...॥